अभिषेक श्रीवास्तव-
बड़े भाई राजशेखर त्रिपाठी के निधन की सूचना स्तब्धकारी है। जो आदमी एक बगल में था, वो ऐसे ही गायब हो जाए, ये सोचना मुश्किल होता है।
कुछ महीने पहले उनका फोन आया था। नौकरी से निकलने के बाद फ्रीलांसिंग को लेकर परेशान थे। पूछ रहे थे एकाध ठिकाना बताओ जहां लिखने के पैसे मिलते हों। मैंने कहा भाई साब, ‘दास मलूका’ को रिवाइव करिए, एकाध जगह बात की जाएगी। बात हुई भी थी, लेकिन टीवी में हजारों की नौकरी के बाद डेढ़ दो हजार का कॉलम कौन लिखता है! कौन दास मलूका?

टीवी की नौकरी में रहते हुए आज से आठ साल पहले उन्होंने मीडियाविजिल पर इसी नाम से लिखना शुरू किया था। जबरदस्त चला था उनका स्तंभ। उस समय बहुत लोग पूछते थे दास मलूका कौन है, राजशेखर जी ने मना किया था किसी को बताने के लिए। शायद साल भर से ज्यादा लिखा उन्होंने, फिर २०२० में मीडियाविजिल सूना पड़ गया। सब स्तंभकार निकल लिए। विडंबना देखिए, नौकरी छूटने के बाद दास मलूका को कहीं जगह नहीं मिली जबकि अब वे खुलकर इस नाम से लिखने की स्थिति में आ चुके थे। अंततः उन्होंने फेसबुक पर ही लिखना शुरू किया।
स्वस्थ दिखते थे, मस्त दिखते थे, लेकिन हमेशा लगता था कि भीतर से टूटे हुए हैं, बेचैन हैं और बाहर अभिनय कर रहे हैं। पता नहीं क्या था इसके पीछे, मैं नहीं जानता। वैसे भी, किसी की निजी जिंदगी में झांकने की अपनी आदत नहीं है, लेकिन मिजाज वाले लोगों का जाना अखरता तो है ही। बहरहाल…
गर्मी बहुत है दोस्तों। बकवादों से बेमतलब की गर्मी और न बढ़ाइए। जिंदा रहिए, दूसरों को जिंदा रखिए। हर परिस्थिति में जिंदा रहना कॉकरोचों का धर्म है। आधुनिकता का मूल भी यही ज्ञान है: कोशिश करो, कोशिश करो, जीने की, ज़मीन में गड़कर भी।
अशोक कुमार पांडेय-
कैसे मान लूँ कि राजशेखर चला गया! 35 साल पुराना साथ। यूनिवर्सिटी में सीनियर था। नाटक देखा था उसका- कोर्ट मार्शल। अभिभूत होकर लौटा था। वकील की भूमिका में जो अभिनय किया था, अब भी रोमांचित कर देता है।
परम मस्तमौला। मीडिया में गया। सफलता के झंडे गाड़े। टीवी की दुनिया में पर्दे के पीछे शानदार काम, नाम सब। फिर नौकरी छूटी।
तबीयत ख़राब होने की ख़बर मिली पिछले साल तो भागकर मिलने गया। अस्पताल में था, थोड़ा पस्त लेकिन फिर ठीक होकर लौट आया। किताब के विमोचन में भी आया था। भाभी से कई बार बात हुई, अभी हाल में फिर भर्ती हुआ अस्पताल में तो भाभी डरी हुई थीं। फिर उसकी फेसबुक पर कुछ पोस्ट देखीं तो लगा सब ठीक है, फ़ोन नहीं किया कि परेशान होगा। जल्द मिलने का सोच रहा था और अब यह ख़बर! कैसे मान लूँ यार Rajshekhar…
आनंद राय-
सुबह पंकज श्रीवास्तव की फेसबुक पोस्ट देखी। स्तब्ध रह गया। मेरे प्रिय साथी राजशेखर की अंतिम यात्रा की सूचना थी। यह मन मस्तिष्क को झकझोर देने वाली खबर थी। यकीन नहीं हुआ। पत्रकार साथी राजीव ओझा को फोन किया और यह उनके लिए भी आघात था। यद्यपि राजशेखर के बीमार होने से वह वाक़िफ़ थे, लेकिन इस “अंत” की उम्मीद नहीं थी।
राजशेखर के साथ स्मृतियों का ख़ज़ाना है और चूँकि वह जबर्दस्त “क़िस्सागो” थे तो उनके अंदाज़ उमड़ने घुमड़ने लगे। कहानी, कविता और रंगकर्म की दुनिया से पत्रकारिता में आए राजशेखर ने हर मौके पर अपनी छाप छोड़ी। वर्ष 1999-2000 में गोरखपुर प्रेसक्लब में संयुक्त मंत्री रहते हुए उन्होंने महामंत्री की भूमिका में कार्य संपादन किया और अपनी तारीफ पर पुलकित होते कहते “मने, हम ई सब भी बढ़िया कर सकते हैं।”
राजशेखर में प्रबंधन का भी पूरा गुण भरा था। प्रेस क्लब में श्रद्धेय डॉ सदाशिव द्विवेदी स्मृति पुस्तकालय के लिए किताब खरीदने के लिए हर्षवर्धन शाही जी के साथ दिल्ली की यात्रा में राजशेखर भी गए। साहित्य, कला प्रेमी इस शख़्स ने प्रेस क्लब के पुस्तकालय को सजा दिया। दोनों लोगों ने ख़रीदारी की अद्भुत मिसाल पेश की। कोष का पाई-पाई हिसाब रखते राजीव ओझा यही कहते “सब तारीफ एक साथ कर दो जाएगी।”
राजशेखर के लिखने पढ़ने की तारीफ़ तो सभी करते थे। उनकी कहानी “फिर वह कौन सा तूफ़ान था पम्मी” लखनऊ में कथाक्रम में पुरस्कृत हुई थी। हम लोग गोरखपुर रहते हुए प्रेस क्लब में खूब कार्यक्रम करते। हमारी कार्यकारिणी ने तय किया कि इस पर भी “विमर्श” आयोजित किया जाए। यकीनन साहित्यकारों ने उस विमर्श में राजशेखर की खूब सराहना की। गोरखपुर विश्वविद्यालय के गुरुवर श्रद्धेय आचार्य रामदेव शुक्ल जी ने तो राजशेखर को दिल से आशीर्वाद दिया और मंच से भी खूब सराहना की। राजशेखर में अपार संभावना थी।
राजशेखर का कोलकाता में दृश्य मीडिया से जुड़ाव हुआ और फिर रास्ता बदलते हुए दिल्ली चले गए। गुजरे 16-17 वर्षों में हम लोगों का गोरखपुर छूट सा गया। मित्र बागीश धर द्विवेदी, राजेश सिंह और राजीव ओझा हमसे पहले ही लखनऊ आ गए। और भी बहुत साथी लखनऊ आ गए। पर वहाँ जैसा माहौल नहीं बना। गोरखपुर रहते हुए जो कुछ हासिल हुआ, उनमें “राजशेखर” हम सबकी बड़ी धरोहर थे।
मित्र तुम दिल्ली जाकर भी दिल से जुड़े रहे, लेकिन अचानक एकदम चले जाओगे, यह वाक़ई उम्मीद नहीं थी। क्या कहूं——
सादर नमन!
राघवेंद्र दुबे-
फिलवक्त ‘ था ‘, ‘ थे ‘ नहीं लिख पाऊंगा
Romancing with uncertainty का मेरा हमराही
अभी तक तो मन मान ही नहीं रहा कि राजशेखर नहीं रहा । मन इस मनहूस खबर को अभी तक झुठलाने की जद्दोजहद में लगा है तो यादें कैसे लिखने बैठ जाऊं । लिखूंगा राजशेखर पर लेकिन, अभी नहीं लिख पा रहा हूं ।
नहीं लिख सकता अभी, ‘ था ‘ । नहीं लिख सकता जब मैं चीखने को होता था, वह मुस्करा सकता था । जब मैं भभक उठता था, वह गा सकता था । क्या अजीब और गहरे रिश्ते थे, मेरे और उसके बीच ।
एक साथ, एक ही समय रफ़ीक़ और रकीब भी लेकिन किसी की जिंदगी में जरूरी लगना, हो जाना, उसकी सबसे बड़ी खूबी थी । मैं खुद भी ऐसा ही हूं, विरुद्धों का पुलिंदा ‘ A bundle of contradictions , Opposites ‘। इसलिए मुझे ऐसे बहुत पसंद हैं , राजशेखर जैसे , जिसके साथ पूरी तरह होना और उससे अलग हो जाना दोनों बहुत मुश्किल था , लगभग नामुमकिन ।
लेखक ऑस्कर वाइल्ड ने कहा था – रोमांस का सार ही अनिश्चितता है । जब आप किसी रिश्ते में हर पल, हर परिणाम पहले से तय कर लेते हैं, तो रोमांच खत्म हो जाता है । अनिश्चितता एक खाली कैनवस की तरह है, जिस पर आप और आपका साथी मिलकर अपनी भावनाओं, रोमांच और आश्चर्यों के रंग भर सकते हैं । राजशेखर और मुझमें बस एक बात कॉमन थी –वह अनिश्चितता से रोमांस जी रहा था, मैं जी रहा हूं । इस ‘ था ‘ को अभी तो फेंके दे रहा हूं ।
वरिष्ठ लोकधर्मी पत्रकार और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भोजपुरी मानस के सहज प्रतिनिधि रविशंकर तिवारी की गहन शोक वहन करती कुल तीन – चार शब्दों की एक पंक्ति मेरी आंख में धुंधुआ रही है — का ए राजशेखर , अब इहे होई ?


