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सुख-दुख

हिंदुस्तान अख़बार हो या कहीं और, अवधेश प्रीत सर नए लोगों को खूब मौका देते थे!

विभा रानी-

आज मन बहुत दुखी है। अवधेश प्रीत जी के जाने से। कई साल पहले एक बार रात के नौ बजे हिंदुस्तान के ऑफिस से हम निकले थे। बेटियां, भतीजियां सब कहीं बाहर से खा पीकर लौट रही थीं। हम सब मिले। तब रात के दस बज गए थे। बोले, “विभा जी, ऐसा बिहार मैं चाहता हूं, जहां हम और आप अपनी बेटियों के साथ देर रात में भी कहीं भी बेखौफ जाएं।” बेटियों से उनको बहुत प्यार था। जब भी बात होती, उनकी और हमारी बेटियों का जिक्र जरूर आता।

पटना जाने पर कई बार हम मिले। 2023 में भी मिलने का प्रोग्राम बना, लेकिन आकार नहीं ले पाया। हमारे उपन्यास “कांदुर कड़ाही” पर जैसी समीक्षा उन्होंने लिखी, लगा कि उपन्यास का मर्म उड़ेलकर रख दिया।

अवधेश प्रीत मेरे लिए बहुत ही संजीदा कथाकार थे। उनकी रचनाओं पर बात करना इतना सहज नहीं है।

इनकी एक कहानी है, हमज़मीन। इस कहानी को पढ़ते ही मैंने उसके मंचन का अनुरोध किया। सहज ही अनुमति दे दी। हमने अपने अवितोको रूम थिएटर से उसका मंचन किया। बाद में देश भर के कई ग्रुप्स ने इसका मंचन किया। इनकी कहानियों में नाट्य तत्व जैसे बोलते रहते थे।

बहुत सी बाते हैं, बहुत सी यादें हैं। गला और हृदय दोनों भरे हुए हैं।


सीटू तिवारी-

इधर अवधेश सर से ज्यादा बातचीत नहीं थी. लेकिन लखनऊ से जब पटना पहली बार आई तो पटना के बुद्ध मार्ग स्थित हिंदुस्तान अखबार के दफ़्तर यूं ही चली गयी थी.

2004 या 2005 का वक्त रहा होगा. नीचे जाकर जो गार्ड मिला, उससे बस इतना कहा अखबार में लिखना है. फीचर डेस्क पर जाने दीजिये.

गार्ड ने अवधेश सर के पास भेज दिया. पहली मंजिल पर फीचर वालों का बहुत बड़ा कमरा था. पांच से छः लोग रहे होंगे. घुसते ही सबसे पहले एक आदमी दिखा जो सहज लगता था. उससे पूछा अवधेश प्रीत कहाँ मिलेंगे.

जवाब आया : मैं हूँ.

मैं : लिखना चाहती हूँ.

सर : कुछ लिखा लाई हैं तो दिखाये.

मैंने अपना लिखा आगे बढ़ाया, पढ़ा फिर जरा शंकित नज़रों से पूछा, आपने लिखा है? इस शहर में किसको जानती हैं?

मैंने जवाब दिया, किसी को भी नहीं.

उन्होंने कहा, “मारजिन पर लिखिये, ये आपकी रचना है.”

मैंने लिखा और मंगलवार को मेरा अर्टिकल अखबार में था. उस वक़्त हिंदुस्तान के फीचर पेज पर छप जाना बहुत बड़ी बात थी. उसके बाद तो एक साल तक हिंदुस्तान में पूरा पूरा पन्ना लिखा.

इस लिखने से confidence आया तो Akashwani चले गए. वहाँ पर भी कोई ताल्लुक नहीं था लेकिन वहाँ भी काम मिल गया.

पटना आई तो मेरा कोई contact नहीं था. पटना क्या, हमारे खानदान को कोई आदमी बिहार तक नहीं आया था. लेकिन अवधेश सर से मुझ को और बहुत सारे लड़के लड़कियों को मौका दिया.

उनकी किताबें, साहित्य, लेखन से परे वो एक ऐसे पत्रकार थे जो इस tribe में ज्यादा से ज्यादा नौजवानों को शामिल करना चाहते थे.

मुझे पहला मौका देने वाले और भरोसा करने वाले भी Avadhesh Preet सर थे. वो चले गए, उनको सलाम.

मूल खबर…

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