
विकास मिश्रा-
आईआईएमसी के हम सभी सहपाठियों की ये तस्वीरें दिल्ली के प्रेस क्लब की हैं, जहां अपने ही सहपाठी मित्र राहुल की श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था। असहज करने वाला मौका था, क्योंकि महफिलें तो हम लोगों ने बहुत सजाई थीं। मिलन के समारोह हर साल हुए, लेकिन शोक सभा का अनुभव पहला था। खुद को यकीन दिला पाना मुश्किल था कि अपना कोई दोस्त अपने ही बीच से फ्रेम में जड़ी तस्वीर की अमानत हो गया।
दिल्ली में मौजूद करीब करीब सभी साथी इस शोक सभा में शामिल हुए। मित्रों से मैंने कहा कि फ्रेम में जड़ी तस्वीर ही आखिरी हकीकत है, इस नाते जो भी समय है, अपनों से मिलने-जुलने, प्यार पाने और बांटने में इसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें। क्योंकि कोई भरोसा नहीं कि मौत कब आए, किस बहाने से आए और चील की तरह झपट्टा मारकर अपने साथ ले जाए।
मेरे रिश्ते में एक परनाना थे, बड़े जमींदार थे। बाल सफेद होने लगे तो उन्होंने बनारस में बाकायदा कोठी बनवा ली। नाम भी गांव के नाम पर रखा गया-‘बलुआ कोठी’। ऐसा मानना है कि बनारस में मृत्यु अगर हो तो सीधे मोक्ष मिलता है। इसी आकांक्षा में हजारों बुजुर्ग बनारस में ही रहते हैं। खैर, परनाना जी बनारस में ही रहने लगे, उनके जैसे कई और बुजुर्गों के लिए भी कोठी के दरवाजे खुले रहते थे। बीच-बीच में वे अपने गांव बलुआ भी जाते रहते थे। लेकिन ज्यादा रुकते नहीं थे, बनारस चले आते थे। एक बार गांव से निकले, गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर ही अचानक दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। बनारस में अपनी उस कोठी तक नहीं पहुंच पाए, जिसे उन्होंने खास तौर पर इसीलिए बनवाया था, ताकि उसी कोठी में ही वो अंतिम सांस लें।
रोज सुबह अखबार खोलता हूं तो सड़क दुर्घटना में अक्सर लोगों के मारे जाने की खबरें छपी मिलती हैं। उन ऑडी, बीएमडब्लू, मर्सडीज एक्सीडेंट में लोगों के मारे जाने की खबरें छपती हैं, जिन कारों ने सेफ्टी से जुड़े सभी टेस्ट पास किए थे। एक वीडियो आया था, जिसमें एक ऑडी कार में सवार होकर चार लोग जा रहे थे। पति-पत्नी, ढाई साल का बच्चा और बच्चे की दादी। बगल में बालू लदा ट्रक जा रहा था, अचानक ट्रक पलट गया और गाड़ी पर गिर गया । कार में सवार सारे लोग इस हादसे में मारे गए, चमत्कारिक ढंग से मासूम बच्चा जिंदा बच गया।
मुझे लगता है कि हमारे जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि ‘हम जिंदा हैं, जिंदा बचे हुए हैं।’ हम अगर जी रहे हैं तो उसका सबसे बड़ा पहलू यह भी है कि हम रोज मौत को मात दे रहे हैं। सड़क पर किसी हादसे से बचकर घर पहुंच रहे हैं। ब्रेन हेमरेज से बच जा रहे हैं। हॉर्ट अटैक से बच जा रहे हैं। कैंसर से बचे हुए हैं, किसी पुल के नीचे दबने से बच जा रहे हैं, किसी मकान की छत ढहने से बच जा रहे हैं, भूकंप में बच जा रहे हैं, बाढ़ में बच जा रहे हैं, बर्फबारी में दबने से बच जा रहे हैं। मुझे तो लगता है कि सबसे बड़ा ‘डेयर-डेविल’ शो तो इंसान का जिंदा रहना और बच जाना ही है।
अक्सर मैं वाद विवाद से बचता हूं, बेकार की बहस से बचता हूं, झगड़ों से बचता हूं। कई बार यह होता है कि या तो तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो मैं तुम्हारी बात मानने के लिए 100 फीसदी तैयार हूं। कोई फिफ्टी-फिफ्टी की बात नहीं। क्योंकि मेरा मानना है कि ये जिंदगी तो प्रेम के लिए ही बहुत कम है, अब इसी में से झगड़े का भी टाइम निकालें..?
मेरी दिनचर्या बरसों से यही है कि दिन में थोड़ा भारी नाश्ता करके घर से निकलता हूं, फिर सीधे रात में खाना खाता हूं। कोशिश रहती है कि रात में अच्छा खाना अच्छी तरह से खुश होकर खाऊं। (हालांकि मोटापे का भी यही सबसे बड़ा कारण है) क्योंकि मुझे लगता है कि क्या पता सुबह आंख खोलने का मौका ही न मिले और आत्मा को अफसोस हो कि जिंदगी का आखिरी भोजन मजेदार नहीं था। सिर्फ भोजन ही नहीं, कोशिश यही रहती है कि सोते वक्त ना तो खुद तनाव में रहूं न ही परिवार तनाव में रहे। क्योंकि क्या पता इस रात की सुबह हो या नहीं।
महानगरीय संस्कृति में हम जो जिंदगी जी रहे हैं, उसका बड़ा हिस्सा तो भविष्य की सोच में ही गुजर जा रहा है। कितना बीमा करवा लें, कितना बैंक बैलेंस बना लें, कितनी प्रॉपर्टी बना लें, ताकि भविष्य सुरक्षित रहे, ये सोच तनाव देती है। हम उतनी चिंता अपने आज की नहीं करते, जितनी भविष्य की करते हैं। भविष्य की चिंता मुझे भी होती है, लेकिन इतनी नहीं कि आज का आनंद खो दूं। बड़ी चिंताएं, बड़ी जिम्मेदारियां कंधे पर ले रखी हैं।
तमाम लोगों की उम्मीदों का बोझ भी कंधे पर है। इस नाते मैदान छोड़कर भाग भी नहीं सकता। कोई भी नहीं भाग सकता। न तो आप और न ही हम। फिर भी हम अपनी जिंदगी जीने के लिए आनंद के लिए कुछ वक्त तो निकाल ही सकते हैं। क्योंकि हम अगर जिंदा हैं तो यह ईश्वर का बहुत बड़ा चमत्कार है, ईश्वर ने चाहा है कि हम जिंदा रहें। ईश्वर शायद यह भी चाहता हो कि जिन्हें उसने जिंदगी बख्शी है, वे इस जिंदगी को भरपूर जियें, आनंद के साथ जियें। बरसों पहले साहिर साहब भी लिख गए थे-
न जाने कौन सा पल मौत की अमानत हो।
हर एक पल की खुशी को गले लगा के जियो।
(इस पोस्ट में कुछ संदर्भ 7 साल पुरानी पोस्ट से लिए गए हैं)
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