मीनाक्षी सिसोदिया-
नीचे दो पिक्चर अटैच्ड हैं पहला जनतंत्र TV का मेल… जिसे देखकर आपको लगेगा कितनी जल्दबाज़ी और हड़बड़ाहट में मानो भेजा गया है… दूसरा इनके द्वारा ऐहसान के तौर पर भेजी राशि, लेकिन….
डेढ़ महीने तक मैं लगातार एक ही चीज़ मांगती रही — मेरे Full & Final Settlement की क्लैरिटी,…Mail पर mail… reminders… written communication… लेकिन जवाब?
- Seen zone.
- Silence.
- No process. No transparency.
कभी कहा गया…output strength नहीं है.. कभी कहा गया — rest ले लो, लेकिन जब स्टूडियो में बीमार होकर भी काम कर रही थी, तब किसी को health concern याद नहीं आया.
Family medical emergency से लौटकर मैंने HR से literally request की — जो भी decision है देवी जी बता दो लेकिन नहीं… please written में दे दीजिए नहीं…
मुझे clarification नहीं मिला… बल्कि office visit के दौरान ऐसी situation बनी कि police intervention तक करना पड़ा… और अब अचानक —
- बिना calculation sheet
- बिना statutory breakup
- बिना relieving / experience letter
- बिना proper closure process
- जल्दबाज़ी में F&F transfer…
कई जगह खबरें आते ही जितेंद्र शर्मा जी आपको फुल एंड फाइनल करने की क्यों जरूरत पड़ गई
सवाल simple है — जब डेढ़ महीने तक organization ready नहीं थी, तो अब इतनी urgency क्यों?
Professional institutions में exit process dignity और procedure से होता है अरे तुम्हें कहाँ पता होगा तुम तो चैनल नहीं लाला की दुकान चला रे हो मानो…Media industry में transparency preach करना आसान है, लेकिन क्या वही transparency newsroom के अंदर भी लागू होती है?
सवाल छोटा है लेकिन जरूरी — क्या TV में बैठकर दूसरों से जवाब मांगने वाले हुक्मरान, अपने newsroom में भी जवाबदेही निभाते हैं?
Journalism सिर्फ स्क्रीन पर नहीं, सिस्टम में भी दिखना चाहिए…. मैं सिर्फ अपना अधिकार और सम्मानजनक closure मांग रही हूँ. बाकी… सच को ज़्यादा explanation की ज़रूरत नहीं होती।
मैं सिर्फ अपना अधिकार, अपना सम्मान और documented closure मांग रही हूँ.
लेकिन मुझे लगता है अब बहुत हुआ स्टॉप रुकना होगा मुझे यहाँ और बढ़ना होगा कानूनी कार्यवाई की ओर…न मैं रूकुंगी न थकुँगी अगर मैं मीडिया इंडस्ट्री में रह कर ट्रांसपेरेंसी preach कर सकती हूँ तो… खुद के लिए क्यूँ नहीं….




