नई दिल्ली। इंडिगो संकट ने पूरे देश को जिस तरह बंधक बनाकर रख दिया, उसने सिर्फ एविएशन सेक्टर की खामियों को नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की नैतिक विफलता को भी उजागर कर दिया है। वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने इस पूरे मामले में केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा है कि “दुनिया को झुकाने का दावा करने वाली मोदी सरकार एक एयरलाइन कंपनी के सामने लेट गई—यह शर्मनाक है।”
नियम पहले से तय थे, गलती फिर भी सरकार ने छुपाई
DGCA ने FDTL नियमों को अप्रैल 2019 और जनवरी 2024 में नोटिफाई किया था। एयरलाइंस को लगभग 20 महीनों का समय मिला था तैयारी के लिए।
Air India तैयार हो गई—IndiGo नहीं।
सूत्रों और विशेषज्ञों के अनुसार इंडिगो ने—
पायलटों की भारी कमी को नज़रअंदाज़ किया क्रू मैनेजमेंट को टालते रहे सिस्टम प्लानिंग की अवहेलना की
जब सच्चाई सामने आई, तो हज़ारों उड़ानें रद्द की गईं।
लाखों यात्री फंसे, बुज़ुर्ग, बीमार और दिव्यांग घंटों-घंटों एयरपोर्ट पर तड़पते रहे।
सरकार का रवैया: ब्लैकमेल स्वीकार या मिलीभगत?
सबसे बड़ा सवाल यही है—इस संकट में सरकार ने किया क्या?
राजकिशोर कहते हैं, “गलती तय करने के बजाय सरकार ने इंडिगो की मोनोपॉली के दबाव में नियम ही स्थगित कर दिए। यह इंडिगो को बचाने के लिए किया गया है, न कि सच्चाई जानने के लिए।”
उद्योग जगत के जानकार भी मानते हैं कि हाई-लेवल इंक्वायरी महज़ एक नाटक है, एक ‘मैनेज्ड एक्सरसाइज’, ताकि जिम्मेदारी एयरलाइन से हटाई जा सके।
राजनीतिक दलों की चुप्पी क्यों? जवाब बॉन्ड सिस्टम में छिपा है
राजनीतिक दलों की चुप्पी भी सवालों में है।
जानकारों का कहना है कि चुनावी बॉन्ड्स के जरिए हुआ कॉर्पोरेट-राजनीतिक गठजोड़ आज उजागर हो रहा है, इसलिए किसी पक्ष से एक शब्द विरोध में नहीं निकला।
610 करोड़ रिफंड और होटल बुकिंग—जुमले या समाधान?
इंडिगो द्वारा जारी किए गए रिफंड और होटल ठहराव के ऑफर को भी विशेषज्ञ ‘मैनेजमेंट स्टंट’ बता रहे हैं।
राजकिशोर के शब्दों में—“ये जनता के जख्म पर मरहम नहीं, मीडिया मैनेजमेंट है।”
निचोड़: यह सिर्फ इंडिगो का संकट नहीं—यह सिस्टम की मिलीभगत है
एयरलाइन ने लापरवाही की सरकार ने नियम तोड़कर बचाया रेगुलेटर ने आंखें मूंद लीं राजनीतिक दलों ने चुप्पी साध ली
इसे कॉरपोरेट–सरकार–रेगुलेटर का गंदा गठजोड़ कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
और जिस देश में एक कंपनी पूरे सिस्टम को बंधक बना ले, उसे विकसित भारत नहीं, कॉरपोरेट राज कहते हैं।
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