ज्ञानेश्वर वात्सायन-
Google/ YouTube आधारित Media Industry गंभीर संकट के दौर में पहुंचा है. YouTube ने नवंबर महीने में ही Algorithm ऐसे बदला कि Channel चाहे जो हो, उनके कुल Views 60 प्रतिशत तक गिरा दिए गए. फिर जब Views गिरा, साथ में कुछ और, तब मोनेटाइजेशन भी 70 प्रतिशत तक कम हो गए. परिणाम, व्यक्ति आधारित चैनलों को छोड़ दें, तो संस्थागत चैनलों में नई भर्ती बंद हो गई है, मैनपावर कम किये जा रहे हैं. अपवाद स्वरुप नई भर्ती हो भी रही, तो मिनिमम गारंटेड पेमेंट से अधिक के लिए व्यूज प्राप्ति का टारगेट तय किया जा रहा.
Facebook ने कई साल पहले ही Video News के लिए पैसे देने करीब-करीब बंद कर दिए थे. बस, Views के लिए लोग यहां कंटेंट अपलोड कर रहे हैं. #LiveCities को ही पुराने दिन याद हैं, जब कभी Facebook पर 1 मिलियन व्यूज होने पर हम संबंधित रिपोर्टर और एडिटर को 5100 रुपये की पुरस्कार राशि देते थे. जाहिर तौर पर, इसके बाद भी संस्थान को कुछ बचता था. लेकिन, अब तो 1 मिलियन व्यूज पर Facebook से 1 Dollar मतलब 90 रुपये भी मिल जाए, तो बड़ी बात होती है.
ऐसे में, Facebook भले पैसे नहीं दे रहा था, लेकिन YouTube दे रहा था. पर, बदले अल्गोरिथम में यह सब भी करीब-करीब खत्म. YouTube में पहले क्या होता था, यह समझिए. माना, आपने किसी बड़े इवेंट या प्रेस कांफ्रेंस की वीडियो Youtube पर जाते ही देख ली. अब YouTube ये करता था कि इस इवेंट/घटना/प्रेस कांफ्रेंस से रिलेटेड अन्य चैनल का वीडियो भी आपको रिकमेंड कर देता था. इससे व्यूज सबों को आते थे. लेकिन, अब ये सिलसिला खत्म. YouTube कह रहा, Repetitive Content नहीं.
आशय ये कि अगर आपने एक देख लिया, तो इससे जुड़ा दूसरा नहीं मिलेगा. किसी खास चैनल का फिर भी देखना हो, तो आप सर्च कीजिए. इतना लोड कोई नहीं लेता. दूसरा अर्थ यह कि बहुत वीडियो बनाने का जमाना नहीं रहा. नेताओं के बयान को YouTube भाव नहीं दे रहा, Explainer और Decoder की जरुरत है. मतलब, अनुभव काम आएगा.
क्राइम की घटनाओं से संबंधित खबरों को लेकर पहले भी कम्युनिटी गाइडलाइन्स थी. लेकिन, अब YouTube बहुत सख्त हो गया है. इन खबरों के सर्कुलेशन को कंट्रोल कर रहा, ज्यादा दिखा रहे चैनल के टोटल व्यूज को धीरे-धीरे कम कर दे रहा है. मर्डर-रेप-सुसाइड तो YouTube के बर्दाश्त के बाहर है. क्राइम की खबरों के वीडियोज पर अब सबसे कम पैसे मिल रहे हैं.
कई बार हमने पहले भी कहा है कि बेरोजगारों के वीडियो बहुत चलते हैं, लेकिन इन वीडियोज पर पैसे नहीं के बराबर आते हैं. कारण, Google की स्पष्ट मान्यता है कि वीडियो देखने वाले स्वयं बेरोजगार हैं, उनके पास कुछ खरीदने को पैसे नहीं हैं, तो फिर ऐसे कंटेंट पर स्टैंडर्ड विज्ञापन, जो पैसे देते हैं क्रिएटर को, वह नहीं चलाए जा सकते.
कुल हाल ये है कि बहुत सारे वीडियोज का जमाना गया. हम अपनी बात कहें, रेवेन्यू जिस तरह गिरा है, यदि हम ढेर सारे वीडियो पब्लिश न कर दिन भर में सिर्फ 4-5 वीडियो ही थोड़े और बेहतर तरीके से पब्लिश करें, तब भी उतना ही पैसा आएगा, जितना अभी ढ़ेर सारे से आ रहा है. लेकिन, हमारे जैसे सभी संस्थान साथियों का क्या करें, यह मुश्किल तो है. हां, जो नंबर में आगे रहे हैं, वे आगे भी रहेंगे, गप-गॉसिप हर महीने आपको आगे लेकर नहीं जा सकता. विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी है.


