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‘कर्तव्य’ में सौरभ द्विवेदी की एक्टिंग ऐसी है जैसे फ़िल्म ‘वेलकम’ में नाना पाटेकर ने आलू बेचने का रोल किया था!

Dramatic movie poster with a stern police officer in front, flanked by three teammates, and flames in the background.

सौरभ यादव-

किसी एक्टर को अपनी पहली फिल्म मिलने में सालों लग जाते हैं और उसके बाद भी छोटा-मोटा रोल मिलता है। लेकिन इन सालों की मेहनत और छोटे-मोटे रोल से मिला अनुभव रंग भी लाता है और जब बड़े रोल मिलते हैं तो वो एक्टर वहां अपना जादू बिखेर देता है।

सौरभ द्विवेदी को पहली ही फिल्म शाहरुख खान की कंपनी रेड चिलीज की मिल गई और रोल भी कोई छोटा-मोटा नहीं सीधे मेन विलेन का मिला है। फिल्म में जाकिर हुसैन सैफ अली खान और संजय मिस्रा जैसे कलाकारों के सामने सौरभ द्विवेदी को इतना बड़ा रोल मिलना वाकई बड़ी बात है।

लेकिन सौरभ द्विवेदी की एक्टिंग बहुत खराब है…डायलॉग दमदार मिले हैं लेकिन सौरभ ने बिना भाव के बोले हैं। ऐसा लग रहा है कि सौरभ अपना एंकरिंग वाला स्टूडियो समझकर बोल रहे हों।

मुझे लगता है कर्तव्य फिल्म में अगर सबसे कमजोर एक्टिंग की कड़ी खोजी जाए तो सौरभ ही होंगे।


शादाब सलीम-

जैसे बाबू मुंशी लोग या छोटे अधिकारी या हारे हुए नेता रिटायरमेंट के बाद वकालत में कूद पड़ते हैं बिल्कुल ऐसे ही सौरभ जी अभिनय में कूदे हैं। एक पत्रकार पत्रकारिता में रहते हुए किसी अभिनेता के अभिनय की चिन्दी बिखेर देता है लेकिन जब वह स्वयं अभिनय के मंच पर आता है तो हाथ पैर ठंडे पड़ जाते हैं। कुछ ऐसा ही सौरभ जी के अभिनय को देखकर महसूस हुआ है।

मैं ऐसा मानता हूँ एक बल्लेबाज की आलोचना करने का हक़ सचिन के पास ही है। आलोचना वही करे जिसने विश्व को जीता हो, राजा अगर कहता है धन की कीमत नहीं है तो बात में दम होता लेकिन एक गरीब यह कहे कि धन की कीमत नहीं तो फिर बात झूठी है क्योंकि गरीब क्या जाने धन में क्या आनंद है। कुछ ऐसा ही अकबर इलाहबादी ने धार्मिक और नैतिक उपदेशक पर तंज़ किया था- ना-तजरबा-कारी से वाइज़ की ये हैं बातें/इस रंग को क्या जानें, पूछो तो कभी पी है।

सौरभ जी अभिनय में कूदे हैं लेकिन सच पूछिए तो उनकी रिलीज़ हुई फ़िल्म में उनका अभिनय ऐसा है जैसे फ़िल्म वेलकम में नाना पाटेकर ने आलू बेचने का अभिनय किया था- आलू ले लो। मज़े की बात है नाना के साथियों ने उनके अभिनय के सराहना की थी।


इकबाल अहमद-

गुरु से पहले चेले ने फिल्म के रुपहले पर्दे पर डेब्यू कर लिया था. अब गुरु की बारी थी. चेले ने यश राज़ फ़िल्म्स के नाम चीन logo से एंट्री मारी तो गुरु ने किंग ख़ान की रेड चिली की लाल मिर्ची चुनी.

चेला तो फिर भी हीरो के दोस्त के रूप में सामने आया, फ़िल्म सिल्वर स्क्रीन यानी बड़े पर्दे पर आई, भले ही फ्लॉप हुई लेकिन जौनपुर के एक गुमनाम गाँव से निकले युवक के लिए सपनों सरीखा अनुभव था.

गुरु का लाल मिर्ची के बैनर तले उतना भी संवाद नहीं था जितना वो अपने चर्चित सेलिब्रिटी इंटरव्यू के इंट्रो में भूमिका बाँध देते थे. मुश्किल से तीन सीन मिले और कुल डेढ़ मिनट की स्क्रीन प्रेजेंस में गुरु ने बेहद निराश किया, जबकि इंटरव्यू में इरिटेटिंग इंट्रो के अलावा बाल की खाल निकालने की उनकी अदा का प्रशंसक रहा हूँ. भले ही होंठ चाटते हुए सेलिब्रिटी से नज़दीकी दिखाने की ऐक्टिंग अझेल लगती जो फिर भी चैनल बदलने का मन नहीं करता, क़सम खा कर बोलता हूँ कि आमिर ख़ान की ओवर ऐक्टिंग वाला पाँच घंटे का इंटरव्यू दो दिन लगाकर पूरा देखा था.

बाक़ी मूवी की क्या बात करूँ. शुरू होकर ख़त्म भी हो गई. सैफू अंकल, संजय मिश्रा और रसिका दुग्गल (ये मुश्किल नाम मुझे याद रहा) की एक्टिंग का अचार डालना बेहतर लग रहा है. क्योंकि मैं सोच रहा हूँ कि शाहरुख ख़ान ने गौरी ख़ान के नाम से ये फ़िल्म क्या ब्लैक मनी को वाइट करने के लिए बनाई थी!

मतलब क्या दिखाना चाहते हो, माना हरियाणा के डेरा वाले बाबा लोग करप्ट हैं. पुलिस उनसे मिली हुई है, बच्चों का शोषण और मिस यूज़ करते है. बरखा दत्त की डुप्लीकेट पत्रकार को एक डायलॉग बोले बिना निपटा दिया. फिर जब सबको निपटा ही दिया था तो बाबा और एसपी के लिए दो गोली और चलानी थी. उसके पहले द एंड करके “कर्तव्य” की इति श्री क्यों कर दी!

भाई लाल मिर्च उर्फ़ रेड चिली, कोलकाता के नाईट राइडर से काला माल सफेद नही हो रहा तो साफ़ साफ़ बोल दो. लेकिन सैफ़ू, संजय मिश्रा और मिर्जापुर वाली दुग्गल मैम का ऐसा मिस यूज़ हम बर्दाश्त नहीं करेंगे. और हाँ पंचायत वाले बन राकस का तो ऐसा दुरुपयोग बिलकुल नाकाबिले बर्दाश्त है. स्याला मुंगरे से कट्टा लेकर मन्नत पहुँच जाएँगे.

और चेले के गुरु जी को कम से कम क्लाइमेक्स में लथेर लथेर कर मार कर कुछ तो इज़्ज़त बख्श देते. बताओ ज़िंदा छोड़ दिए.

छोड़ो स्पॉयलर नही देते है. लेकिन गुरु लाल मिर्च की बेगम, ये बताओ बनाया क्यों. ऐसी क्या मजबूरी थी!

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3 Comments

3 Comments

  1. Kamlesh Shukla

    May 16, 2026 at 11:37 am

    हर किसी को आलोचना करने का हक है, लेकिन आलोचना और मज़ाक उड़ाने में फर्क होता है।
    सौरभ द्विवेदी कोई स्टार किड नहीं हैं जिन्हें लॉन्च पैड मिला हो। एक छोटे शहर से निकलकर पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाना और फिर बिल्कुल नए क्षेत्र में कदम रखना अपने आप में हिम्मत की बात है।

    जो लोग आज उनकी एक्टिंग पर लंबी लंबी पोस्ट लिख रहे हैं, वही लोग अक्सर कहते हैं कि इंसान को अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना चाहिए। अब जब किसी ने सच में नया जोखिम लिया, तो उसे ट्रोल करना शुरू कर दिया गया।

    हर बड़ा अभिनेता पहली फिल्म में परफेक्ट नहीं था। कई दिग्गज कलाकारों की शुरुआती एक्टिंग भी कमजोर थी, लेकिन उन्हें सीखने और बेहतर होने का मौका मिला।
    सौरभ द्विवेदी भी अभिनेता के तौर पर नए हैं, और किसी नए इंसान का मज़ाक उड़ाने से ज्यादा बेहतर है उसके प्रयास की इज्जत करना।

    कम से कम उन्होंने कोशिश तो की।
    कुर्सी पर बैठकर तंज कसना आसान है, कैमरे के सामने खड़े होकर खुद को साबित करना नहीं।

  2. KAmlesh Shukla

    May 16, 2026 at 12:07 pm

    हर किसी को आलोचना करने का हक है, लेकिन आलोचना और मज़ाक उड़ाने में फर्क होता है।
    सौरभ द्विवेदी कोई “स्टार किड” नहीं हैं जिन्हें लॉन्च पैड मिला हो। एक छोटे शहर से निकलकर पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाना और फिर बिल्कुल नए क्षेत्र में कदम रखना अपने आप में हिम्मत की बात है।

    जो लोग आज उनकी एक्टिंग पर लंबी-लंबी पोस्ट लिख रहे हैं, वही लोग अक्सर कहते हैं कि इंसान को अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना चाहिए। अब जब किसी ने सच में नया जोखिम लिया, तो उसे ट्रोल करना शुरू कर दिया गया।

    हर बड़ा अभिनेता पहली फिल्म में परफेक्ट नहीं था। कई दिग्गज कलाकारों की शुरुआती एक्टिंग भी कमजोर थी, लेकिन उन्हें सीखने और बेहतर होने का मौका मिला।
    सौरभ द्विवेदी भी अभिनेता के तौर पर नए हैं, और किसी नए इंसान का मज़ाक उड़ाने से ज्यादा बेहतर है उसके प्रयास की इज्जत करना।

    कम से कम उन्होंने कोशिश तो की।
    कुर्सी पर बैठकर तंज कसना आसान है, कैमरे के सामने खड़े होकर खुद को साबित करना नहीं।

  3. Tilak Raj

    May 17, 2026 at 7:10 am

    “धन की कीमत केवल अमीर ही समझ सकता है” — यह विचार स्वयं में अधूरा है।

    यदि केवल भोग करने वाले को ही सत्य बोलने का अधिकार हो, तो फिर संतों, ऋषियों और त्यागियों की पूरी परंपरा निरर्थक हो जाएगी।

    राजा यदि कहे कि धन सब कुछ नहीं, तो लोग मान लेते हैं क्योंकि उसने वैभव देखा है।
    लेकिन गरीब वही बात कहे तो उसे झूठा कहना अन्याय है। हो सकता है गरीब ने धन के अभाव में जीवन की वह सच्चाई देखी हो जो राजा कभी देख ही न पाया हो।

    कबीर राजा नहीं थे, रविदास महलों में नहीं पले, फिर भी उनके वचन आज तक जीवित हैं।
    सत्य का मूल्य वक्ता की संपत्ति से नहीं, उसके अनुभव और विवेक से तय होता है।

    और यदि केवल “विश्व विजेता” ही आलोचना कर सकता है, तो फिर धर्मग्रंथों में राजाओं को उपदेश देने वाले संत किस अधिकार से बोलते थे?

    त्याग करने वाला कई बार भोगी से अधिक गहराई से वस्तु का मूल्य समझता है।

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