नई दिल्ली। पत्रकार ओमर रशीद ने दावा किया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी National Human Rights Commission ने उनके खिलाफ मई 2025 में शुरू हुई जांच को आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया है। ओमर रशीद के अनुसार यह मामला एक “फर्जी, दुर्भावनापूर्ण और सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ ऑनलाइन अभियान” से जुड़ा था, जिसे लेकर एनएचआरसी ने दिल्ली पुलिस से जांच कराई थी।
ओमर रशीद ने एक विस्तृत सार्वजनिक बयान जारी कर कहा कि 300 दिनों से अधिक चली जांच के बाद दिल्ली पुलिस को उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करने लायक कोई आधार नहीं मिला, जिसके चलते एनएचआरसी ने कार्यवाही समाप्त कर दी।
उन्होंने आरोप लगाया कि 21 और 22 मई 2025 को सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से मानहानिकारक और सांप्रदायिक पोस्ट फैलाए गए। इन पोस्टों को कथित तौर पर एक युवा हिंदू महिला की “न्याय की गुहार” के रूप में पेश किया गया था, जबकि ओमर रशीद का कहना है कि पूरी कहानी मनगढ़ंत थी और इसका उद्देश्य सांप्रदायिक तनाव पैदा करना तथा उन्हें सरकारी कार्रवाई में फंसाना था।
ओमर रशीद के मुताबिक सह्याद्री अधिकार मंच के संयोजक तन्मय एन नामक व्यक्ति द्वारा उनके और The Wire के खिलाफ शिकायत की गई थी, जिसके बाद एनएचआरसी ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को जांच के निर्देश दिए थे।
उन्होंने दावा किया कि नई दिल्ली के डीसीपी द्वारा प्रस्तुत एक्शन टेकन रिपोर्ट यानी एटीआर में यह सामने आया कि सोशल मीडिया पोस्ट का स्रोत एक 34 वर्षीय वकील और राजनीतिक कार्यकर्ता था। ओमर रशीद के अनुसार रिपोर्ट में कहा गया कि संबंधित व्यक्ति ने पुलिस जांच में सहयोग नहीं किया, कई अवसर दिए जाने के बावजूद बयान दर्ज कराने से इनकार किया और अपना वास्तविक पता बताने से भी बचता रहा।
ओमर रशीद ने कहा कि उन्होंने स्वयं कई बार एनएचआरसी को पत्र लिखकर जांच में सहयोग करने और आवश्यक साक्ष्य उपलब्ध कराने की पेशकश की थी। उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश के बाद उन्हें पुलिस रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराई गई।
अपने बयान में ओमर रशीद ने कहा कि इस ऑनलाइन अभियान के कारण उन्हें और उनके परिवार को व्यक्तिगत, पेशेवर और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां, सांप्रदायिक गालियां और यौन हिंसा की धमकियां मिलीं। यहां तक कि उनकी दिवंगत मां के बारे में भी अपमानजनक टिप्पणियां की गईं।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी निजी जानकारी लीक कर दी गई, जिसके बाद उन्हें देश और विदेश से धमकी भरे कॉल और संदेश मिलने लगे। कुछ लोगों ने उनके बैंक खाते से अनधिकृत लेनदेन करने की कोशिश भी की।
ओमर रशीद ने कहा कि इस अभियान में “बीफ”, “लव जिहाद” और “कश्मीर” जैसे संवेदनशील मुद्दों का इस्तेमाल कर उन्हें सांप्रदायिक रूप से बदनाम करने की कोशिश की गई। उन्होंने दावा किया कि उनकी “कश्मीरी मुस्लिम” पहचान को जानबूझकर निशाना बनाया गया, जबकि उनका कहना है कि उन्होंने कभी अपने पेशेवर जीवन में इस पहचान का इस्तेमाल नहीं किया।
उन्होंने कुछ मीडिया पोर्टलों और पत्रकारों पर भी बिना सत्यापन के मानहानिकारक सामग्री साझा करने का आरोप लगाया। ओमर रशीद ने कहा कि डिजिटल युग में गुमनाम सोशल मीडिया खातों के जरिए बिना किसी सबूत के गंभीर आरोप लगाकर जनभावनाओं को प्रभावित किया जा सकता है और जवाबदेही से बचा जा सकता है।
बयान के अंत में ओमर रशीद ने कहा कि अब उनका ध्यान इस अभियान के सूत्रधारों और उन्हें मंच उपलब्ध कराने वालों को कानूनी रूप से जवाबदेह ठहराने पर केंद्रित है।


