न हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा हमारा एआई MANAV बनेगा। काश! हमारी मांओं ने हमें इंसान बनाया होता, सिखाया होता कि राजगद्दी के लिए लड़ना पड़ता है, पिता से भी। नहीं तो वनवास भुगतने में भी प्रशंसा है और पिछले दरवाजे से राज चलाने में भी।
संजय कुमार सिंह
इसमें कोई दो राय नहीं है कि एआई सम्मेलन का एक मकसद हेडलाइन मैनेजमेंट भी है। आज के अखबारों से यह साफ दिख रहा है और यह भी दिख रहा है कि इसे बताने के लिए वास्तविक ‘आई’ यानी बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल दैनिक भास्कर ने किया है। बाकी कई अखबार अपने ‘आई’ यानी आका के डर या चकाचौंध में रह गए। आज मेरे दस अखबारों में द हिन्दू अकेला है जिसकी लीड इस समय की खबर है। इस खबर का शीर्षक है – चुनाव आयोग ने कहा 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अप्रैल से एसआईआर की उम्मीद है। सरकार ने बाकी सभी अखबालों को अपने साथ कर लिया है और द हिन्दू शायद छूट गया या अलग रह गया। इसलिए आज अखबारों में यह चिन्ता तो है कि सम्मेलन में बिल गेट्स नहीं बोले पर यह नहीं समझ में आ रहा है कि भारत की तरफ से आयोजन के अलावा क्या था या गलगोटिया से जो नुकसान हुआ उसकी कितनी भरपाई हुई या सब कुछ उन्हीं मंत्री या मंत्रालयों या पीआईबी के ही भरोसे रहा। ये सब नुकसान के बाद उसका असर कम करने में ही लगे रहे। अभी तक, जिस ढंग से हेडलाइन मैनेजमेंट होता रहा है उसी तरह हुआ। अंतिम समय में राहुल गांधी को बोलने के लिए आमंत्रित करके या आगे करके या कुछ नया करके स्थिति को संभालने की कोई कोशिश नहीं हुई। इस तरह विदेशों में जो गलगोटिया हुआ है उसकी भरपाई आज देशी अखबारों के बल्ले-बल्ले से नहीं होगी। मुझे लगता है राहुल गांधी अपनी बातों से बहुत कुछ संभाल भी सकते थे। लेकिन, मुद्दा जब भय, भविष्य, भारत, भाग्य और MANAV (मानव) विजन के जरिए 2047 में उलझाए रखना होगा तो कोई यह नहीं बताएगा कि जैसे मानव विजन बन सकता है वैसे ही GANDU (Gifted, Accomplished, Noble, Decisive, Unstoppable) योजना रची जा सकती है। इसकी सफलता का उदाहरण भी है। हालांकि यह प्रचार के लायक नहीं था इसलिए योजना रचने वाले ने ही इसे रोक दिया।
आज स्थिति यह है कि देश अपनी आबादी के बड़े हिस्से के योगदान के बिना चल रहा है। विपक्ष को दुश्मन मान लिया गया है जबकि सरकार पक्ष-विपक्ष के सहयोग से ही सही और सबके लिए काम कर सकेगी। 2014 से पहले तक यही होता रहा है और अब जो हो रहा और उसका जो असर है वह सब दिख रहा है। जो नहीं देखना चाहे उसकी बात अलग है। मीडिया की मजबूरी या पसंद अपनी जगह है ही। प्रधानमंत्री 140 करोड़ लोगों की ओर से अकेले निर्णय कर रहे हैं और घोषणाएं कर दे रहे हैं। उन्होंने कह दिया और अखबारों में छप गया, “एआई भय नहीं, भाग्य और भविष्य : मोदी”। सच्चाई यह है कि पिछले छह महीने से अनुवाद का मेरा धंधा लगभग बंद है। सुप्रीम कोर्ट बता चुका है कि वकील एआई से याचिकाएं बनवा रहे हैं। पर कहने भर से भय न हो यह कैसे संभव है। सच्चाई यह है कि ना कोई योजना है ना घोषणा ना पैसे ना बजट। बातें बड़ी-बड़ी। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने भारत को एआई इको सिस्टम का प्रमुख हिस्सेदार बनाया। हालांकि, इसके साथ छपी तस्वीर में भारत सबसे अलग और बूढ़ा दिख रहा है। इस अलग होने में विशेषता नहीं है, बुढ़ापे में अनुभव और सहयोग नहीं – अकेलापन और अकेले ही सब कर लेने का गुमान है और इसलिए एआई में भी मानव विजन दिखाया जा रहा है जबकि काम और इतिहास सबको पता है। इसमें साहिर लुधियानवी का लिखा, ना हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा इनसान की औलाद है इनसान बनेगा…. शामिल है। इनसान को हिन्दू मुसलमान और जाति में बांटने और बांटने वालों को नहीं संभाल पाने के बाद अब एआई का मानव विजन मेरे हिसाब से कोई मतलब नहीं रखता है। फिर भी लोकतंत्र है और निर्वाचित प्रधानमंत्री का अपना महत्व है। यह अलग बात है कि संवैधानिक संस्थाओं को उनके निर्वाचन से लेकर सत्ता में बने रहने की कोशिशों से कोई दिक्कत नहीं है और इसमें हेडलाइन मैनेजमेंट शामिल है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, मोदी ने समावेशी एआई की अपील की, MANAV ढांचे का खुलासा किया। यही नहीं, खबर का इंट्रो है, एआई से दुनिया को फायदा तभी होगा जब साझा किया जाए। कहने के लिए यह सब अच्छा है पर बांटों और राज करो, कौन नहीं समझ रहा है। विरोध करने वाले को देश विरोधी बता दिया जाए चाहे वो राहुल गांधी हों या सोनम वांगचुक लेकिन एआई को साझा करने की सलाह। सोनम वांगचुक को जमानत न मिले इसके लिए सरकारी वकील के तर्क सुनिए। पर वह अलग मुद्दा है।

मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री की प्रशंसा में इंडियन एक्सप्रेस और आगे निकल गया है। MANAV विजन के बारे में प्रधानमंत्री ने जो लिखा है उसे मैंने पहली ही लाइन के बाद नहीं पढ़ा। मैं जानता हूं और मानता हूं कि प्रधानमंत्री यह काम अच्छा करते हैं और उन्हें यही करना चाहिए था। उनका और देश का भी भला हुआ होता। पर प्रधानमंत्री के रूप में एआई का विजन बनाने के लिए नरेन्द्र मोदी अगर मोरल और एथिकल होने की बात करें तो यह नैतिक टू द पावर टू की तरह है। इसकी अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती है और इसलिए मैंने आगे पढ़ा ही नहीं। आज यह हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा है। हिन्दी के कई अखबारों ने जब एआई को भारत के लिए भय नहीं भविष्य बताया है तो इंडियन एक्सप्रेस ने फॉरच्यून, फ्यूचर और फीयर की बात की है। अभी मैंने डिक्सनरी में देखा कि मोरल मतलब – शिक्षा, सीख, सूक्ति, नीतिवचन, आचार, आचरण आदि भी होता है। मुझे लगता है कि एआई मतलब आई कहने के बाद यह आयोजन और प्रयास हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए ही है। हरदीप पुरी के एप्सटीन से मिलने के कारणों का खुलासा नहीं होने और किसी विदेशी पूंजीपति के लिए भारत में ‘आपका आदमी’ करार दिए जाने जैसे उपलब्ध सबूतों के आधार पर पवन खेड़ा यह आरोप लगा चुके हैं कि ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन भी खेल है और शायद इसके बारे में बाद में पता चले। यह अलग बात है कि सरकार की दो बैसाखियों में से एक ने बिल गेट्स की पूरी मेहमानवाजी की लेकिन दिल्ली में एआई सम्मेलन से उन्हें बेदखल कर दिया गया। ‘सूत्रों की’ खबर फैलाकर स्थिति टटोलने के बाद और आज भी यह साफ नहीं है कि बिल गेट्स खुद नहीं आए या उन्हें रोका गया। खबर दोनों है कि वे खुद नहीं आए और उन्हें रोक दिया गया। बिल गेट्स फाउंडेशन ने यह कहा, वह कहा और यह भी कि वक्ताओं की सूची से उनका नाम हटा दिया गया था।
जाहिर है, प्रचार की भूखी, प्रचारकों के दम पर चल रही सरकार प्रचार का कोई मौका नहीं चूकती। एआई सम्मेलन में भी यही हुआ है। खबर अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर दी जाती है। आज भी है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, “एआई क्रांति को आकार देने, इसे ‘समावेशी’ बनाने के लिए प्रधानमंत्री ने भारत के ‘मानव-केंद्रित’ दर्शन का खुलासा किया”। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, कृत्रिम लेकिन मानवीय दृष्टि। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, मोदी ने डीपफेक के खतरे को ध्यान में रखते हुए समावेशी मानव सिद्धांत को सामने रखा। इस खबर के साथ हाईलाइट किया हुआ हिस्सा है, रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने एआई इंपैक्ट समिट में एलान किया कि अगले सात वर्षों में आरआईएल और जियो एआई पर 10 लाख करोड़ रुपए का निवेश करेंगे। हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स में सात कॉलम का शीर्षक है, “एआई भय नहीं, भाग्य और भविष्य : मोदी”। उपशीर्षक है, कदाचार की संभावनाओं को असीमित बताते हुए नैतिक उपयोग के लिए दिए सुझाव। आज ही, अमर उजाला डॉट कॉम की एक खबर है, एआई वीडियो हटाने पर भड़की कांग्रेस: भाजपा पर लगाया बड़ा आरोप, सुप्रिया श्रीनेत बोलीं- ‘पीएम मोदी सच से डर गए’। यह खबर हो सकता है पहले पन्ने के लायक नहीं हो लेकिन आज ही है यह संयोग हो या प्रयोग – महत्वपूर्ण है। खबर के अनुसार, कांग्रेस पार्टी ने गुरुवार को केंद्र सरकार पर बड़ा हमला बोला। पार्टी ने आरोप लगाया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल करके बनाए गए उसके नौ वीडियो को बीजेपी सरकारों ने जबरन डिलीट करा दिया। कांग्रेस ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को असहमति की हर आवाज को दबाने के बजाय देश के हित में काम करना चाहिए। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ नियमों का खुला गलत इस्तेमाल हो रहा है। कांग्रेस की सोशल मीडिया हेड सुप्रिया श्रीनेत ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि मोदी सरकार भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षमता का गला घोंटने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, एआई में भय नहीं भविष्य देख रहा भारत, मगर मानव का नियंत्रण जरूरी : मोदी। देशबन्धु की लीड का शीर्षक भी एआई पर मोदी की कल्पना या उम्मीद है। शीर्षक है, “एआई में भविष्य देख रहा भारत : मोदी।
मुझे लगता है आज दैनिक भास्कर में यह खबर, खबर की तरह है और पहले पन्ने पर ही काफी विस्तार है। मुख्य खबर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हवाले से है और शीर्षक है – क्या एआई से बना, क्या असली है…. लेबल करना जरूरी है। इस मामले में सरकार के खेल, योजना, चाहत और व्यवहार से संबंधित खबर रोज हो सकती है पर नहीं के बराबर छपती है। आज दैनिक भास्कर में चार कॉलम का शीर्षक है, अंबानी एआई को सस्ता करेंगे (ओपन एआई के सीईओ) सैम ऑल्टमैन ने कहा, सुपर ब्रेन बन जाएगा एआई। और अखबारों के साथ दैनिक भास्कर में फोटो के साथ कितने दूर-कितने पास… के तहत बताया गया है, ग्रुप फोटो में ऑल्टमैन-डारियो ने हाथ नहीं थामा, सैम बोले – समझ नहीं आया, क्याा करूं? कहने की जरूरत नहीं है कि, फोटो ठीक हो गई होती, यह सब विवाद नहीं छपता तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा संदेश जाता या दिया जा सकता था। वह भी नहीं हुआ। कोशिश हुई सो सबको समझ में आ गया। इससे संबंधित मजाक जो चले वो अपनी जगह। दैनिक भास्कर में एक और सूचना पहले पन्ने पर है, फ्रांस के राष्ट्रपति ने कहा-डिजिटल इंफ्रा में भारत ने जो किया, वो कई नहीं कर सकता। भाजपा के लोग भी इसका खूब प्रचार करते हैं लेकिन आज ही खबर है, यूपीआई फ्रॉड पर सख्ती की मांग, केंद्र सरकार आरबीआई और एनसीपीआई से जवाब तलब। खबर के अनुसार, दिल्ली हाई कोर्ट ने ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यूपीआई फ्रॉड के मामलों पर केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता पंकज निगम के मुताबिक, फरवरी 2024 में किराए का अपार्टमेंट ढूंढते समय उनसे ₹1.24 लाख की ठगी हुई। शिकायत के बावजूद, न तो पैसे वापस मिले और न ही अपराधियों की पहचान शेयर की गई। सरकार डिजिटल इंडिया की तारीफ तो करती है, संबंधित लाभ का श्रेय भी लेती है लेकिन यह पता नहीं चल रहा है कि डिजिटल फ्रॉड, लूट और गिरफ्तारी के जरिए लूटे गए सैकड़ों करोड़ रुपए कहां गए। आम आदमी की सुनवाई नहीं है और अदालतों में जमाना गुजर जाए। पर सब चल रहा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


