अभिषेक श्रीवास्तव-
अवधेश प्रीत नहीं रहे। अच्छे भले आदमी थे। साफगोई से बात करते थे। ईमानदार पत्रकार थे। शानदार कहानीकार।
मैं आम तौर पर किसी के जीने मरने पर नहीं लिखता हूं। अवधेश प्रीत के नहीं रहने की सूचना मिली, तो सोचता रहा कि भले लोगों को नहीं जाना चाहिए। चले गए तो उन्हें रिकग्नाइज जरूर किया जाना चाहिए क्योंकि हम लोग मामूली व्यक्तित्व के लोगों के मामले में थोड़ा कृतघ्न और कंजूस जान पड़ते हैं।
शायद उनका कहानी संग्रह हमज़मीन उस वक्त आया था, जब उनसे सीधा परिचय हुआ था। बाद में पता चला वो गाजीपुर के हैं। आजकल गाजीपुर के लिटरेचर फेस्टिवलकामी बंधुओं को तो शायद पता भी न हो कि वहां जन्मे कैसे कैसे और कौन कौन से लोग कहां कहां पड़े हुए ईमानदारी से लिखने पढ़ने का काम चुपचाप बरसों से कर रहे थे।
तब मैं तकरीबन हर हफ्ते तकरीबन हर हिंदी अखबार में किताबों की समीक्षाएं लिखता था, जब हमज़मीन का रिव्यू किया था। समीक्षा लिखना शौक नहीं, ढाई तीन सौ रुपए के चेक और फ्री की किताब का मामला ज्यादा हुआ करता था। अवधेश जी की बहुत अच्छी कहानियां थीं, मंगलेश जी ने पढ़ने को दिया था। मैं चौंक गया कि ऐसे कहानीकार से अपरिचय कैसे रह गया। फिर मंगलेश जी ने कहा कि लिख डालो। सहारा समय साप्ताहिक निकलता था उस वक्त। मैंने मन से लिखा। छपा।
फिर एक दिन अचानक फोन पर एक नंबर चमका और कड़क सी आवाज आई: मैं अवधेश प्रीत बोल रहा हूं पटना से। उस समय लोग समीक्षा देख के फोन कर देते थे, अच्छा या बुरा जैसा भी कहने को हो, पर इतनी विनम्रता थी। ऐसे ही एक बार खगेंद्र ठाकुर ने फोन कर के हड़का दिया था, जिनकी नामवर जी पर लिखी या संपादित, याद नहीं, किसी किताब को शायद मैंने रगड़ दिया था जनसत्ता में। बहरहाल…
अवधेश जी से खूब बात हुई। फिर कुछ साल बाद, शायद 2009 में, पटना जाना हुआ पंकज बिष्ट और आनंद स्वरूप वर्मा जी के साथ, एक मीडिया केंद्रित विमर्श में। वहां अवधेश जी भेंटाए। इतने सरल, इतने सहज। न पत्रकारों वाली ऐंठन, न कहानीकारों वाला कोई गुरूर। संजोग से आलोक धन्वा किसी राजस्थानी रेस्टोरेंट में ले गए हम लोगों को अगले दिन जहां उन्होंने केवल एक कटोरी दाल खाई थी (ये बात अलग से याद है), वहां अवधेश जी को भी आना था लेकिन अखबारी काम से नहीं आ पाए। वहीं आलोक धन्वा ने खुद को गाजीपुर का बताते हुए ये भी बताया था कि अवधेश प्रीत भी गाजीपुर के हैं। तब पता चला था।
बाद में उनसे बात होती रही। एकाध बार हिंदुस्तान के लिए लिखवाए भी। अंतिम बात दो ढाई साल पहले हुई थी। उन्हीं का फोन आया था। अवधेश जी को इसलिए भी मैं याद करूंगा कि उन्होंने एक और जेनुइन आदमी से मिलवाया था। ये बात अलग से बार-बार इसलिए कहनी पड़ती है क्योंकि हिंदी साहित्य या पत्रकारिता के दायरे के ज्यादातर लोग बनैला और नकली हैं। ऐसे में अवधेश जी के माध्यम से सुरेन्द्र स्निग्ध से मिलना मेरे लिए उपहार था। क्या सुंदर आदमी थे। गुजर गए कुछ साल पहले।
अवधेश जी ही हमें मधुकर मास्टर से मिलवाए थे। एक बार मैं और रोहित प्रकाश (अब लापता) बज्र गर्मी में बीमार मधुकर सिंह से मिलने आरा के धौरहरा पहुंच गए थे पटना से कोई पैसेंजर लेकर। मेरे ख्याल से उनके निधन से ठीक पहले की वह मुलाकात थी, आज भी उनका वो आखिरी इंटरव्यू (अप्रकाशित) और तस्वीरें मेरे पास हैं। आज ही निरुपम जी से चर्चा में वो आरा की यात्रा याद आई थी, जिक्र हुआ था कि कैसे आरा के स्टेशन पर एक रिक्शेवाले से बस इतना कहा गया कि मधुकर मास्टर के यहां चलना है और वो लेता गया।
पटना पुराने और असली लोगों से खाली होता जा रहा है। जैसे और शहर भी। मधुकर मास्टर कब का गए। सुरेन्द्र स्निग्ध भी। अब अवधेश जी। आलोक धन्वा किसी के निजी अजायबघर के कोने में पड़े पुराने पोस्टर की तरह शेष हैं जिस पर कभी लगी इंकलाबी गोली के निशान अब नहीं मिलते। खोखा जाने कहां हेरा गया।
बिहार का चुनाव कल जो भी नतीजा दे, बिहार या कहें पटना अब अनिवार्यतः ऐसे साधारण लोगों से खाली होता जा रहा है जो वहां की सांस्कृतिक जमीन को चुपचाप अपने रचनाकर्म से बचाए हुए थे गोकि वे मूल बिहार के भी नहीं थे। जैसे अवधेश प्रीत, जो एक साधारण इंसान थे। मुझे लगता है कि साधारण मनुष्यों पर लिखना साधारण मनुष्यों के लिए जरूरी हो गया है क्योंकि असाधारण की दैनंदिन महाकाय होती जाती व्याप्ति पुराने सहज, सामान्य को निगल जाने पर आतुर है। इसीलिए मन किया, तो आज लिखा।




Jayprakash Naveen
November 14, 2025 at 6:56 am
लेकिन दुखद बात है कि जिस अखबार के लिए उन्होंने खून पसीना एक कर दिया वही दैनिक हिन्दुस्तान के किसी भी संस्करण में उनके निधन की एक लाइन खबर नहीं छपी।