
संजय कुमार सिंह
नरेन्द्र मोदी की बहुप्रचारित राजनीति की अच्छाइयां तो सब जानते हैं बुराइयों की चर्चा नहीं होती। इसलिए वे तमाम घटियापना करके भी दूसरों पर घटिया राजनीति करने का आरोप लगाते हैं। 272 प्रख्यात नागरिकों की ताजा चाल के बीच कल बिहार में शपथग्रहण से नरेन्द्र मोदी की लेने-देने की राजनीति की पोल खुली। लेकिन उसकी आलोचना नहीं है। नरेन्द्र मोदी वंशवाद का जैसा विरोध करते है, उसमें मेनका गांधी और वरुण गांधी को साथ रखकर, कई बार सांसद मंत्री बनाने के बाद अब छोड़ देना मुद्दा नहीं है। राहुल गांधी, अखिलेश और तेजस्वी के खिलाफ उनके तंज बहुप्रचारित हैं। भाजपा में जो वंशवादी हैं उनकी चर्चा नहीं के बराबर है। इसी तरह वे दूसरों की राजनीति का विरोध करते हैं, मीडिया उनका साथ देता है लेकिन वे खुद वही करते हैं तो मीडिया शांत रहता है। इसके ढेरों उदाहरण हैं। खास है, आम आदमी पार्टी की रेवड़ी का विरोध और खुद ऐन चुनाव के दौरान एडवांस भुगतान। मुसलमानों के लिए कांग्रेस खुद कुछ करे तो उसे तुष्टीकरण कहते रहे हैं और हिन्दुओं के लिए जो करते हैं उसे ‘संतुष्टीकरण’ कहते हैं। यह सब देखना चुनाव आयोग का काम है लेकिन नरेन्द्र मोदी तो भारत रत्न भी चुनावी जरूरत के अनुसार बांट चुके हैं और मार्गदर्शक मंडल में भेजे गए आडवाणी को तभी भारत रत्न दे दिया जाता को क्या गलत होता पर दिया तब गया जब जरूरत महसूस हुई। एक साल में अधिकतम तीन की जगह पांच देकर और अब जरूरत नहीं है तो कोई भारत रत्न नहीं है। पर यह सब अलग मुद्दा है। अभी बिहार में सरकार बनानी थी। सहयोगी दलों को औकात और जरूरत के अनुसार सीटें दी गईं और इनमें से एक राष्ट्रीय लोकमोर्चा दल के प्रमुख उपेन्द्र कुशवाह ने टिकट तो उन्हें दिया जो चुनाव जीत सकें पर मंत्री बेटे को बनवाया। उस बेटे को जिसे चुनाव नहीं लड़वाया या शायद जो जीत ही नहीं सकता था। जो भी हो, नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की, कुर्सी के लिए कुछ भी करेगा का यह उदाहरण आज अखबारों में चर्चा का महत्वपूर्ण मुद्दा होना चाहिए था। आइए आज इसी मामले को देखें-समझें।
नीतिश कुमार का 10 बार शपथ लेना निश्चित रूप से बड़ी खबर है और आज अखबारों में इसे प्रमुखता मिली भी है। यह अलग बात है कि नीतिश कुमार मुख्यमंत्री बने रहने के लिए इनसान और राजनेता से पलटू राम बन गए और आज यह चर्चा का विषय नहीं भी हो सकता है। लेकिन आज जिस बात की चर्चा जरूर होनी चाहिए थी वह सिर्फ देशबन्धु में पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपी है। शीर्षक है, विधायक नहीं हैं फिर भी मंत्री बने। खबर के अनुसार राष्ट्रीय लोकमोर्चा दल के प्रमुख उपेन्द्र कुशवाह के बेटे ने कल बिहार में मंत्री पद की शपथ ली। खास बात यह है कि वे बिहार विधान सभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, उन्हें मंत्री बनाने का कोई राजनीतिक कारण पहले से चर्चा में नहीं था। उपेन्द्र कुशवाह की पार्टी ने पांच सीटों पर चुनाव लड़ा था। इनमें चार पर जीत हासिल हुई है। जीतनों वालों में एक उपेन्द्र कुशवाह की पत्नी स्नेहलता भी हैं। फिर भी बेटे को मंत्री बनाना, उनका चुनाव नहीं लड़ना अजीब स्थिति है। कुल मिलाकर, हुआ यह है कि भाजपा की इस सहयोगी पार्टी ने चुनाव जीतने के लिए दूसरों का उपयोग किया और मंत्री पद का ईनाम पार्टी प्रमुख के बेटे को मिला। अखबारों की खबरों के अनुसार, उपेंद्र कुशवाहा ने साफ कहा है कि उन्होंने अपने बेटे को इसलिए मंत्री बनाया है ताकि “कोई इधर-उधर न हो जाए” — यानी पारिवारिक और संगठनात्मक नियंत्रण बनाए रखने का यह उनका एक तरीका है जो परिवारवाद पर आश्रित है। उनका तर्क है कि पहले उनके कुछ सहयोगी (सांसद, विधायक) दूसरे दलों में चले गए थे, जिससे उनकी पार्टी (या उनकी पकड़) कमजोर हुई थी।
यहां याद कीजिए कि लालू यादव ने पत्नी को मुख्यमंत्री बनाया था तो उनकी आलोचना हुई थी। दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी को संघ और भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तो नीतिश कुमार ने उनका विरोध किया था और इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया। बाद में जीतन राम मांझी ने अलग पार्टी बना ली। लेकिन राजग गठबंधन में नीतिश कुमार के साथ हैं। अब उनकी बहू, दीपा कुमारी और समधन ज्योति देवी विधायक है। पुत्र संतोष कुमार सुमन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं। पेंशन की व्यवस्था तो है ही। ऐसे राज्य में या ऐसे नेताओं में एक नेता उपेन्द्र कुशवाह को विधान परिषद में एक सीट देने का आश्वासन था और बेटे को शपथ दिलवाकर उन्होंने पार्टी के लिए यही सीट सुनिश्चित की है। नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार खत्म करने का चाहे जितना दावा करें, भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने में उनका योगदान शर्मनाक है और यह एक उदाहरण जो सुशासन बाबू नीतिश कुमार के सहयोग से पूरा किया गया है। आइए, अब उम्मीदवार की योग्यता बताने वाली खबरों को भी देख लें। खबर है कि उपेन्द्र कुशवाह के बेटे दीपक प्रकाश शपथ ग्रहण समारोह में जींस, शर्ट और क्रॉक्स पहनकर आए थे। जब पूछा गया कि उन्हें मंत्री क्यों बनाया गया तो उन्होंने कहा, “मुझे क्यों बनाया गया, यह पिताजी से पूछिए।” उपेंद्र कुशवाहा का कहना है कि यह एक “डील” है — परिवार को सत्ता में जोड़ना और भरोसेमंद चेहरा बनाना उनकी रणनीति थी। उपेंद्र कुशवाहा की यह चाल पारिवारिक राजनीति की मिसाल है। अपनी पार्टी और गठबंधन (राजग) के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उन्होंने सीधे अपने बेटे को मंत्री बनाया, न कि किसी चुने हुए विधायक को। यह दिखाता है कि उनकी नेतृत्व शैली में “परिवार पर ही विश्वास” का मिश्रण है और बहुत अहम है क्योंकि नरेन्द्र मोदी परिवार विरोधी होने का दिखावा करते हैं। और बिहार जैसे पिछड़े राज्य में जीतन राम मांझी के परिवार को सरकारी वेतन और पेंशन सुनिश्चित करने के बाद अब उपेन्द्र कुशवाह के परिवार के लिए वेतन, भत्ता और पेंशन सुनिश्चित कर दिया गया है।
आइए अब यह भी देख लें कि नीतिश कुमार के 10वीं बार शपथ लेने को प्रमुखता देने वाले जिन अखबारों ने भाजपा की राजनीति के इस खास अंश को प्रमुखता नहीं दी उन्होंने इस खबर को कितनी प्रमुखता दी है। देशबन्धु में यह खबर छह कॉलम की लीड है। अमर उजाला में दो कॉलम की खबर है। उपशीर्षक है, 26 अन्य मंत्रियों ने भी ली शपथ। सम्राट व विजय उपमुख्यमंत्री। इससे बेहतर यह बताना होता कि दो उपमुख्यमंत्री हैं। लेकिन यहां नाम बताने का खास महत्व है तब जब चुनाव आयोग ने शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं की और इसलिए पूरा नाम लिखने की भी जरूरत नहीं है और उपमुख्य को भी सम्राट व विजय के रूप में संबोधित किया गया है। इसी तरह उपशीर्षक की दूसरी लाइन भी वही रखी गई है जो बतानी है यानी खास है – समारोह में पीएम मोदी, गृहमंत्री शाह और कई सीएम मौजूद रहे। नवोदय टाइम्स में नीतिश सरकार का शपथग्रहण पहले पन्ने पर नहीं है। अंग्रेजी अखबारों में दि एशियन एज में यह चार कॉलम की लीड है। फ्लैग शीर्षक में दो बुलेट प्वाइंट हैं। दूसरे में बताया गया है – 14 मंत्री भाजपा के, 8 जेडीयू के, दो एलजेपी के। इसमें यह नहीं बताया गया है कि इतने विधायक होने के बावजूद एक ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाया गया है जो विधानसभा का सदस्य नहीं चुना गया है और यह सरकार सौदेबाजी से बनी है। वोट चोरी का मामला जो खुल रहा है वह अपनी जगह है ही।
द टेलीग्राफ ने चार कॉलम में खबर छापी है। शीर्षक है, नीतिश का शपथग्रहण मोदी की छत्रछाया में। द हिन्दू का शीर्षक है, 27 सदस्यों के नीतिश मंत्रिमंडल ने शपथ ली भाजपा को 14 जेडी (यू) को आठ सीटें मिलीं। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर दो कॉलम की है लेकिन चार लाइन का शीर्षक है – नीतिश फिर मुख्यमंत्री बने, उनके मंत्रिमंडल में नए-पुराने का मेल, जाति संतुलन स्थापित करने की कोशिश। उपशीर्षक है, 26 मंत्रियों ने भी शपथ ली; भाजपा के सम्राट और सिन्हा उप मुख्यमंत्री बने रहे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है। नीतिश 10.0 ने भाजपा के 14 और जेडीयू के 8 मंत्रियों के साथ शपथ ली। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह चार कॉलम की सेकेंड लीड है। शीर्षक है, नीतिश को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में 10वीं बार शपथ दिलाई गई, दोनों उपमुख्यमंत्री बने रहे। जाहिर है कि शपथग्रहण से संबंधित ये सब तथ्य इसीलिए इतनी प्रमुखता से छपे हैं क्योंकि भाजपा ऐसा चाहती है। भाजपा की जीत हुई है। यह अलग बात है कि भाजपा की चलती तो नीतिश कुमार मुख्यमंत्री नहीं बनते और यह उन्हें शिन्दे बनाने की योजना लंबे समय से चर्चा में थी। फिर भी वे मुख्यमंत्री बने तो कैसे बने उसकी कहानी चर्चा में रही है। भले अभी मुद्दा नहीं है लेकिन इतनी भारी जीत के बावजूद एक ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाना जिसने चुनाव लड़ा ही नहीं, चुनावी राजनीति की प्रासंगिकता पर गंभीर दाग है। इसकी खबर प्रमुखता से होनी ही थी।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


