ठंड, कोहरा और एसआईआर से परेशान देश – खबरें सुप्रीम कोर्ट की, वह भी छुट्टी में हेडलाइन मैनेजमेंट तो नहीं है?

संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में देश और समाज के लिहाज से सुप्रीम कोर्ट के दो बड़े आदेशों की खबर सबसे महत्वपूर्ण है। सभी अखबारों ने इसे पर्याप्त गंभीरता से छापा भी है। मौजूदा दौर में यह खबर और इसे इतना महत्व मिलना इसके राजनीतिक नफा-नुकसान का भी मामला हो सकता है। खासकर तब जब यह सरकार हेडलाइन मैनेजमेंट करती रही है। वैसे भी, दिल्ली में जब प्रदूषण की समस्या है, सुप्रीम कोर्ट में छुट्टी है तब अरावली की चिन्ता है। रजत शर्मा जैसे प्रचारक कह चुके हैं कि दिल्ली में प्रदूषण का कारण तीन ओर पहाड़ों से घिरा होना है तब इसे लेकर जो राजनीति और खबरें रही हैं उसमें यह हेडलाइन मैनेजमेंट भी हो सकता है। भले ही वह अलग मुद्दा है लेकिन इन दो मामलों का एक साथ आना और इनसे जुड़ी राजनीति बताती है कि यह सामान्य नहीं है। हालांकि, यहां मैं छपी खबरों की ही बात करता हूं। फैसला सुप्रीम कोर्ट का है लेकिन मामला राजनीति का भी हो सकता है। देशबन्धु का शीर्षक भी है, सेंगर और सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका। यह दो खबरों के लिए है और इसीलिए एक से सेंगर को और दूसरे से सरकार को झटका लगने की बात कही गई है। उपशीर्षक है, सेंगर को जमानत पर रोक लगाई और अरावली पर अपना ही फैसला पलटा। खबर के अनुसार, सेंगर के मामले में सीबीआई ने विशेष अनुमति याचिका दायर की थी और अरावली मामले में समिति की रिपोर्ट के कार्यान्वयन पर रोक लगाई गई है। सर्वोच्च अदालत ने (उसके आदेश को लेकर) उठ रही चिन्ताओं का हवाला भी दिया है।
द हिन्दू ने दोनों खबरों को अलग-अलग छापा है और बराबर महत्व नहीं दिया है। अरावली वाला मामला लीड है जबकि पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर का मामला सेकेंड लीड है। इसमें सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया, तुषार मेहता ने जो कहा है वह हाईलाइट किया हुआ है। इस प्रकार है, अगर कोई व्यक्ति पीड़ित से ज़्यादा पावरफुल पोजीशन में है, तो इस अपराध को पॉस्को के तहत ‘गंभीर यौन हमला’ माना जाना चाहिए। इसलिए, एक सांसद या विधायक गंभीर यौन हमले का दोषी होगा… इस मामले में, वह उस इलाके का बहुत पावरफुल एमएलए था। अगर शक्तिशाली होना मुद्दा है तो आम आदमी के लिए न्याय क्या है। कानून तो सबके लिए बराबर है। कानूनी तर्कों और उदाहरणों से अलग, मेरी समझ से मामला मुवक्किल को बचाने का है और अगर सीबीआई अपील नहीं करती, आम आदमी सुप्रीम कोर्ट में नहीं जा पाता है तो अभियुक्त बच ही गया था। जो सरकार और अभियुक्त का उद्देश्य हो सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (यानी सरकार) को मददगार बताने और अभियुक्त के बच जाने का कम से कम एक मामला तो है ही। तमाम लोग ऐसे ही तर्कों-कुतर्कों, कानून से बचे हैं और वह अलग मामला है। सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया ने भी यह तर्क तब दिया जब सीबीआई ने मामले को चुनौती दी। इस तरह मुझे लगता है और मैं गलत हो सकता हूं, अभियुक्त को बचाने की कोशिश थी जो भारी विवाद के कारण कामयाब नहीं हो पाई। यह जान बूझकर किया या करवाया गया भी हो सकता है कि इससे सीबीआई की और उच्च स्तर के न्याय व्यवस्था की बिगड़ती साख को संभालने में मदद मिल सकती है। निचली अदालतों में जो हालत है उसपर काफी लिखा-बोला गया है और उसे इतनी आसानी से संभाला नहीं जा सकता है और यह भी अलग मुद्दा है। वरना जिस तर्क पर कुलदीप सेंगर को जमानत मिलना बताया जा रहा है वह विवेक का मामला है और इसीलिए पूछा जा रहा है कि अपनी बेटी के मामले में जज साब क्या करते। कहना बुरा है लेकिन पैसे (या नौकरी) के लिए कौन क्या करेगा और कौन क्या नहीं उसका कोई निश्चित पैमाना नहीं है। पर वह भी मुद्दा नहीं है।
अभी मुद्दा एसआईआर है और संभव है कि इन खबरों के कारण वह पहले पन्ने पर नहीं है जबकि जरूर होना चाहिए था। कोलकाता के अखबार, द टेलीग्राफ ने बंगाल में एसआईआर पर खबर को लीड से ऊपर आठ कॉलम में छापा है और लीड सेंगर की रिहाई को स्टे किए जाने की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में दो कॉलम की खबर है, बंगाल में एसआईआर पर सुनवाई से पहले 82 साल के व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली, 96 साल के व्यक्ति को लाइन में खड़ा होना पड़ा (या कुर्सी होगी तो बैठ गए होंगे)। लेकिन परेशानी सामान्य नहीं है और ये 1971 या 1947 से पहले के घुसपैठिये भी हों तो कानून कार्रवाई कह कर सीधे किया जाना चाहिए। संभव है कि कागज (या सबूत) संभाल कर नहीं रखने की सजा हो पर वह एसआईआर के बहाने क्यों दी जाए। जाहिर है, यह देश की मौजूदा राजनीति से जुड़ा बड़ा मामला है, बड़े समाज को प्रभावित करने वाला है और राजनीति भी इसमें ज्यादा है। जो है वह भी समाज को ही प्रभावित करेगी। अरावली का मामला घूम-फिर कर पैसे और पर्यावरण का मामला है। पर्यावरण को जो महत्व मिल रहा है वह हम जानते हैं और ऐसे में यह पैसे यानी रोजगार-व्यवसाय आदि से संबंधित हो सकता है। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को रोका ही है, विचार करने के लिए कहा है तो वह बड़ी खबर होते हुए भी शायद सेंगर वाले मामले से कम महत्वपूर्ण है। इसलिए, टेलीग्राफ ने एसआईआर पर लिखा है, बंगाल में नाराजगी क्योंकि एसआईआर के सबूत का भार उम्र के बोझ को बढ़ा देता है। जाहिर है कि एसआईआऱ में उन्हें भी अपनी नागरिकता साबित करनी है जो तमाम बीएलओ और चुनाव आधिकारियों के पैदा होने से पहले से वोट दे रहे हैं। वरिष्ठ नागरिकों और बुजुर्ग लोगों की यह समस्या ऐसी है जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान नहीं दिया है और चुनाव आयोग का अधिकार मानकर उसे करने दे रहा है। खबरों के अनुसार, चुनाव आयोग ने सॉफ्टवेयर की गलती के कारण बंगाल में 33 लाख लोगों को शंका दूर करने के लिए बुलाया है और इसमें वरिष्ठ नागरिक तथा बुजुर्ग भी परेशान हो रहे हैं। वह भी तब जब चुनाव आयोग के कंप्यूटर या सॉफ्टवेयर को जिन लोगों का पुराना इतिहास नहीं मिला उसे बंगाल के अधिकारियों ने राहुल गांधी की टीम की तरह छपी हुई मतदाता सूची में ढूंढ़ लिया है।
दि एशियन एज ने दोनों खबरों को तीन कॉलम में छापा है लेकिन लीड सेंगर की खबर ही है। दूसरी खबर के शीर्षक का फौन्ट छोटा है और यह दिल्ली में कोहरे का हाल दिखाने वाली इस फोटो के नीचे है। यह फोटो टाइम्स ऑफ इंडिया में भी तीन कॉलम में है। कैप्शन के अनुसार सोमवार को नई दिल्ली में सर्दियों की सुबह घने कोहरे के बीच स्कूल जाते हुए छात्र जो सड़क पर चल रहे हैं। सुबह 8 बजे इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट और सफदरजंग में विजिबिलिटी 50 मीटर थी, कम विजिबिलिटी की वजह से एयरपोर्ट पर कम से कम 128 फ्लाइट्स कैंसिल की गईं, आठ को डायवर्ट किया गया और लगभग 200 फ्लाइट्स लेट हुईं। नवोदय टाइम्स ने खेत में कोहरा दिखाते हुए एक तस्वीर के साथ खबर का शीर्षक दिया है, आईजीआईसे 128 उड़ानें रद्द।

अमर उजाला की लीड सुप्रीम कोर्ट की दोनों खबरें हैं और लगभग बराबर में हैं लेकिन चौकाने वाली खबर चार कॉलम में लीड के नीचे छपी है। शीर्षक है, 79 हजार करोड़ से होगी हथियारों की खरीद, बढ़ेगी सेनाओं की मारक क्षमता। मुझे नहीं पता है कि सेना की जरूरत क्या है और कितनी है लेकिन मैं देख रहा हूं कि इस सरकार में सैन्य खरीदारी काफी बढ़ गई है। हो सकता है मैं गलत होऊं लेकिन शिक्षा पर खर्च दिखता नहीं और सैन्य खर्च का प्रचार बताता है कि सरकार को शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने की जरूरत ही नहीं है। वैसे भी इसी सरकार के मंत्री ने कहा है कि कमीशन मिलता है और लेना चाहिए। इलेक्टोरल बांड का सच, सरकारी पार्टी को मिले चंदे की राशि और चंदे का प्रतिशत बताता है कि सब ठीक हो नहीं सकता है। बोफर्स सौदा छोटा सा था उसके कुल मूल्य से ज्यादा कमीशन तो किसी भी एक ठेके में मिलता होगा या मिल सकता है। ऐसे में ये खबरें जरूरी भी हों तो प्रचार नहीं हो सकती हैं लेकिन सरकार को इसकी चिन्ता नहीं है। मेरे लिए यही खबर है और इस सरकार की विशेषता। नवोदय टाइम्स की लीड भी सुप्रीम कोर्ट की दोनों खबरें चार-चार कॉलम में हैं।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने अरावली से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के स्टे को लीड बनाया है और इसके साथ पर्यावरण मंत्री तथा विपक्ष का पक्ष भी छापा है। खबर के अनुसार पर्यावरण मंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है जबकि हाल तक उसका बचाव कर रहे थे। अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही आदेश को स्टे कर दिया है और सरकार या पर्यावरण मंत्री इसे भी सही ठहरा रहे हैं। ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को गलत नहीं कहा जा सकता है लेकिन पहले के तर्कों का क्या हुआ? विपक्ष ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश पुनर्परिभाषा का बचाव करने वाले उनके पिछले सभी तर्कों को खारिज करना है इसलिए उन्हें इस्तीफा देना चाहिए। अखबार ने पर्यावरण मंत्री की फोटो के साथ इसे प्रमुखता से छापा है। यहां कोहरे की फोटो के नीचे सेंगर की खबर है और फोटो व खबर दोनों लीड की तरह चार कॉलम में है। आज इस खबर की सबसे अच्छी या सही प्रस्तुति इंडियन एक्सप्रेस की है। दोनों खबरें बराबर नहीं हैं। अरावली की खबर के साथ कोहरे की फोटो है और यह पांच कॉलम की लीड है। सेंगर की खबर दो कॉलम में सेकेंड लीड है। शीर्षक है, जनता की नाराजगी का उल्लेख कर सुप्रीम कोर्ट ने अरावली के लिए 100 मीटर का जो नियम खुद पास किया था उसे स्टे कर दिया। इसके साथ छपी खबर का शीर्षक है, विशेषज्ञों का पैनल छोटी पहाड़ियों, ज्यादा जगह खाली छोड़ने के प्रभाव का अध्ययन करेगा। अखबार ने इससे संबंधित पहले की अपनी दो खबरों के शीर्षक का स्क्रीन शॉट भी लगाया है। इसका कैप्शन है, इंडियन एक्सप्रेस की श्रृंखला की दो रिपोर्ट जो बताती है कि पर्यावरण मंत्रालय ने कैसे विशेषज्ञों की राय की श्रृंखला को नजरअंदाज किया ताकि अरावली के लिए 100 मीटर की परिभाषा पास कराई जा सके। मुझे लगता है कि यह सरकारी दबाव, इच्छा या चाहत के कारण भी हो सकता है और सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश छवि बनाए रखने की कोशिश का भाग है। यह भी संभव है कि यह सब सोची समझी योजना का भाग हो। हालांकि इसमें सरकार का दबाव तो इंडियन एक्सप्रेस की खबरों से ही साफ है और उसके बाद हुए फैसले में जनता का दबाव क्या है कैसे है समझना मुश्किल है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


