संजय कुमार सिंह
पांच राज्यों में चुनाव के बाद अखबारों में चुनावी गड़बड़ी का मामला न शुरू हो जाए इसलिए प्रधानमंत्री ने सोना नहीं खरीदने और तेल-डीजल कम खर्चने की सलाह दी। इस पर जो विवाद होना था वह है। विपक्षी नेताओं ने आलोचना की है पर वह खबर नहीं है। खबर नया विवादास्पद बयान है। द एशियन एज की लीड का शीर्षक है, “प्रधानमंत्री ने ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ करने वाली भारत की ‘कुछ शक्तियों’ पर हमला किया”। आयात और ईंधन का उपयोग कम करने की अपील दोहराई तथा कोविड के समय के उपाय अपनाने के लिए कहा। उधर सोशल मीडिया में 1967 के अखबार के हवाले से कहा जा रहा है कि इंदिरा गांधी ने भी सोना नहीं खरीदने की सलाह दी थी। इसमें मुद्दा यह है कि नरेन्द्र मोदी ने 12 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद यह सलाह दी है और 2026 में दी है। इससे पहले विकास के न जाने कितने दावे किए जा चुके हैं। इसलिए इसका विरोध होना था, हुआ है पर उसे खबर नहीं बननी थी। नहीं है। देशबन्धु की आज की लीड का फ्लैग शीर्षक है, प्रधानमंत्री मोदी के बयान पर छिड़ा सियासी संग्राम। मुख्य शीर्षक है, महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी। आप समझ सकते हैं कि खबर क्या है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के अनुसार, सरकार ने कहा है, घबराने की कोई वजह नहीं है पर ऊर्जा की बचत के लिए प्रधानमंत्री की सलाह मानी जाए। प्रधानमंत्री की सलाह मानने-नहीं मानने या नहीं मानने का विकल्प होने-नहीं होने के बीच अमर उजाला की टॉप की खबर का शीर्षक मोदी ने कहा है, दुनिया की कोई ताकत भारत को झुका या दबा नहीं सकती है। इसी के साथ खबर है और तमाम प्रचारक समर्थक कह रहे हैं कि भारत के पास ईंधन, वस्तुओं का पर्याप्त स्टॉक है। द हिन्दू ने सरकार के हवाले से इस खबर को लीड बनाया है। यह शीर्षक अमर उजाला में भी लीड है। राजनाथ सिंह की फोटो के साथ उनके हवाले से उपशीर्षक है, जरूरी चीजों की पर्याप्त आपूर्ति, ठोस कदम उठा रही सरकार।
द हिन्दू ने प्रधानमंत्री के दावे पर विपक्ष की टिप्पणी को भी पहले पन्ने पर छापा है। शीर्षक है, विपक्ष ने बचत की प्रधानमंत्री की अपील को नाकामी की स्वीकारोक्ति कहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, प्रधानमंत्री ने दूसरे दिन बचत पर जोर दिया और कोविड के समय की आदतों को लागू करने के लिए कहा। इसमें वर्क फ्रॉम होम के साथ ईंधन की कमी के लिए कार पूलिंग शामिल है। इंडियन एक्सप्रेस ने लीड के साथ छपी खबर में बताया है, प्रधानमंत्री की अपील के पीछे विदेशी मुद्रा का घटता भंडार और सोने का बढ़ता आयात है। खबर के अनुसार, सोने के आयात का बिल दो साल में दूना हो गया है और लिब्रलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत विदेश यात्रा पर खर्च अप्रैल-फरवरी 2026 तक 15 बिलियन डॉलर रहा। जाहिर है यह उदारीकृत व्यवस्था सरकार ने तब की होगी जब स्थितियां अनुकूल रही होंगी और अब पुरानी व्यवस्था लागू करनी पड़ रही है तो कारण यही है कि पिछले कुछ वर्षों में स्थितियां खराब हुई हैं। इस दौरान नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री थे तो जिम्मेदार वही हुए। दुनिया के दो दूसरे देशों के बीच युद्ध के लिए आप चाहें तो नरेन्द्र मोदी या भारत के प्रधानमंत्री को जिम्मेदार मत मानिए पर प्रधानमंत्री के प्रशंसकों ने ही प्रचार किया था कि वे युद्ध रुकवा देते हैं। जब युद्ध रुकवा कर छोटे-मोटे काम कर सकते थे तब यह स्थिति क्यों आ गई कि खर्च कम करने के लिए कहना पड़ रहा है। वह भी गिनती के उन लोगों को जो कमा रहे हैं या जिनके पास पैसे हैं। कारण कंप्रोमाइज्ड होना तो नहीं है? एक तरफ तो सरकार की यह हालत है दूसरी तरफ जबरदस्ती जीते गए बंगाल में चुनाव अधिकारियों को महत्वपूर्ण पद के रूप में ईनाम देना जारी है। इस बीच, नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार, निर्वाचन आयोग शुरू करेगा एसआईआर-3। इसमें 22 राज्य, केंद्र शासित प्रदेश शामिल होंगे। तीसरे चरण में 40 करोड़ मतदाता होंगे। बिहार बंगाल में जो हुआ उससे साफ है कि भाजपा के लिए किया जा रहा है और एसआईआर तो चलिए ठीक भी हो, लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के कारण वोट नहीं देने देना और फिर याचिक दायर करने के लिए कहना समान्य कानून नहीं है और जो होगा सो होगा। जब होगा तब उसकी बात होगी।
आज खबर है और इंडियन एक्सप्रेस में शीर्षक है कि बंगाल में एसआईआर देखने वाले अधिकारी को भाजपा की नई सरकार ने मुख्य सचिव नियुक्त किया। टीएमसी और कांग्रेस ने इसकी निन्दा की है। राहुल गांधी ने इस बारे में एक्स पर लिखा है, BJP-EC के “चोर बाज़ार” में – जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सेकेंड लीड है और टॉप पर चार कॉलम में छपी है। लेकिन भाजपा को इससे फर्क नहीं पड़ता है। इससे पहले पश्चिम बंगाल के नवनियुक्त मुख्यमंत्री शुवेन्दु अधिकारी ने शपथ लेने के तुरंत बाद सुब्रत गुप्ता को अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त कर लिया था। अब यह बिल्कुल साफ हो चुका है कि एसआईआर का मकसद क्या था। उससे बात बनती नहीं दिखी तो लॉजिकल डिसक्रिपेंसी का नया खेल ढूंढ़ा गया और सुप्रीम कोर्ट ने उसे भी चलने दिया। नतीजों से यह स्पष्ट है कि कई सीटों पर हार-जीत का अंतर हटाए गए वोटर से कम है। वैसे भी किसी को वोट देने से रोकना उचित नहीं है पर सब हो चुका। आज द टेलीग्राफ में खबर है, सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी से नई एसआईआर याचिका दायर करने के लिए कहा। इस खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तृणमूल कांग्रेस से एक नई अंतरिम याचिका दायर करने को कहा। इससे उसे अपने इस दावे को साबित करना है कि बंगाल के 31 निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा के मुकाबले पार्टी की “हार का अंतर” उन मतदाताओं की संख्या से कम था, जिन्हें एसआईआर के तहत सूची से हटा दिया गया था। मुझे लगता है कि एसआईआर के नाम पर जो हुआ वह सत्तारूढ़ भाजपा के अलावा किसी के लिए भी मुश्किल रहा और इससे चुनाव निष्पक्ष था या नहीं, लगा तो बिल्कुल नहीं। रही सही कसर चुनावी आंकड़ों ने पूरी कर दी। ऐसे में चुनाव सीधे-सीधे रद्द होना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट ने कानूनन चाहे सब सही किया हो पर न्याय होता दिख नहीं रहा है।
खबर के अनुसार, शीर्ष अदालत इस बात को लेकर संशय में रही कि पार्टी की उस याचिका पर विचार किया जाए या नहीं, जिसमें एसआईआर के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं को हटाए जाने को एक विशेष “आधार” माना जाए। इस आधार पर हारे हुए उम्मीदवार चुनाव याचिकाएं दायर कर सकते हैं और मांग कर सकते हैं कि जीतने वाले उम्मीदवार का चुनाव रद्द कर दिया जाए। बंगाल एसआईआर मामले की दोबारा शुरुआत हुई तो सुनवाई के दौरान, तृणमूल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी से पीठ ने कहा, “आप जो कुछ भी कहना चाहते हैं उसके लिए एक अलग अंतरिम याचिका दायर करने की आवश्यकता होगी।” कल्याण बनर्जी ने कहा और अदालत ने माना कि आप अब चुनाव परिणामों के संबंध में कह रहे हैं कि ये परिणाम उन मतदाताओं को सूची से हटाए जाने के कारण काफी हद तक प्रभावित हुए हो सकते हैं। इसके खिलाफ अपील चल रही है। 13 अप्रैल को सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत ने मौखिक रूप से यह टिप्पणी की थी कि अगर यह माना जाता है कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं को सूची से हटाए जाने का असर चुनाव परिणामों पर पड़ा है तो अदालत को इस पर “गहराई से विचार करना होगा”। तब यह उदाहरण भी दिया गया था कि, अगर हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक हो। सोमवार को बनर्जी ने अदालत को बताया कि पूरे राज्य में तृणमूल की हार का कुल अंतर 32 लाख वोटों का था, जबकि 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष “35 लाख अपीलें” लंबित हैं। (इन 34.35 लाख अपीलों में से, लगभग 27 लाख अपीलें मतदाताओं को सूची से बाहर किए जाने के खिलाफ हैं, और 7 लाख अपीलें मतदाताओं को सूची में शामिल किए जाने के खिलाफ हैं।)
कल्याण बनर्जी ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ को यह भी बताया कि उनके पास 31 ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों का विवरण मौजूद है, जहां भाजपा की जीत का अंतर उन मतदाताओं की संख्या से कम था, जिन्हें सूची से हटा दिया गया था। उन्होंने अदालत में ये सबूत पेश करने की पेशकश की। उन्होंने अदालत को 13 अप्रैल को दिए गए उसके मौखिक आश्वासन की भी याद दिलाई, जिसमें अदालत ने कहा था कि वह इस सवाल पर गहराई से विचार करेगी कि क्या बंगाल में बड़े पैमाने पर मतदाताओं को सूची से हटाए जाने का असर चुनावी परिणामों पर पड़ा है। मैंने एआई चैट जीपीटी से पूछा, इस खबर के आलोक में सुप्रीम कोर्ट के नए-पुराने रुख पर आपकी टिप्पणी क्या है? एआई ने जो कहा उसमें यह शामिल है कि, इस खबर से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव परिणाम पलटने की दिशा में जा रहा है। अभी तक अदालत का केंद्रीय संदेश यही लगता है: 1) केवल राजनीतिक आरोप पर्याप्त नहीं है; 2) केवल बड़े आँकड़े भी पर्याप्त नहीं हैं; 3) चुनावक्षेत्र वार ठोस सबूत चाहिए; और 4) तब भी समाधान सीमित व कानून सम्मत होगी। संक्षेप में, सुप्रीम कोर्ट का नया रुख “अधिक संवेदनशील लेकिन अब भी संस्थागत रूप से संयमित” कहा जा सकता है। वह चुनावी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता पर आँखें बंद नहीं कर रहा, लेकिन लोकतांत्रिक स्थिरता को भी अदालत-निर्भर नहीं बनाना चाहता। यही इस खबर का असली संवैधानिक संकेत है।
गूगल जेमिनाई ने कहा, इस खबर के आलोक में, सुप्रीम कोर्ट का रुख थोड़ा विकसित हुआ प्रतीत होता है, लेकिन एक निश्चित सीमा के साथ। पहले, 13 अप्रैल की सुनवाई में, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा था कि अगर बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने से चुनाव परिणामों पर असर पड़ा हो, खासकर जब हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक हो, तो उन्हें इस पर विचार करना होगा। यह एक ऐसा रुख था जो तृणमूल कांग्रेस की याचिका के प्रति कुछ सहानुभूति दर्शाता था। नया रुख इस आधार पर व्यापक चुनावी याचिकाओं को सीधे स्वीकार करने में संशय का है। इसके बजाय, यह टीएमसी से विशिष्ट सबूतों के साथ एक नया आवेदन प्रस्तुत करने के लिए कह रहा है, ताकि यह साबित किया जा सके कि हटाए गए मतदाताओं की संख्या और हार का अंतर सीधा संबंध है और इससे परिणाम प्रभावित हुए हैं। मुझे लगता है कि एसआईआर ही जबरदस्ती थी और अब लॉजिकल डिसक्रिपेंसी तो अति है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे होने दिया और कहा भी कि नतीजों के बाद विचार करेंगे। नतीजों से अंतर स्पष्ट है। एक व्यक्ति को भी गलत तरीके से जीतना या हारना क्यों चाहिए। इसलिए मुझे लगता है कि चुनाव रद्द किया जाना चाहिए। आपकी क्या राय है। क्या मैं गलत हूं और हां तो क्यों? इसपर चैट जीपीटी ने कहा, आपका तर्क भावनात्मक नहीं बल्कि लोकतांत्रिक सिद्धांत के स्तर पर काफी मजबूत है।
अगर सचमुच बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे हों, और उससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ हो, तो सहज न्यायबोध यही कहता है कि ऐसा चुनाव वैध कैसे माना जाए। “एक भी व्यक्ति का मताधिकार गलत तरीके से छीना जाना” लोकतंत्र की गंभीर विफलता है — यह बात संवैधानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। लेकिन यहीं पर कानून और लोकतांत्रिक प्रशासन का दृष्टिकोण थोड़ा अलग हो जाता है। अदालतें केवल “संभावित अन्याय” नहीं देखतीं; वे यह भी देखती हैं कि कौन-सा उपचार (तरीका) व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाएगा और कौन-सा अधिक अस्थिर। लेकिन आपका सबसे मजबूत बिंदु यही है कि “सुप्रीम कोर्ट ने होने क्यों दिया?” यहीं असली बहस है। अगर अदालत को पहले से आशंका थी कि: एसआईआर प्रक्रिया में व्यापक गड़बड़ी हो सकती है,लाखों अपील लंबित हैं, और परिणाम प्रभावित हो सकते हैं, तो फिर चुनाव पहले होने देना और बाद में कहना कि “अब चुनाव याचिका लाईए” — आलोचना को निमंत्रण देना है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


