संजय कुमार सिंह
आज मेरे 10 में से तीन अखबारों को छोड़कर सात में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण लीड है। तीन में एक कोलकाता का द टेलीग्राफ है। यहां लीड पश्चिम बंगाल की खबर है जो बंगाल के महंगाई भत्ते के बकाये पर सुप्रीम कोर्ट से आदेश से संबंधित है। मोदी के भाषण की खबर यहां सेकेंड लीड है और शीर्षक से पता चलता है कि भाषण वही है जो हमेशा होता आया है – कांग्रेस उनका ‘अपमान’ करती रही है। दूसरा द हिन्दू है। यहां प्रधानमंत्री का भाषण सेकेंड लीड भी नहीं है। लीड मेघालय के अवैध कोयला खान में ब्लास्ट से 18 लोगों की मौत की खबर है। सेकेंड लीड पीयूष गोयल का बयान है कि भारत अमेरिका व्यापार सौदे से संबंधित वार्ता अभी जारी है। संयुक्त बयान या घोषणा में अभी चार-पांच दिन लगेंगे। आपको याद होगा कि संसद में राहुल गांधी ने पूर्व सेनाध्यक्ष की किताब का अंश पढ़ने की मांग की तो उन्हें पढ़ने नहीं दिया गया था और उनके अड़े रहने से सरकार की अच्छी खासी फजीहत हुई थी। अगले दिन के अखबारों में यह खबर लीड नहीं थी और मैंने यहां लिखा था, सोशल मीडिया पर घोषणा सबसे बड़ी खबर है तो उसके ‘निर्माण’ की क्रोनोलॉजी भी समझिए! जाहिर है, वह खबर गढ़ी गई हो सकती है और आज पीयूष गोयल का जो बयान द हिन्दू में सेकेंड लीड है उससे मेरी इस आशंका को बल मिलता है। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान को लीड नहीं बनाने वाला तीसरा अखबार नवोदय टाइम्स है। यहां अखबार के मूल संस्थान के खिलाफ पंजाब की आप सरकार के दमन की खबर लीड है। शीर्षक है, पंजाब केसरी के खिलाफ आप सरकार का दमन जारी। यहां सेकेंड लीड और टॉप बॉक्स सरकारी प्रचार है, ओला उबर को टक्कर देगी सहकारी भारत टैक्सी। प्रधानमंत्री के बयान वाली खबर यहां तीन कॉलम में है और शीर्षक आम आदमी पार्टी के खिलाफ जो कहा गया है उसे बनाया गया है। फ्लैग शीर्षक समेत पूरा मामला इस प्रकार है : राज्यसभा में नाम लिए बिना पीएम मोदी ने ‘आप’ पर निशाना साधा, कहा – जिनकी सरकार शराब में डूब गई, शीशमहल घर-घर में नफरत का कारण बने, दुनिया को कितना धोखा देंगे। मुझे लगता है कि यह आम आदमी पार्टी के खिलाफ अखबार समूह का निजी मामला है। प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा तो क्यों कहा वे जानें पर अगर ऐसा कहा है तो और उसका उपयोग पंजाब केसरी समूह ने किया है और दोनों ही गलत है।
अखबारों ने आज जब प्रधानमंत्री के बयानों को इतना महत्व दिया है तो पाठकों को पूरा मामला जानना-समझना चाहिए। दि एशियन एज में छपी खबर के अनुसार, एक अभूतपूर्व घटनाक्रम में, लोकसभा ने गुरुवार को विपक्ष के ज़ोरदार विरोध के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पारंपरिक भाषण के बिना राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पास कर दिया। जब लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने विपक्ष द्वारा लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव में संशोधनों पर वोटिंग करवाई, तो मोदी सदन में मौजूद नहीं थे। प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। बाद में लोकसभा ने ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित कर दिया। प्रधानमंत्री को बुधवार को सदन में प्रस्ताव पर जवाब देना था, लेकिन विपक्ष के ज़ोरदार विरोध के कारण भाषण टाल दिया गया। बुधवार के विरोध प्रदर्शनों, खासकर कांग्रेस सांसदों के विरोध का ज़िक्र करते हुए, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने दावा किया कि उन्होंने मोदी से सदन में भाषण देने के लिए न आने को कहा था, क्योंकि विपक्ष की बेंचों से उन्हें “सुरक्षा का खतरा” था। अखबार ने इस खबर के साथ एक फोटो भी छापी है। इसका कैप्शन है, नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने के दौरान राज्यसभा से वॉकआउट करने के बाद विपक्षी सांसदों ने नारे लगाए। अखबार में इससे संबंधित खबर का शीर्षक है, … अपमान नहीं सहेंगे। देशबन्धु के अनुसार, खरगे ने कहा है – सरकार के सच छिपाने की कोशिश से लोकसभा चार दिन से ठप। आज एक खबर यह भी है, बिहार चुनाव फिर से कराने के लिए याचिका दायर। फिर भी ओम बिरला का दावा बड़ी खबर है। उनके पास पक्की जानकारी थी कि कई कांग्रेस सांसद उस जगह पहुंचकर ‘अप्रत्याशित’ कार्रवाई कर सकते हैं जहां प्रधानमंत्री बैठते हैं और इसलिए उन्होंने उनसे सदन में भाषण देने के लिए न आने को कहा। प्रियंका गांधी ने इसे बिल्कुल झूठ कहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री विपक्षी सांसदों से डर कर लोकसभा में नहीं आए। शीर्षक यह भी हो सकता था क्योंकि इंदिरा गांधी को उनके सुरक्षाकर्मियों ने ही मार दिया था और नरेन्द्र मोदी अकेला सबपर भारी, 56 ईंची सीना जैसे दावे करते रहे हैं। लोकसभा से बचने के लिए इस डर या बहाने को गढ़ने की जरूरत का कारण यह हो सकता है कि जनरल एमएम नरवणे की किताब का वह अंश अब सार्वजनिक है जिसके अनुसार प्रधानमंत्री ने सेना को आदेश देने में देर की और जब कहा तो यही कि जो उचित समझो करो जबकि प्रचार यह किया गया था कि सेना को खुली छूट दे रखी है।
द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को कहा कि कांग्रेस का लोकसभा की कार्यवाही में रुकावट डालना राष्ट्रपति, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं, नॉर्थ-ईस्ट के लोगों और संविधान का अपमान है। संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान, मोदी ने “घुसपैठियों को बचाने” के लिए कोर्ट जाने के लिए तृणमूल कांग्रेस पर भी निशाना साधा। मोदी को बुधवार को लोकसभा को संबोधित करना था, लेकिन पूर्व सेना प्रमुख की एक (कथित) अप्रकाशित किताब के अंश पढ़ने की कोशिश करने के बाद राहुल गांधी को बोलने की इजाज़त न मिलने पर कांग्रेस के विरोध के कारण कार्यवाही स्थगित कर दी गई। इसके मुकाबले अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, कांग्रेस ने राष्ट्रपति, दलितों और सिखों का अपमान किया, संविधान शब्द बोलने का भी हक नहीं : मोदी। उपशीर्षक है, प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अभिभाषण पर चर्चा का जवाब दिया, लोकसभा में बने माहौल को दुखद बताया। ऊपर आपने पढ़ा, दि एशियन एज के अनुसार ओम बिरला ने दावा किया कि उन्होंने मोदी से सदन में भाषण देने के लिए न आने को कहा था, क्योंकि विपक्ष की बेंचों से उन्हें “सुरक्षा का खतरा” था। यहां प्रधानमंत्री लोकसभा में बने माहौल को दुखद कह रहे हैं। बेशक विरोध का माहौल दुखद हो सकता है लेकिन दुखद माहौल में अप्रत्याशित के डर से संसद नहीं आना क्या है, पाठक तय करें। रिपोर्टिंग तो जो है सो हईये है। लेकिन बड़बोलेपन में प्रधानमंत्री ने कहा और अमर उजाला ने छापा है, अब डील का मतलब बोफर्स नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि रफाल सौदे की जांच नहीं हुई। स्पष्टीकरण तो नहीं ही हैं और बोफर्स सौदे की जांच हुई थी।

हेडलाइन मैनेजमेंट – खबर एक, सुर्खियां कई बार। कभी लीड, कभी बॉटम। यह मार्च तक का इंतजाम है। तेल रूस से नहीं खरीदेंगे – नहीं कहा है पर वेनेजुएला से खरीदेंगे – कह रहे हैं। समझने वाले समझ जाएंगे। जो ना समझे वो अनाड़ी।
फेसबुक पर मोहम्मद जाहिद की पोस्ट के अनुसार, …. अगस्त 1987 में संसद में इस पर लगातार 2 दिन तक बहस हुई फिर 6 अगस्त 1987 को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित की गयी और फिर इसके बाद भी संसद के कई सत्रों में बहस हुई। 18 जुलाई 1989 को जब जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपी तब भी रिपोर्ट पर बहस हुई। 24 जून 1989 को बोफोर्स पर सीएजी (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट पर लोकसभा में भारी हंगामा हुआ और विपक्ष के 110 में से 106 सदस्यों ने संसद से इस्तीफा दे दिया। यह सब हुआ एक विदेशी स्विडिश रेडियो की खबर पर जिसके कारण राजीव गांधी की सरकार फिर वापस नहीं आई और देश की राजनीति पूरी तरह बदल कर मंडल – कमंडल पर आ गई। भाजपा को दो की जगह 86 सीटों पर जीत मिली। 4 फरवरी 2004 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने बोफोर्स तोप घोटाले में राजीव गांधी को क्लीन चिट दे दी थी और 31 मई 2005 को बोफोर्स घोटाले में सीबीआई द्वारा दायर मामले को खारिज कर दिया गया था। वह अभी भी हो रहा है लेकिन विरोधियों को इसी आधार पर बदनाम करना जारी है। दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को अदालत से मिले क्लिन चिट की चर्चा होती है और इसी दम पर उनके पाक-साफ और बेदाग होने का दावा किया जाता है। कांग्रेस ऐसी राजनीति नहीं करती है और ईंट का जवाब पत्थर से नहीं देने के लिए उसकी आलोचना होती है। राहुल गांधी को पप्पू साबित करने की कोशिश तो चल ही रही है। क्लिन चिट पर गुमान तब है जब जज लोया से लेकर अन्य जजों पर दबाव और जजों को ईनाम देने के मामले भी सार्वजनिक हैं। हेडलाइन मैनेजमेंट सबको समझने में आने वाली चीज ही नहीं है। लेकिन आज बिल्कुल स्पष्ट है। राहुल गांधी ने जनरल एमएम नरवणे और उसकी किताब के अंश पढ़ना चाहा तो उसे प्रकाशित नहीं होने देने के मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए। लेकिन सरकार और मीडिया ने उसे किताब क्रीड़ा में बदल दिया है। उसी दिन अमेरिका से व्यापार करार की घोषणा हो गई। आज भी खबर है कि उसके दस्तावेज आने में 4-5 दिन लगेंगे। व्यापार करार से किसानों की चिन्ता का मुद्दा सामने आया तो लीपा पोती की गई और मूल खबर दबी रही। अचानक मणिपुर में सरकार बनने की खबर आ गई। यह जिस माहौल में हुआ उसमें दो उपमुख्यमंत्रियों में वहां लड़ रहे दो समुदायों में से एक-एक हैं। इससे हालत का अंदाजा लगा सकते हैं और इसकी पुष्टि इससे होती है कि दो में से एक ने दिल्ली से वर्चुअल शपथग्रहण किया। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है, किपगेन को उपमुख्यमंत्री बनाने से मणिपुर में फिर से हिंसा। अगले दिन प्रधानमंत्री को संसद में बोलना था, मुद्दे पर कुछ था नहीं तो संसद में ‘अप्रत्याशित की पक्की रिपोर्ट’ लोकसभा अध्यक्ष ने दी जो सूचना संसदीय कार्य मंत्री को होनी चाहिए थी। इसपर एफआईआर, कार्रवाई की कोई सूचना नहीं है। खबर राज्य सभा में जो कहा गया उसकी है और उसमें जो अभूतपूर्व है वह खबर नहीं है जो भूतपूर्व या पुराना है उसी की खबर है। सोशल मीडिया पर पुरानी किताबों के हवाले से कहा जा रहा है, इसपर बात करें। जबकि मुद्दा यह था कि इस सरकार ने सेना प्रमुख की किताब रोक रखी है।
आज के कई शीर्षक भूत काल की बात करते हैं या भविष्यकाल की – सरकार ने क्या किया उसपर कुछ नहीं है। होता भी नहीं है। आज के शीर्षक आप भी देखिए –
1. देशबन्धु
देश रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार, वोट बैंक की राजनीति में डूबे लोगों ने देश को मजबूती देना प्राथमिकता नहीं समझा। चुनाव चोरी, वोट चोरी, जबरन एसआईआर, उसकी मनमानी और मतदाताओं को परेशान करने, डराने आदि के बावजूद आरोप वोट बैंक की राजनीति करने वालों पर खुद आग लगाने वालों को कपड़ों से पहचानने का दावा कर चुके हैं, मोहम्मद दीपक और तमाम लोगों को परेशान किए जाने पर किसी ने कुछ नहीं किया – फिर भी।
2. दैनिक भास्कर
संसद में हंगामा – विपक्ष की नारेबाजी – वॉक आउट के बीच पीएम एक घंटा 38 मिनट बोले। मन की बात तो करते ही हैं, प्रेस कांफ्रेंस में एक सवाल का जवाब देने में दम फूलने लगता है। लोक सभा में बोलने के लिए तो कुछ था ही नहीं। राहुल गांधी ने अपने पूर्व साथी को गद्दार मित्र कहा तो उसे भाजपा सिखों को गद्दार कहने का मामला बना रही है लेकिन प्रधानमंत्री ने भी कहा है, शातिर दिमाग ‘युवराज’ ने सिख सांसद को गद्दार कहा…। मुख्य शीर्षक है, हम देश को बोफर्स डील से ट्रेड डील तक ले आए हैं। ले तो पीएम केयर्स तक भी आए हैं लेकिन उसे पैसे क्यों मिले किसने दिए, कितने दिए नहीं बताएंगे।
3. टाइम्स ऑफ इंडिया
ई-यू, अमेरिका से करार विश्व स्थिरता के लिए अच्छा संकेत : प्रधानमंत्री राज्य सभा में। यही नहीं, सवाल भी है, कांग्रेस की सरकारें ऐसे करार क्यों नहीं कर पाई? सबको पता है, राहुल गांधी कहते रहे हैं कि, शर्तें ट्रम्प तय कर रहा है। करार पर दस्तखत हुए नहीं हैं, मार्च में होंगे। ईयू का मामला तो कई साल पुराना है। फिर भी यह हिमाकत। खबर और शीर्षक तो है ही। अगर स्थिरता है और सब चंगा सी तो विदेशी निवेश वापस क्यों गया, नया क्यों नहीं आ रहा है, उसके लिए क्या कर रहे हैं?
4. हिन्दुस्तान टाइम्स
मोदी ने व्यापार सौदों की प्रशंसा की, राज्य सभा के भाषण में विपक्ष की आलोचना की। (ऐसा लग रहा है जैसे कह रहा हो, अगर विपक्ष का डर नहीं होता तो लोक सभा में भी नहीं छोड़ते)।
5. इंडियन एक्सप्रेस
प्रधानमंत्री ने कांग्रेस की आलोचना की : मुझे सेवा करते देख नहीं सकते हैं इसलिए कहते हैं, मोदी तेरी कब्र खुदेगी।
मुझे यह शीर्षक सेल्फ गोल जैसा लगता है इसलिए इसपर कुछ नहीं। बाकी के शीर्षकों की चर्चा पहले हो चुकी है। आपको याद होगा कि नरेन्द्र मोदी सत्ता में आए थे तो 50 दिन में, 100 दिन की बात करते थे। झोला उठाकर चल देना था। फिर 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने लगे उसके बाद अर्थव्यवस्था के जापान से आगे निकल जाने का दावा किया जाने लगा। नौकरी, बेरोजगारी और आंकड़ों का जो हाल है उसके मद्देनजर अब सरकार 50 और 100 साल की बात चल रही है। मार्ग दर्शक मंडल में जाने की उम्र होने के बाद। किताबों की बात चल रही है लेकिन इंडिया@100 जैसी किताब लिखवाई गई, सरकारी खरीद की पोल खुली और सब जारी है। उसपर चर्चा नहीं होनी है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


