संजय कुमार सिंह
आज मेरे ज्यादातर अखबारों की लीड बांग्लादेश चुनाव की खबर है। इसमें भारत से यह खबर महत्वपूर्ण है कि बीएनपी की जीत पर बधाई देने वालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आगे रहे। वह भी तब जब शेख हसीना को समर्थन या शरण देने में भी आगे रहे थे। तारिक रहमान को बधाई प्रधानमंत्री ने सुबह नौ बजकर दो मिनट पर दे दी थी। इसके बाद तारिक रहमान ने जवाब दिया या नहीं, यह तो नहीं पता है लेकिन खबर यह भी है कि पार्टी की जीत के तुरंत बाद स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य सलाहुद्दीन अहमद ने कहा कि उनकी पार्टी भारत से आधिकारिक तौर पर आग्रह करेगी कि शेख हसीना को ट्रायल के लिए बांग्लादेश भेजा जाए। शेख हसीना का मामला सरकारी है, अंतरराष्ट्रीय राजनीति हो सकती है पर भारतीय मीडिया महान है कि उसने शेख हसीना के भारत में होने को कोई खास महत्व नहीं दिया। बांग्लादेश की हिन्सा में एक-एक हिन्दू की मौत का हिसाब देने वालों ने इंदौर में सीवर का पानी पीकर मिलने वालों की सही संख्या नहीं बताई और जो बताया, जैसे बताया उसपर यकीन करना मुश्किल है। लेकिन शेख हसीना ने नहीं पूछा और नहीं बताया कि उनकी राजनीति कहां चूक गई या अभी नहीं चूकी है और शरण के लिए उन्होंने मुस्लिम विरोधी या हिन्दू सरकार वाले भारत को क्यों चुना। छिटपुट खबरें आईं पर मामला जो होना चाहिए था नहीं हुआ। प्रधानमंत्री फिर बाजी मार ले गए हैं लेकिन उनकी प्रशंसा अखबारों में नहीं है।
यहां कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का यह कहना गौरतलब है कि जो शौंचालय का उद्घाटन भी खुद करता है वह अमेरिका से करार का प्रचार करने के लिए पीयूष गोयल को आगे क्यों कर रहा है? अमेरिकी असिस्टेंस सेक्रेट्री ऑफ स्टेट एस पॉल कपूर ने कहा है, भारत रूस से तेल खरीदना कम रहा है और अमेरिका से खरीद बढ़ा रहा है। हम यही चाहते थे कि वे ऐसा करें यानी, “भारत वही कर रहा है जो हम चाहते थे”। फिर भी यह भारत के हित में है तो मीडिया वही बता रहा है। इसपर आने से पहले बता दूं कि तारिक रहमान को मोदी की बधाई पर द टेलीग्राफ ने क्या लिखा है। नई दिल्ली डेटलाइन से अनीता जोशुआ ने लिखा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को बांग्लादेश के राष्ट्रीय चुनाव में बीएनपी की जीत का स्वागत किया। उन्होंने इस नतीजे का अधिकतम लाभ उठाने की कोशिश की ताकि भारत को इसका फ़ायदा मिल सके। इस चुनाव में जनता के पास विकल्प ऐसी पार्टियों का था, जिनका भारत के प्रति गुस्सा अलग अलग स्तर का था। नरेन्द्र मोदी पहले विश्व नेताओं में हैं जिन्होंने बीएनपी चेयरमैन और प्राइम मिनिस्टर-इन-वेटिंग तारिक रहमान से बात की। उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, “मिस्टर तारिक रहमान से बात करके बहुत खुशी हुई। मैंने उन्हें बांग्लादेश चुनाव में शानदार जीत के लिए बधाई दी। मैंने बांग्लादेश के लोगों की उम्मीदों को पूरा करने की उनकी कोशिश के लिए अपनी शुभकामनाएं और समर्थन दिया। गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते वाले दो करीबी पड़ोसी होने के नाते, मैंने दोनों देशों के लोगों की शांति, तरक्की और खुशहाली के लिए भारत के लगातार कमिटमेंट को फिर से पक्का किया।”
इससे भी आप समझ सकते हैं कि बांग्लादेश से संबंध के मामले में प्रधानमंत्री कितने सक्रिय और चिन्तित हैं। अमेरिका के मामले में कितने होंगे या अमेरिका से डील का बचाव नहीं कर रहे हैं तो कोई कारण होगा। आप मोदी का समर्थन करते रहिए। मेरे लिए मुद्दा नहीं है। मैं यह कहना चाहता हूं कि अखबार मंत्रियों के झूठ क्यों छाप रहे हैं या छापना चाहें तो छापें उसे प्रमुखता क्यों दे रहे हैं। पहले पन्ने पर क्यों है। उदाहरण के लिए कल के अखबारों में अमेरिकी व्यापार करार पर राहुल गांधी के आरोपों का जवाब पीयूष गोयल और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान – दोनों की ओर से था। आज दि एशियन एज में छपी खबर के अनुसार, राहुल गांधी के वीडियो ने आधी रात के बाद सरकार को पलटवार के लिए प्रेरित किया। इस खबर के अनुसार रात में दिए गए एक दुर्लभ जवाब में, दो केंद्रीय मंत्रियों – वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल तथा कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राहुल गांधी के आरोप का जवाब देने के लिए एक्स का सहारा लिया। दोनों ने राहुल गांधी को “आदतन झूठ बोलने वाला करार दिया और कहा कि वे नहीं चाहते हैं कि किसानों का सशक्तिकरण हो”। खबर के अनुसार, राहुल गांधी ने गुरुवार शाम एक्स पर वीडियो जारी किया। इसके बाद केंद्र सरकार और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बीच देर रात तक ‘बहस’ चली। राहुल गांधी ने केंद्र पर भारत-अमेरिका ट्रेड डील में “किसानों के हितों से समझौता” करने का आरोप लगाया। इससे केंद्र सरकार साफ तौर पर चौंक गई और डैमेज-कंट्रोल मोड में आना पड़ा। दिलचस्प यह कि प्रचारकों को आधी रात ही मैदान में उतार दिया गया।
इस सरकारी प्रचार का असर नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। कृषि मंत्री ने कहा, अन्नदाताओं के भविष्य का सौदा मंजूर नहीं, राहुल गांधी नहीं चाहते कि किसान सशक्त हों। कहने की जरूरत नहीं है कि यह उस सरकार के कृषि मंत्री कह रहे हैं जिसने बिना मांग, बिना पूछे, बिना बताए किसान कानून लागू कर दिया था। एक साल के भारी विरोध और प्रदर्शन के बावजूद किसानों से बात नहीं की और चुनाव से पहले प्रधानमंत्री ने अचानक किसानों से माफी मांग ली कानून वापस ले लिया। तथ्य है कि नरेन्द्र मोदी ने 19 नवंबर 2021 को कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी। कहा था कि कानून किसानों के हित में थे लेकिन सरकार किसानों को समझा नहीं पाई, इसलिए वह उससे पीछे हट रही है। यह भी कहा था, “मैं भारत से और किसानों से माफी मांगता हूँ… हम उनकी चिंताओं को पूरी तरह दूर नहीं कर पाए। अब मैं अपील करता हूँ कि किसान अपने घरों को वापस जाएं और नई शुरुआत करें।” किसानों की कई मांगें आज भी चर्चा में हैं जैसे एमएसपी की विधिक गारंटी, कर्ज माफी, आदि और ये मुद्दे अब भी राजनीतिक रूप से उठते रहते हैं। पर सरकार के लिए ट्रेड डील की इज्जत बचाना ज्यादा जरूरी है। पर मीडिया की निष्पक्षता का क्या हुआ इसपर राहुल गांधी या कांग्रेस का पक्ष क्यों नहीं है। ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी का पक्ष उपलब्ध नहीं है या लेना मुश्किल है।
यह रहा सोशल मीडिया एक्स से कॉपी पेस्ट (मामूली तौर पर संपादित) – 18% टैरिफ बनाम 0% – आइए समझाता हूं, कैसे झूठ बोलने में माहिर प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट इस पर भ्रम फैला रहे हैं। और किस तरह से वो भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से देश के कपास किसानों और टेक्सटाइल निर्यातकों को धोखा दे रहे हैं। बांग्लादेश को अमेरिका में गारमेंट्स निर्यात पर 0% टैरिफ का फायदा दिया जा रहा है। शर्त बस इतनी है कि वह अमेरिकी कपास आयात करें। भारत के गारमेंट्स पर 18% टैरिफ की घोषणा के बाद जब मैंने संसद में बांग्लादेश को मिल रही खास रियायत पर सवाल उठाया, तब मोदी सरकार के मंत्री का जवाब आया – “अगर यही फायदा हमें भी चाहिए, तो अमेरिका से कपास मंगवानी होगी।” आखिर, ये बात तब तक देश से छुपाई क्यों गई? और ये कैसी नीति है? क्या यह सचमुच में कोई विकल्प है – या फिर “आगे कुआं, पीछे खाई” की हालत में फंसाने वाला जाल? अगर हम अमेरिकी कपास मंगवाते हैं तो हमारे अपने किसान बर्बाद हो जाएंगे। अगर नहीं मंगवाते, तो हमारा टेक्सटाइल उद्योग पिछड़कर तबाह हो जाएगा। और, अब बांग्लादेश यह संकेत दे रहा है कि वह भारत से कपास आयात भी कम या बंद कर सकता है। भारत में टेक्सटाइल उद्योग और कपास की खेती आजीविका की रीढ़ हैं। करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी इन्हीं पर टिकी है। इन क्षेत्रों पर चोट का मतलब है लाखों परिवारों को बेरोज़गारी और आर्थिक संकट की खाई में धकेल देना। दूरदर्शी और राष्ट्रहित में सोचने वाली सरकार ऐसा सौदा करती जो कपास किसानों और टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स – दोनों के हितों की रक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करती। इसके ठीक उलट, नरेंद्र “सरेंडर” मोदी और उनके मंत्रियों ने ऐसा समझौता किया है जो दोनों क्षेत्रों को गहरी चोट पहुंचाने वाला साबित हो सकता है।
कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी सरकार के व्यापार करार का यह सच झूठ बोलने वालों के मुंह पर तमाचा है। मीडिया दोनों पक्षों की बात रखने का मामूली सा काम नहीं कर रहा है। सरकार का प्रचार कर रहा है और राहुल गांधी पर निशिकांत दुबे आरोप लगा रहे हैं जो देश के मुख्य न्यायाधीश को भी नहीं छोड़े पर लोकपाल से भी बच चुके हैं। यह इस सरकार की व्यवस्था है और इससे पहले की राहुल गांधी की सदस्यता जाए, जनता को इसे समझने की जरूरत है। राहुल गांधी ने जो कहा है (और वही कही पाते हैं) वह निराधार नहीं है। सरकार के दावों के मुकाबले बहुत भारी है फिर भी निशिकांत दुबे ने एक्स पर लिखा है, 1978 दिसंबर,जब इसी प्रकार के सब्सटेंटिव मोशन के आधार पर राहुल गांधी जी की दादी, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की सदस्यता गई थी और सीधे जेल गई थीं। कहने की जरूरत नहीं है कि तब का मामला अब से बिल्कुल अलग था। या राहुल गांधी को जेल हो ही जाए तो कौन सा बलात्कार या चोरी या एपस्टीन से मिलने जैसे अपराध में होगा। इसका राजनीतिक लाभ मिलने की उम्मीद ज्यादा है फिर भी उनके प्रस्ताव का मकदस राहुल गांधी को बदनाम करना और उनके विरोध से अपने नेता को बचाना है। एक्स पर मैंने उनसे कहा है, ठीक से पता कीजिए, थोड़ा पढ़ लीजिए। उसके बाद इंदिरा गांधी जेल में ही रह गईं या प्रधानमंत्री बनीं, उनके निधन के बाद उनका बेटा बना और उनका पोता आज भी इतना मजबूत है कि आपके आका की नाक में दम किए हुए है। आपको आपके बारे में क्या बताना। लगे रहिए। लेकिन मुद्दा यह है कि खबर सरकार का प्रचार ही है। (जारी)
अगली किस्त पढ़िए : सरकारी प्रचार हो या बांग्लादेश चुनाव, खबर और सूचना देने का काम कोई और करे
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लेखक, संजय कुमार सिंह से संपर्क, [email protected] के जरिए किया जा सकता है।


