कनुप्रिया-
मितरों… आज भारत…विश्व भर में…राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर….लोकल भी और ग्लोबल भी…अपनी बेइज़्ज़ती कराने की दिशा में आत्म निर्भर हो चुका है.
अब हमें ….इसके लिये…विदेशी मीडिया पर ….और देश के युवराज के…..विदेश जाकर भारत सरकार की निंदा और …आलोचना करने पर ..निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं रह गई है.
पिछले 11 सालों में….भारत सरकार ने …अथक परिश्रम और विश्व गुरु विज़न से …ये मुक़ाम हासिल किया है. इसमें हमारे मीडिया का…IT team का और 140 करोड़ भारतीयों का…अप्रतिम योगदान रहा है.
आज विश्व पटल पर अपना …इज़्ज़त का डंका बजवाने के लिये…हमें कहीं बाहर जाने की भी…ज़रूरत नही रह गई है, हम ये कमाल…ये अद्भुत कारनामा घर बैठे ही कर सकते हैं.
कॉंग्रेस घबराई हुई है, वे सोच रहे हैं कि मोदी जी आख़िर इतना सब कुछ कर कैसे लेते हैं. वाह मोदी जी वाह!

चीनी रोबोट.. जिसे गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने अपनी इनोवेशन बताकर दिखाया था, वही रोबोट wipro ने भी AI समिट में TJ रोबोट के नाम से पेश किया। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नाम पर गलगोटिया और wipro द्वारा किया गया पूर्ण शर्मनाक काम है। क्या इसी तरह हम चीन को चुनौती देंगे और विश्वगुरु बनेंगे? -गगन प्रताप, शिक्षक
सुभाष सिंह सुमन-
गलगोटिया ने किया, कोई बात नहीं। एक बार को माफ किया जा सकता है। गलगोटिया जैसों से इस तरह की उम्मीद की जा सकती है। हैरानी नहीं हुई। लेकिन विप्रो? भारत की दिग्गज आईटी कंपनी, 2-3 लाख करोड़ एमकैप वाली कंपनी, दशकों से टेक में काम कर रही कंपनी, और एआई के इतने बड़े समिट में दिखाने के लिए क्या मिला- चीन से 3 लाख में खरीदा डॉग रोबोट! मतलब हद है बेशर्मी की।
लोग पूछते हैं:- अमेरिका चैटजीपीटी, जेमिनी, ग्रोक वगैरह कर रहा। चीन डीपसीक और सीडांस कर रहा। हम क्या कर रहे?
इसके लिए एक कहानी है मजेदार।
तीन दोस्त हैं। एक जापानी, एक अमेरिकी, और एक भारतीय। तीनों मिलकर एक नया विमान बनाने पर काम कर रहे हैं। जापानी बंदा एकदम अनोखे तरीके का इंजन बना लाता है। अमरीकी बंधु सॉलिड बॉडी बनाता है प्लेन का। भारतीय प्राणी सोच रहा- अब मैं क्या करूँ? तो उसने उठाया पेंट। प्लेन पर छापा तिरंगा और उसके नीचे कैपिटल लेटर्स में लिख डाला ‘मेड इन इंडिया’।
यह कहानी दशकों पुरानी है। पहली बार किसने सुनायी थी, याद नहीं। कहानी आज भी कितनी ताजी लग रही है!
और ये सिर्फ एआई या टेक तक की बात नहीं है। पिछले महीने महिंद्रा की नयी 7XO आयी। कंपनी का दावा- इसमें दुनिया का पहला द विंची सस्पेंशन है। उसके बाद कंपनी के पीआर ने कुछ रुपये छींटे। ऑटो इनफ्लुएंसर और ऑटो जर्नलिस्ट टाइप प्राणी शुरू हो गये। दुनिया का पहला ये और दुनिया का पहला वो। किसी ने ये खोजने का प्रयास नहीं किया कि द विंची सस्पेंशन आखिर चीज क्या है? यह कई दशकों से इस्तेमाल हो रहा एफडीडी मैकेनिकल सस्पेंशन ही है। जीप की कार वाले इसे जमाने से यूज कर रहे हैं। इवन टाटा के पास भी पहले से ऐसा सस्पेंशन है।
सार: जैसे महिंद्रा ने जमाने पुराने फ्रीक्वेंसी डिपेंडेंट डैम्पिंग को दुनिया का पहला द विंची सस्पेंशन बता दिया, वैसे ही चाइनीज कंपनी यूनिट्री के 3-3 लाख में बिक रहे डॉग रोबोट को विप्रो ने टीजे और गलगोटिया ने ओरियॉन बनाकर अपना बता दिया। इंडियन इनोवेशन के जन्नत की हकीकत यही है। कुछ न करो, बस नाम नया दे दो। टेक छोड़ो, डिजाइन भी अपना मत बनाओ। मिनी कूपर का इग्निस बना दो, रैंगलर का थार बना दो। हो गया इनोवेशन।
दिनेश पाठक-
गलगोटिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने कुछ महीने पहले दिल्ली में अपने अ-ज्ञान से भद्द पिटवाया तो अब बड़बोले प्रोफेसर्स ने। दोनों ही कमाल के काम दिल्ली की धरती पर हुए। फर्क इतना है कि इस बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने नाम कमाया। यह और बात है कि देश का नाम पूरी दुनिया में बदनाम करवा दिया।
मैं यह तो नहीं कहूँगा कि सरकार इस विश्वविद्यालय को बंद करवा दे, हाँ, यह जरूर कहूँगा कि यूजीसी, राज्य सरकारें, जरूर सोचें कि जिन्हें विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दे रहे हैं, उनके पास केवल पैसा ही है या शिक्षा को लेकर कोई विजन भी है।
दो दिन पहले देश के एक बड़े कॉरपोरेट हाउस के सीओओ से मुलाकात हुई। संयोग से इंजीनियरिंग शिक्षा पर बातचीत शुरू हुई तो उन्होंने इसी विश्वविद्यालय का एक किस्सा शेयर किया। वे खुद मैकेनिकल इंजीनियर हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट के रूप में उन्हें बुलाया गया था। बताने लगे कि मैकेनिकल विभाग का जो मिशन और विजन विश्वविद्यालय ने दिखाया, उसका रिश्ता दूर-दूर तक मैकेनिकल से नहीं था। पूरा कंटेंट सीएस/एआई से प्रेरित लग रहा था।
AI समिट में जिस चीन के रोबोट को गलगोटिया विश्वविद्यालय ने अपनी खोज बताया। दूरदर्शन ने जिसे देश का नाम रोशन करने वाला बता दिया। उसे चीन ने अपना प्रोजेक्ट बताकर हम सबको धो दिया। अब इस विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गाल बजाते हुए देखे जा रहे हैं।
जब शिक्षण संस्थान को व्यापार का अड्डा बनाया जाएगा तो इस तरह की ही बदनामी होगी। निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता देते समय कड़े रेगुलेशन की जरूरत है। अनेक कथित सख्ती के बावजूद देश में फर्जी विश्विद्यालय चल रहे हैं। यह सूची साल में एक बार यूजीसी जारी ही करता है।
निजी विश्वविद्यालयों के जरिये देश में कोई भी डिग्री खरीदी जा सकती है। बस पैसा होना चाहिए। महत्वपूर्ण यह भी है कि उस डिग्री को कोई फर्जी नहीं कह सकता क्योंकि विश्वविद्यालय पैसे के लिए हर कागजी कार्यवाही पूरी करके ही डिग्री दे रहे हैं। यही यूजीसी एक ऐसा नोटिफिकेशन जारी कर देता है, जिससे देश में जातीय जहर घुल चुका है। ऐसे में जरूरी है कि सरकारें सोचें और ठोस कदम उठाएं।


