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लखनऊ में इरफान की मौत ने फिर जाहिर कर दिया, पत्रकारिता शौक हो सकता है.. प्रोफेशन नहीं!

बिलाल एम जाफ़री-

पहले पत्रकार/ कार्टूनिस्ट फ़ैज़ान मुसन्ना अब लखनऊ में ही बहुत ही कम उम्र में अमर उजाला के सहाफ़ी इरफ़ान भाई का जाना… बड़े संस्थान के एक अदना से पत्रकार की मौत ने फिर ज़ाहिर कर दिया “पत्रकारिता पैशन हो सकती है, शौक़ हो सकता है, प्रोफेशन नहीं. घर चलाने, परिवार पालने का माध्यम तो बिल्कुल भी नहीं.

दिवंगत पत्रकार मो इरफान

नए बच्चे जो मोटी फीस देकर बड़े-बड़े कॉलेज में प्रवेश ले रहे हैं. BJMC/MJMC या पत्रकारिता वाले डिप्लोमा कोर्स में सीट पक्की कर रहे हैं, इस बात को समझें कि कुछ नहीं रखा है इस विधा में. सिवाए शोषण, झूठ, मक्कारी के पत्रकारिता जगत में कुछ नहीं है.

स्टूडेंट्स IIMC या जामिया जैसे संस्थानों के हुए तो स्थिति इसलिए भी कुछ बेहतर है क्योंकि यहाँ छात्रों को औरों की अपेक्षा एक्सपोजर ज़्यादा मिलता है और साथ ही छात्र कठिन प्रवेश परीक्षा देकर आते हैं तो थोड़ा क्वालिटी वाला मसला रहता है. नौकरी देर सवेर मिल जाती है. इस बीच आदमी कांटेक्ट बना लेता है और फिर नौकरी मिलने और अच्छी सैलरी तक आने में दिक्कत नहीं होती.

चिंता का विषय Tier 2 और Tier 3 शहरों के कॉलेज और उनमें पढ़ने वाले छात्र हैं. यहां छात्रों के साथ सिर्फ और सिर्फ धोखा हो रहा है. यहां लड़कियों को एंकर बनना होता है वहीं लड़कों की इच्छा क्राइम रिपोर्टर बन भौकाल बनाने की होती है.

छोटे शहरों में स्टूडेंट, टीचर को मूर्ख बनाते हैं. टीचर्स और कॉलेज स्टूडेंट्स को और फिर साल दो साल बाद डिग्री देकर स्टूडेंट्स और कॉलेज दोनों ही एक दूसरे को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं.

लखनऊ जैसे शहर में लॉ के बाद अब पत्रकारिता वो कोर्स है जो खलिहारों का नया हॉट स्पॉट बन गया है. लिखाई पढ़ाई को दरकिनार कर आदमी पत्रकार बनता है. हर दूसरे दिन डग्गा पाता है. प्रेस कांफ्रेंस के नाम पर महंगे और बड़े होटलों में खाना खाता है. इतने में लोगों की लाइफ सेट है.

लेकिन फिर एक वक्त वो आता है जब उसे इस बात का एहसास होता है कि उससे न पत्रकारिता संभल रही है न घर परिवार. आज की तल्ख़ हकीकत यही है कि आर्थिक तंगी का सबसे ज़्यादा शिकार छोटे शहरों के वो पत्रकार हैं जो बिना किसी दंद फंद के चुपचाप नौकरी कर रहे हैं और कहीं न कहीं अपना शोषण करा रहे हैं.

आप सुधीर, रूबिका, श्वेता, चित्रा, रजत शर्मा इत्यादि को मत देखिए ये अपना वक्त जी चुके हैं. आप अपना देखिए यूँ भी मीडिया में इंटर्न कल्चर आ गया है. कहा जाता है कि दस साल वाले को निकालो दस ग्यारह इंटर्न लाओ यानी आपके अनुभव का खून चूसने के लिए इंटर्न रूपी जोंक तैयार है. इससे बच जाइएगा तो AI आपकी सफलता के रास्ते में बैरिकेड डाले खड़ा है.

नए बच्चे छोड़ दें पत्रकारिता का मोह और Mass Communication करना ही है तो फिल्म मेकिंग, पीआर, एनिमेशन, ग्राफिक्स, एडिटिंग, फोटोग्राफी इत्यादि का विकल्प चुनें. अब रिपोर्टर और एंकर बनने का वक्त और स्कोप लगभग खत्म हो गया है.

खैर … इस विषय पर लिखने के लिए बहुत कुछ है. बाक़ी अगर मोटी सैलरी होती तो आज इरफ़ान भाई के अलावा आर्थिक तंगी के चलते स्वर्ग सिधार चुके दीगर पत्रकार हमारे बीच होते.

मूल खबर…

अमर उजाला लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार मो. इरफान का निधन, मंगलवार को डालीगंज कब्रिस्तान में होंगे सुपुर्द-ए-खाक

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