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झारखंड

अडानी के लिए सरकारी रिकॉर्ड से ‘गायब’ कर दी गई 832 एकड़ जमीन की असलियत जानें, गोंदलपुरा कोल परियोजना की जनसुनवाई हंगामे के चलते रद्द!

नदी, जंगल, वन भूमि और सरकारी जमीन का नेचर बदला, गोंदलपुरा कोल परियोजना की जनसुनवाई में हंगामा, हुई रद्द!

यशवन्त सिंह-

झारखंड के हजारीबाग जिले में अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड की गोंदलपुरा कोल माइनिंग परियोजना एक बार फिर विवादों में घिर गई है। परियोजना के लिए ग्राम बलोदर, गाली, हाहे, फुलांग और गोंदलपुरा की कुल 832 एकड़ भूमि के सरकारी रिकॉर्ड से जमीन का असली नेचर ही गायब कर दिए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों और आदेशों का उल्लंघन करते हुए नदी, नाला, पोखर, अधिसूचित वन भूमि, गैरमजरुवा जमीन, जंगल और रैयती भूमि की प्रकृति को दस्तावेजों से हटा दिया गया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस जमीन पर खनन शुरू करने की तैयारी की जा रही है, उसके मूल दस्तावेज आज भी मौजूद हैं और वे एक याचिकाकर्ता के पास सुरक्षित हैं, जिन्होंने इस परियोजना के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यानी रिकॉर्ड “गायब” बताए जा रहे हैं, लेकिन उनके अस्तित्व के ठोस सबूत मौजूद हैं।

परियोजना क्षेत्र केवल जमीन का मसला नहीं है, बल्कि यह गंभीर पर्यावरणीय संकट से भी जुड़ा है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार इस इलाके में अनुसूची-एक के अति संरक्षित वन्य जीव, अनुसूची-दो के संरक्षित जीव और अनुसूची-तीन व चार की कई प्रजातियों का नियमित विचरण है। खास तौर पर हाथियों की आवाजाही वाला यह इलाका पहले से संवेदनशील माना जाता रहा है। इसके बावजूद वन्य जीवों की संख्या को कथित तौर पर कम दिखाया गया और वन्य जीव प्रबंधन से जुड़ी आपत्तियों को दरकिनार कर दिया गया।

ग्रामीणों का आरोप है कि पूरी जमीन का रिकॉर्ड जानबूझकर इसलिए गायब कराया गया ताकि अडानी समूह के लिए जमीन हस्तांतरण आसान हो सके और सरकार के जरिए आम लोगों को जबरन बेदखल कर खनन कार्य शुरू कराया जा सके। यही वजह बताई जा रही है कि बीते करीब 950 दिनों से गांव के लोग शिफ्टों में धरना देकर इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं।

फोटो में दिख रहा जनसुनवाई का हंगामा भी इसी गुस्से का नतीजा है, जहां ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि वास्तविक स्थल पर जनसुनवाई कराने के बजाय नदी के पास अस्थायी बैरिकेडिंग कर उन्हें रोका गया और जबरन प्रक्रिया पूरी करने की कोशिश की गई। हंगामे के बाद जनसुनवाई रद्द करनी पड़ी।

देखें वीडियो-

https://x.com/bhadasmedia/status/2014677518457176234?s=46

अब सवाल सिर्फ एक कोल परियोजना का नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या किसी बड़े कॉरपोरेट के लिए सरकारी रिकॉर्ड से जमीन की प्रकृति ही मिटा दी जा सकती है? क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को नजरअंदाज कर जंगल, नदी और सरकारी भूमि को कागजों से गायब करना इतना आसान हो गया है? और अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक है, तो फिर 832 एकड़ जमीन का असली नेचर आखिर किसके इशारे पर रिकॉर्ड से हटाया गया?

झारखंड में गोंदलपुरा कोल परियोजना अब सिर्फ खनन का नहीं, बल्कि कानून, पर्यावरण और आम लोगों के अधिकारों का बड़ा इम्तिहान बन चुकी है।

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