नाम बदलने और बीमा कराने वाली सरकार ऐसे ही चुनाव जीतती रही तो लोग बिना इलाज मरते रहेंगे और बीमे की रकम भी बेमानी हो जाएगी।
संजय कुमार सिंह
अमूमन मैं छुट्टी पर रहता हूं तो अखबार नहीं देखता, खबरें नहीं पढ़ता। इस बार वापस आकर 13 दिसंबर के अखबार देखे तो भाजपा की कार्यशैली बताने वाली कई खबरें मिलीं। बीच में भाजपा के उत्तर प्रदेश और कार्यवाहक अध्यक्ष की भी घोषणा हो गई तो कि इतने समय से रुके काम हो रहे हैं तो कुछ रुकी-फंसी खबर भी होगी। भाजपा विशेष पुरानी खबरों के आलोक में कुछ खबरें ऐसी मिलीं जिनकी चर्चा या जैसा मैं करता हूं, दर्ज करना जरूरी है। पहली खबर द हिन्दू में पहले पन्ने पर छपी थी, पूर्व भाजपा विधायक और उनके बेटे को अलंद की मतदाता सूची से छेड़-छाड़ मामले में मुख्य आरोपी बनाया गया है। आप जानते हैं कि राहुल गांधी ने बहुत स्पष्ट आरोप लगाए थे कि मुख्य चुनाव आयुक्त वोट चोरों की रक्षा कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा था कि कर्नाटक सीआईडी की 18 महीने में 18 चिट्ठियों के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त (चुनाव आयोग) ने आवश्यक जानकारी नहीं दी। राहुल गांधी ने जिनका वोट कटा, जिसने काट सबको मंच पर पेश करके बताया था कि गड़बड़ी कहां और कैसी हो सकती है। अब जब भाजपा विधायक से तार जुड़ रहे हैं तो चुनाव आयोग की चुप्पी और चुनाव आयोग का बचाव भाजपा द्वारा किए जाने का मामला समझ में आता है। सरकार ने यह बताने और विश्वास दिलाने की कोशिश की है कि राहुल गांधी के आरोपों में दम नहीं है और 272 विशिष्ट नागरिकों तथा दूसरे उपायों से इसे झुठलाने की कोशिश की है और मामला पुराना हो गया है तो यह खबर आई है। इसे अखबारों में प्रमुखता नहीं मिली तो इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। कर्नाटक सरकार और राज्य एसआईटी इस दिशा में काम कर रही है तथा और भी जानकारी आने वाली है।
दूसरी खबर अमर उजाला में लीड है। शीर्षक है – बीमा क्षेत्र में अब 100 फीसदी विदेशी निवेश का रास्ता साफ, 2047 तक हर नागरिक के लिए बीमा का लक्ष्य। इससे विदेशी निवेश का रास्ता तो साफ हुआ है लेकिन सरकारी नियमों और व्यवहार के कारण विदेशी चंदे और दान से चलने वाले ढेरों काम और गैर सरकारी संस्थान बंद हैं। बेरोजगारी से लेकर अर्थव्यवस्था तक के मामले हैं लेकिन सरकार उस मामले में टस से मस नहीं हो रही है। न हो, मेरे लिए मुद्दा यह है कि हजारों-लाखों लोगों को बेरोजगार करके बीमा करने वाली सरकार चुनाव जीतने के उपाय कर रही है। जैसा मैंने कहा, यह खबर 13 दिसंबर 2025 को पहले पन्ने पर लीड है। आपको याद होगा कि पहले बीमा पर सर्विस टैक्स ज्यादा था और हाल में कम किया गया है। आप चाहें तो दोनों खबरों को जोड़कर खेल समझने की कोशिश कर सकते हैं। इसी दिन द टेलीग्राफ में छपी खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोविड के दौरान अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के दौरान मौत के मुंह में गए डॉक्टर के रिश्तेदारों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 50 लाख रुपए के बीमा भुगतान किया जाना चाहिए। आप समझ सकते हैं कि कोविड में मरने वाले आम लोगों को सरकारी मुआवजा नहीं के बराबर मिला, गरीबों के लिए यह योजना बनाई और प्रचारित की गई। उन्हें मुआवजा मिला भी हो तो कर्तव्य निभाते हुए मौत को गले लगाने वालों के परिवार को नहीं मिला डॉक्टर के परिजनों को मुकदमा तक लड़ना पड़ा और तब कल्याणकारी कही जाने वाल पहले की कथित भष्ट सरकार चुनाव हराकर सत्ता पाने वाली सरकार से मुआवजा पाने का हक मिला। इसमें अभी तक यह नहीं पता चला है और शायद ही बताया गया है तथा प्रचार तो नहीं ही किया गया है कि जनधन खाता खोलने वालों को उसके साथ मिलने वाले बीमे का लाभ मिला या नहीं और मिला तो कितने लागों को, कितने का। यही नहीं, पीएम केयर्स कोविड की जरूरतों के लिए ही बना था और कम से कम कर्तव्य निर्वहन के दौरान मरे लोगों को ढूंढ़कर मुआवजा दिया गया होता तो यह मुकदमा नहीं होता और ऐसा आदेश तो नहीं ही होता। आप जानते हैं कि पीएम केयर्स फंड से वेंटीलेटर खरीदे जाने थे और उसका क्या हुआ या उससे भी क्या-क्या नहीं हुआ।
हर नागरिक के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा का लक्ष्य और हाल आप जानते हैं। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों का जो हो – सफाई, स्वच्छता और शौंचालय आप जानते हैं। उसका लाभ भी देख ही रहे हैं। अब सरकार ने हर नागरिक के बीमा का लक्ष्य रखा है या उसका प्रचार किया जा रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि बीमा अमीरों की जरूरत नहीं है या उनके लिए कितने का बीमा करवाना है और क्या इसीलिए बीमा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों की जरूरत है? तथ्य यह है कि दिल्ली में चिकित्सा बीमा वालों के लिए निजी अस्पतालों में जगह खाली नहीं होती है। अपने और परिचितों के लिए मैंने कई बार भुगता और महसूस किया है। इसलिए जरूरत बीमा से ज्यादा अस्पतालों और उनकी क्षमता बढ़ाने की है। खबर यही होगी कि बीमा हो तो इलाज के लिए और मरने पर पैसे मिलेंगे, ताकि घर चलता रहे। इसकी जरूरत गरीबों को है और गरीबों के लिए अस्पताल नहीं होंगे तो बीमे का क्या करेंगे? या पांच सितारा अस्पताल उनके किस काम का? मरने के बाद 10-20-50 लाख भी मिल जाएं तो गरीबों का ही भला होगा – बीमा की जरूरत किसे है। जो पढ़ा लिखा नहीं है या नौकरी नहीं करता है। वरना नौकरी करने वालों का बीमा तो उनके नियोक्ता करवाते हैं। टाटानगर या जमशेदपुर में टाटा के कर्मचारियों के लिए अस्पताल हैं, जरूरत प़ड़ने पर बेहतर शिक्षा के लिए वे सारा खर्च देकर बड़े शहरों में भेजते हैं। मोहल्ला क्लिनिक इसकी शुरुआत हो सकता था। उसे बंद कर आयुष्मान योजना देने वाली सरकार बीमा की व्यवस्था कर रही है वह भी 2047 तक।
यह भविष्य के भारत का भी संकेत देता है। मोटे तौर पर भविष्य में इलाज की व्यवस्था नहीं होगी, अमीरों के पास अपना पैसा होगा, गरीबों के पास बीमा की ताकत होगी पर इलाज करने वाले अस्पताल नहीं होंगे। यह उनके लिए होगा जो पढ़ नहीं पाएंगे, बेरोजगार होंगे और मजदूरी करने के लिए बिहार जैसे गरीब राज्य से विदेश नहीं जाकर पंजाब, गुजरात और बैंगलोर जाएंगे। अमर उजाला के इसी पन्ने पर उसी दिन एक और खबर है, आर्थिक तंगी से जूझ रहे मां (52) और दो जवान बेटों (32) और चैतन्य (27) ने आत्म हत्या कर ली। परिवार दक्षिण दिल्ली में रह रहा था। खबरों से परिवार के मुखिया, पुरुष या महिला के पति के बारे में पता नहीं चल रहा है। जाहिर है उनकी नौकरी, बीमा आदि से मिले पैसे आदि खर्च होने के बाद परिवार आर्थिक संकट में आया होगा। इसलिए उन्हें बीमे की नहीं, रोजगार-व्यवसाय की जरूरत थी। अगर नौकरी करने की उम्र वाले इन तीनों या इनमें से किसी की नौकरी होती तो शायद तीनों को आत्महत्या नहीं करनी पड़ती। अब सोचिए कि इनका बीमा होता तो किस काम आता। पता नहीं इन मौतों के बाद उस पैसे का क्या होता या होगा। यह देश के विकास के कारण या उसके बावजूद नहीं हुआ हो तो भी आर्थिक स्थिति का बयान तो करता ही है और हाल में आपने जीडीपी बढ़ने की खबर या प्रचार सुना होगा। सरकारी आंकड़ों के बारे में तथ्य या खबरें जो हैं उनका सच मैं नहीं जानता, बहुतों ने उसपर शंका नहीं की और मेरे जैसों ने की तो कुछ बताया नहीं गया। यानी अच्छे जीडीपी की खबर और यह हालत – दोनों साथ चल रही है। प्रचार कुछ और का हो रहा है। जागरण डॉट कॉम का शीर्षक है, जब घर छिनने की नौबत आई तो मां और दोनों बेटों ने चुना फंदा …। यह तथ्य है और तथ्यों की प्रस्तुति का यह मौजूदा तरीका है जो विकास के बाद या विकास की कोशिशों को जारी रखने के लिए चल रहा है।
नवोदय टाइम्स में 13 दिसंबर को ही खबर थी, पहली बार होगी डिजिटल जनगणना, 11718 करोड़ मंजूर। डिजिटल इंडिया में डिजिटल जनगणना ही होगी या होनी चाहिए। डिजिटल इंडिया होने के बाद पहली बार जनगणना हो रही है तो डिजिटल जनगणना भी पहली ही बार होगी। लेकिन अखबार ने इसे पहले पन्ने पर पांच कॉलम में छापा है। यह विज्ञापन के ऊपर की खाली जगह भरने वाली खबर है लेकिन पहले पन्ने पर है तो सरकार का प्रचार भी कर रही है। लेकिन मुद्दा यह है कि मतदाता सूची और एसआईआर के लिए आधार की जरूरत नहीं है या वह नागरिकता का आधार नहीं हो सकता है तो क्या जनगणना के दौरान यह सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए था कि आधार अपडेट हो जाए या जनगणना के साथ कोई कार्ड जारी कर दिया जाए जिससे 18 साल से ऊपर के लोग वोट डाल सकें और मतदाता सूची बनाने के चुनाव आयोग के अधिकार के दुरुपयोग की आशंका ही खत्म कर दी जाए। एसआईआऱ में खर्च होने वाले पैसों से यह काम एक बार में हमेशा के लिए दुरुस्त हो सकता था। पर उसकी चिन्ता किसे है। बीमा कराने वाली सरकार बीमा ही कराएगी और बीमा कराने पर जोर देने के कई कारण हैं जो अखबारों की खबरों और जांच का विषय होना चाहिए लेकिन वह सब अभी यहां मुद्दा नहीं है। एसआईआर और मतदाता सूची से संबंधित विवादों के आलोक में जनगणना के दौरान इस बात की भी जांच कर पुष्टि कर दी जानी चाहिए कि फलां व्यक्ति जनगणना के अनुसार नागरिक है ताकि उसके मतदाता या नागरिक होने पर सवाल नहीं हो। अभी तो ऐसे आरोप या सवाल पर किसी को भी चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है। संभव है भविष्य में यह सब भी हो। पर किसी मतदाता और सांसद के ब्रिटिश नागरिक होने का आरोप और उसे अदालत में स्वीकार किया जाना ऐसी स्थिति है जिसमें किसी की भी नागरिकता पक्की नहीं है और सरकार जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली व्यवस्था लागू करती दिख रही है।
पुराने नियमों से मतदाता सूची में शामिल व्यक्ति नागरिक होता है, एसआईआर विवाद के दौरान यह उभरा कि जिसके पास पासपोर्ट है वह भारत का नागरिक है। राहुल गांधी के पास दोनों है तो जांच की जरूरत क्यों और नागरिक नहीं है तो मतदाता सूची और पासपोर्ट बने कैसे उसकी भी तो जांच होनी चाहिए? क्या शिकायत पर अदालत में सुनवाई और नागरिकता की जांच को मुद्दा बनाने से पहले यह नहीं जांचा जाना चाहिए था कि राहुल गांधी के नाम मतदाता सूची में हैं कि नहीं और हैं तो पासपोर्ट भी है कि नहीं है और सब है तो नागरिकता पर शक क्यों और शक प्रथम दृष्टया दमदार लगता है तो मामले को जल्दी तय करन की जरूरत क्यों नहीं। दमदार नहीं है तो उसपर समय क्यों खराब करना। तथ्य यह है कि डिग्री समेत तमाम दस्तावेजों के फर्जी होने के मामले हैं और इनकी पुष्टि या जांच का काम संबंधित व्यक्ति की हस्ती पर निर्भर दिख रहा है। अभी तो मुद्दा यह भी है कि जनगणना में किन्हें गिना जाएगा और किस आधार पर गिना जाएगा और अगर उसमें भी मतदाता सूची की तरह कई बार नाम हुए तो जनगणना का क्या महत्व रह जाएगा। यह सब बताया गया होता तो खबर होती और नहीं बताया गया तो पूछा जाना चाहिए था पर अब वो सब होता नहीं है।
इसी दिन द टेलीग्राफ में खबर है कि सरकार मनरेगा का नाम बदलने की सोच रही है और निश्चित रूप से यह सरकार के कामों में एक है पर ऐसा उन कामों के साथ जो चल रहे हैं या चलते लग रहा है। इनमें न्यायपालिका को सरकार के दबाव और प्रभाव में लेना शामिल है। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, पूर्व जजों ने कहा कि धमकाइये मत। देश के 56 पूर्व जजों ने विपक्ष पर न्यायपालिका को डराने का आरोप लगाया है। बयान में कहा गया कि महाभियोग की पहल जजों पर दबाव बनाने की रणनीति है। मु्ददा यह है कि पहले ऐसे ख़त सरकार के विरोध में लिखे जाते रहे थे, अब विपक्ष के खिलाफ लिखे जा रहे हैं। पता नहीं कितने लोगों का ध्यान इस तथ्य पर है। विपक्षी दलों ने मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश जीआर स्वामीनाथन के खिलाफ लोकसभा में पेश किए गए महाभियोग प्रस्ताव को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला और न्यायाधीशों को डराने-धमकाने की घृणित कोशिश करार दिया है। इन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला ख़त लिखा है। इनमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश शामिल हैं। वैसे, जजों ने महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस देने की जिस आधार पर आलोचना की है, उसी आधार पर सरकार भी विपक्ष की आलोचना कर रही है। हाल में देश के 272 विशिष्ट नागरिकों ने ऐसा ही किया था। तब उनकी पोल खोली गई थी। इस बार ऐसा करने वालों में देश के पूर्व जज हैं जो सरकार के समर्थन में ऐसे ख़त लिख रहे हैं। संभवतः यह पहली बार हो रहा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


