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साहित्य

“रहचुली” : छत्तीसगढ़ी लोक जीवन, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय व्यवहार की जीवंत कृति!

डुमन लाल ध्रुव-

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य साहित्य के महत्वपूर्ण रचनाकार जी. एस. रामपल्लीवार की कृति “रहचुली हंसी ठट्ठा अउ ठिठोली घलो” केवल हास्य-व्यंग्य का संग्रह भर ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ी लोकजीवन, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय व्यवहार का जीवंत दस्तावेज है। जन्मशताब्दी वर्ष (21 जुलाई 1925 – 19 अप्रैल 2006) की स्मृति में इस कृति का पुनर्पाठ उनके साहित्यिक अवदान को नई दृष्टि से समझने का अवसर प्रदान करता है। प्रस्तुत संग्रह में संकलित “बिसम्भर बन गे डिसम्बर”, “पढ़े लिखे गंवार”, “नवा मॉडल के आदमी”, “जोक्कड़ राज”, “नून तेल लकड़ी”, “बेटा बिरान दमाद बुजा परान” जैसे लेख सामाजिक यथार्थ को हंसी और ठिठोली के माध्यम से उजागर करते हैं।

रामपल्लीवार जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे व्यंग्य को कटुता नहीं बनने देते। उनका हास्य लोकजीवन से उपजता है और पाठक को मुस्कराते हुए सोचने के लिए विवश करता है। “पढ़े लिखे गंवार” में आधुनिक शिक्षा के बावजूद संस्कारहीनता पर करारा प्रहार है वहीं “नवा मॉडल के आदमी” में बदलते सामाजिक व्यवहार और दिखावे की संस्कृति का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली ढंग से हुआ है। “परदा तंत्र” और “जोक्कड़ राज” जैसे लेख राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की विडंबनाओं को सहज ग्रामीण भाषा में व्यक्त करते हैं।

उनकी भाषा छत्तीसगढ़ी जनभाषा की आत्मा से जुड़ी हुई है। लेखों में प्रयुक्त मुहावरे, लोकोक्तियां और ग्रामीण संवाद पाठक को सीधे गांव की चौपाल तक ले जाते हैं। “पानी ले पानी”, “बेंदरा के बात” तथा “मनुखमार बघवा” जैसे शीर्षक ही लोक संवेदना और रचनात्मक चातुर्य का परिचय देते हैं। उनकी रचनाओं में कृत्रिमता नहीं, बल्कि सहज लोकधर्मिता दिखाई देती है। यही कारण है कि उनका व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं करता समाज की मानसिकता और विसंगतियों का दर्पण भी बनता है।

रामपल्लीवार जी ने पारिवारिक संबंधों और सामाजिक ताने-बाने को भी अपने व्यंग्य का विषय बनाया। “कका भतीज”, “लाडू अउ साढू”, “गोहार मोर ममा के” तथा “कका के चिट्ठी समधी के तार” जैसे लेखों में रिश्तों की मिठास, स्वार्थ, हास्यास्पद परिस्थितियां और लोक व्यवहार का सुंदर चित्रण है। इन रचनाओं में छत्तीसगढ़ी समाज की आत्मीयता और पारिवारिक संरचना स्पष्ट दिखाई देती है।

उनकी लेखनी में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आम आदमी की संघर्षपूर्ण जिंदगी भी बार-बार सामने आती है। “नून तेल लकड़ी”, “साई इतना दीजिए” तथा “करु तरोई” जैसे लेख आम जनजीवन की छोटी-छोटी कठिनाइयों को हास्य के माध्यम से व्यक्त करते हैं। वे जानते थे कि व्यंग्य तभी प्रभावशाली होता है जब वह जमीन से जुड़ा हो। इसलिए उनकी रचनाओं में बनावटी बौद्धिकता नहीं लोकजीवन की सच्ची अनुभूति दिखाई देती है।

रामपल्लीवार जी की रचनाओं का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वे सामाजिक चेतना को जागृत करती हैं। “नकल”, “चिरहा नोट”, “बिगारी” तथा “वरिष्ठ नागरिक” जैसे लेखों में बदलते सामाजिक मूल्यों, नैतिक पतन और मानवीय उपेक्षा पर गंभीर टिप्पणी मिलती है। हास्य की आड़ में वे समाज को आईना दिखाते हैं। यही उनकी व्यंग्य कला की सफलता है।

जन्मशताब्दी वर्ष में उनकी कृति “रहचुली हंसी ठट्ठा अउ ठिठोली घलो” का स्मरण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि आज का समाज तेजी से अपनी लोकभाषा और लोकसंस्कृति से दूर होता जा रहा है। रामपल्लीवार जी ने छत्तीसगढ़ी भाषा को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोकभाषा में भी गंभीर साहित्य और प्रभावशाली व्यंग्य रचा जा सकता है। उनकी रचनाएं छत्तीसगढ़ी संस्कृति की जीवंत धरोहर है।

वस्तुत: जी. एस. रामपल्लीवार का साहित्य हास्य, व्यंग्य, लोकसंस्कृति और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम है। उनकी रचनाएं पाठक को हंसाती भी है और सोचने के लिए प्रेरित भी करती है। जन्मशताब्दी वर्ष में उनका स्मरण साहित्यकार को श्रद्धांजलि ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ी लोकजीवन और भाषा की समृद्ध परंपरा को सम्मान देने जैसा है। उनकी लेखनी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और लोकसंवेदना का अमूल्य स्रोत बनी।

किताब का लिंक ये रहा – रहचुली

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1 Comment

1 Comment

  1. yamini rampalliwar

    May 13, 2026 at 11:50 am

    धन्यवाद यशवंत जी…’रहचुली’ हमारे पिता (स्व.) श्री जी.एस. रामपल्लीवार की छ्त्तीसगढ़ी रचनाओं का एक छोटा-सा संग्रह है. 2026 उनका जन्म शताब्दी वर्ष है…उनकी स्मृतियों को आपने अपने प्लेटफॉर्म पर जगह दी, मैं ह्रदय से आभारी हूं…. यामिनी रामपल्लीवार, असिस्टेंट एडिटर, लोकमत समाचार, नागपुर

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