सुशोभित-
केंद्रीय हुकूमत ने 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय की थी देश से नक्सलवाद के ‘सफ़ाये’ के लिए। इसकी पूर्व सन्ध्या पर गृह मंत्री ने संसद में ऐलान किया कि देश अब ‘नक्सलमुक्त’ हो गया है। सुपरिचित, गर्वीली शाह-शैली में उन्होंने ब्योरे दिए कि बीते दो से भी कम सालों में 706 नक्सली मारे गए, 2218 गिरफ़्तार हुए, 4839 ने सरेंडर किया… आगे उन्होंने जोड़ा कि “अन्याय का समाधान संविधान में है, हथियार में नहीं।” आश्चर्य कि उस विचारधारा से वास्ता रखने के बावजूद वे वैसा कहते हैं, जिसका लक्ष्य ही ‘हिन्दुओं का सैन्यीकरण’ (सावरकर) है। उन्होंने ‘वामपंथी उग्रवाद’ पर भी निशाना साधा, गोया कि इसके बजाय ‘दक्षिणपंथी उग्रवाद’ स्वीकार्य होगा- फिर चाहे वह किसी भी रूप में प्रकट हो- दंगा, बलवा, भीड़-न्याय, बुलडोज़र, ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी, दमन।
अपने ही देशवासियों के ‘सफ़ाये’ की गर्वोक्तियाँ एक ऐसी हुकूमत की पहचान तो नहीं हो सकती, जिसे उनकी सच में परवाह हो। ऐसे में पूछा जा सकता है कि नक्सलवाद का ख़ात्मा तो हो गया, किन्तु क्या उन कारणों का भी अंत हो चुका है, जिन्होंने नक्सलवाद को जन्म दिया था? बीमारी को तो कुचल दिया गया, लेकिन बीमारी के कारणों का भी इलाज किया गया है क्या?
नक्सलवाद के उदय के मूल में यह विचार था कि भारत का संविधान वनवासियों (ट्राइबल्स) के अधिकारों की रक्षा करने में नाकाम रहता है। इसमें खेतिहर मज़दूरों और भूमिस्वामियों के बीच वर्ग-संघर्ष के अंदेशे भी शुमार थे। नक्सलवाद ने जिस अबूझमाड़ को अपना गढ़ बनाया था, उसे पत्रकार आलोक पुतुल ने “नक़्शों से बाहर का भूगोल” कहा था। बस्तर के लगभग 4000 वर्ग किलोमीटर में फैला अबूझमाड़ दस्तावेज़ों में गुम रहा है, यहाँ न सड़कें हैं न ज़मीन की नाप है। भारतीय-राज्य के प्रशासनिक हाथ यहाँ पहुँच नहीं पाते। इस शून्य में शोषण और हिंसा के प्रतिरूप उभरते रहे हैं। तब माओवादी विचारधारा ने यहाँ अपनी पैठ बनाई। यह एक चरमपंथी विचारधारा थी, जो भारतीय-राज्य तो दूर, मुख्यधारा की मार्क्सवादी पार्टियों तक को समझौतापरस्त (रिवीज़निस्ट) समझती थी और सशस्त्र विद्रोह में ही अपना रास्ता तलाशती थी। शोषित और वंचित वर्ग को उस विचारधारा से अगर सहानुभूति हुई तो यह उनकी नहीं, भारतीय-राज्य की विफलता थी, जो उनका भरोसा जीत नहीं पाया, उन्हें न्याय-तंत्र के प्रति विश्वासी नहीं बना पाया, अपने से जोड़ नहीं पाया।
यह आदिवासी वर्ग दो तरफ़ से छला गया था। दोनों पक्षों ने उसे मोहरा बनाया था। एक तरफ़ माओवादी विद्रोही थे, दूसरी तरफ़ सलवा जुडूम की दमन-लीला। 4 जून 2005 को सरकार के द्वारा शुरू किए गए सलवा जुडूम अभियान में आदिवासियों को हथियार थमाए गए थे, उन्हें माओवादियों से लड़ने के लिए मैदान में उतार दिया गया था। कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि अभियान का नेतृत्व स्थानीय आदिवासियों के बीच भर्ती किए गए विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) के साथ-साथ केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) जैसे अर्धसैनिक बलों ने किया था।
बीबीसी हिन्दी में ही आलोक पुतुल की 5 जून 2015 की रिपोर्ट है कि सरकारी आँकड़ों पर यक़ीन करें तो 2005 में माओवादियों के खिलाफ़ शुरू हुए सलवा जुडूम के कारण दंतेवाड़ा के 644 गाँव ख़ाली हो गए। उनकी एक बड़ी आबादी सरकारी शिविरों में रहने के लिये बाध्य हो गई। समाज-विज्ञानी ज्यां द्रेज़ ने एक रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला था कि सलवा जुडूम के दमन-चक्र से पहले बस्तर में कभी-कभार ही हिंसा होती थी, लेकिन इसके बाद राज्य-विरोधी आंदोलन वहाँ और मज़बूत हो गए। हुकूमत के दर्प-दीप्त ऐलानों में मानवीय-त्रासदी और विडम्बना के इन विवरणों के प्रति भी कोई सहानुभूति झलकती है क्या?
कुछ महीनों पहले ख़बर आई थी बस्तर की माओवादी पार्टी सरकार के साथ शांति-वार्ता के लिए तैयार थी, किन्तु सरकार ने उसमें अधिक रुचि नहीं दिखलाई। जन, जंगल और ज़मीन के सरोकारों से जुड़े संघर्षों के प्रति हुकूमत की हमदर्दी नज़र नहीं आई। मैं एक बार फिर ज्यां द्रेज़ को उद्धृत करना चाहूँगा, जिन्होंने एक रिपोर्ट में लिखा था : “बस्तर के आदिवासियों के लिए मार्क्स और माओ का कोई ख़ास मतलब नहीं है। लेकिन उन्हें पता है कि वन विभाग और पुलिस द्वारा उन पर अत्याचार किए जाते हैं। स्थानीय व्यापारी और साहूकार भी उनका शोषण करते हैं, जिनमें से ज़्यादातर दूसरे राज्यों से आए लोग हैं। कई आदिवासी इस डर में भी रहते हैं कि उनकी ज़मीन खनन या अन्य परियोजनाओं के लिए छीन ली जाएगी। इसलिए जब माओवादियों ने शोषकों पर लगाम लगाना और वंचितों की रक्षा करना शुरू किया तो उन्हें स्थानीय आदिवासियों से काफ़ी समर्थन मिला।”
छत्तीसगढ़ के आदिवासियों में वेरियर एल्विन, मधु रामनाथ जैसे मानवविज्ञानियों ने गहरी रुचि ली है और उनके बीच रहकर उनके जीवन-मूल्यों, शांतिपूर्ण अस्तित्व को प्रकाशित किया है। मदन मोहन जोशी ने बस्तर का इतिहास मार्क्सवादी दृष्टि से लिखा है। राज्य और जन के बीच संवादहीनता के जिस शून्य में शोषण और माओवादी रक्तपात के विकृत रूप उभर आए थे, उन्हें पाटने की जिम्मेदारी भी एक संवेदनशील राज्यसत्ता की होती है। यह राज्यसत्ता जिस गर्व से आंदोलनों को कुचल देने और उसमें हताहत होने वालों की संख्या का ऐलान करती है, उसी तत्परता से अगर वह उनके जीवन-अधिकारों के प्रति सदाशय, सहानुभूतिपूर्ण और संलग्न भी हो तो- दण्डकारण्य, हसदेव, अबूझमाड़, महानदी, महाकांतार, गजराजों और वनभैंसों के आदिम और प्राक्तन छत्तीसगढ़ में क्रूर उपेक्षा की अंधेरी रात के बाद एक बेहतर, मानवीय सुबह का उजाला भी दिखलाई दे।


