रवि राय-
ऐसे अचानक कौन जाता है राज शेखर?

गोरखपुर से पत्रकारिता के कई बिरवे दिल्ली में आकर फले-फूले। इस परंपरा के Rajshekhar Tripathi से मेरा संपर्क मेरे बचपन के मुहल्लेदार मित्र Vimal Jha ने कराया।
दिल्ली में गिनती के पांच या छह मौकों पर, किसी साहित्यिक आयोजन या कभी प्रेसक्लब में, राजशेखर जब भी मिले- लपक कर, हहा कर, पूरी गर्मजोशी से मिले। निकटता की सुगन्ध लिए, भोजपुरी के दो-चार वाक्य – “काsss हो भइया, कहाँ रहीला? कब्बो छोट भयवन के खोज खबर भी ले लिहल करीं……।”
मुझे याद है कि सन 2018 में नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पत्रकार राघवेंद्र दुबे की किताब ‘जैसे सांस देश की’ के विमोचन कार्यक्रम में अपनी यही गर्मजोशी और उन्मुक्तता लिए जब राजशेखर मुझपर भहराए, लगा जैसे किसी निर्जन द्वीप पर कोई अपना सा मिल गया हो। पास खड़ी अपनी पत्नी से भी बड़े उत्साह से उन्होंने मेरा परिचय कराया- “ई हवें, गोरखपुर के पुरान पत्रकार, बजरंग अली वाले, फेसबुक के बरगद- रवि भइया।”
बस ऐसी ही कई बार क्षणिक आत्मीय भेंट और फिर गायब !
अभी पिछले साल मई माह में जब मित्र शायर सिकन्दर इरशाद का निधन हुआ, उन्हें श्रद्धांजलि देने हम सब इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के ही एनेक्सी हॉल में इकट्ठा हुए थे। बीच कार्यक्रम में कोई पीछे से आकर ‘भइया प्रणाम’ बोलकर हाथ मिला कर चला गया। बगल में बैठे देवेश ने पूछा, “इन्हें आप जानते हैं?” हाल के अंधेरे में मुझे दिखा तो था ही नहीं। देवेश ने ही बताया कि ये राजशेखर थे।
कार्यक्रम की समाप्ति पर लॉबी में राजशेखर फिर मिले। पता चला कि अपनी कार से आए थे । मैंने कहा भी कि साथ में ही चलूंगा, मुझे ले लेना। थोड़ी देर बाद हुजूर अंतर्ध्यान । मैंने फोन किया।
“अरे भइया, एकदम दिमकवे से उतर गइल। सॉरी सॉरी।”
कमाल की बात तो ये है कि इस गिल्ट को लेकर उन्होंने बीते दिनों मुझे ताबड़तोड़ कई फोन किये।फालतू बकवास और सिर्फ लंतरानियां। कहना पड़ा कि, “या त तूँ ग्रेटर नोएडा हमरे घरे आवा नाहीं त हमहीं तोहरे घर आ जाईं।”
न वो आए न मेरा ही जाना हुआ।
पता चला कि वे चैनल की नौकरी से बाहर हो चुके थे और अपना पोर्टल शुरू करने की जुगत में जूझ रहे थे। पिछले काफी समय से वे बीमार चल रहे थे, यह आज विमल झा ने बताया।
झटके देने की आदत थी इनकी। आज भी मुझे झटका ही लगा, पर यह तो वज्रपात था।
न्यूज़ 18 और इंडिया टीवी की तमाम क्लिप्स याद आ रही हैं।तुम्हारा गाता बजाता ‘दास मलूका’ तो बहुत याद किया जाएगा मित्र।
शायद मुझे अब कभी ऐसा झटकेबाज़ मगर खुले दिल का, सच्चा और अनुरागी अनुजवत मित्र दिल्ली की अपनी किसी जुटान में न मिले। श्रद्धांजलि!
नजीर मलिक-
अचानक मिली खबर से आहत हूँ। छोटे भाई सरीखे राजशेखर त्रिपाठी का जाना बहुत खल रहा है। राजशेखर नए दौर के उन मुट्ठी भर पत्रकारों में से थे जो हमेशा मूल्यों की पत्रकारिता के लिए कुछ भी कर सकते थे। इज़के लिए उन्होंने कई बार नौकरी को भी लात मारनी पड़ी।
53 साल की उम्र कोई उम्र नहीं होती, मगर अपने मूल्य आधारित पत्रकारिता के लिये उन्होंने मालिकान से बहुत पंगे लिये। नतीजतन कई बार वे आर्थिक संकटों में भी रहे। राष्ट्रीय सहारा अखबार को छोड़ के जब वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मनाए तो “IBN7”, “इंडिया tv”, “आज तक” आदि कई चैनलों में रहे, मगर हर बार उन्हें अपनी विचारधारा के कारण काफी मुश्किलें उठानी पड़ीं।
वह राष्ट्रीय सहारा गोरखपुर के प्रकाशन के साथ पत्रकारिता जगत में आये उस समय मैं दैनिक जागरण गोरखपुर में था। वे मुझसे 17 साल छोटे थे, लेकिन सिद्धांत और मूल्य के आधार पर वे बहुत बड़े थे। मगर इलेट्रॉनिक मीडिया में आने पर वह कभी अपने काम से संतुष्ट न रहे।
दरअसल वह सोचते थे, अब अपनी शर्तों पर मीडिया में रह पाने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। हाल के दिनों में वे बीमार हो गये, मगर इसके बावजूद भी उन्होंने लिखने पढ़ने से मुंह नहीं मोड़ा। और शानदार लेखन करते रहे। दो तीन महीने पहले उन्होंने एक इंटरव्यू ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था की “भारत के हर राजनीतिक दलों में आरएसएस बैठा हुआ है। इनसे छुटकारा पाए बिना मुक्ति संभव नहीं।” राजशेखर से काफी अर्से से मुलाकात नहीं हुई। एक दो बार दिल्ली में मिलने का प्रयास भी किया, मगर शायद नियति को मंजूर न था।
अभी-अभी खबर मिली कि शुक्रवार को उनकी मौत हुई। उसी दिन उनका नोयडा में अंतिम संस्कार भी हो गया। उनका अपने पैतृक गांव के बजाय नोयडा में अंतिम संस्कार होने से गोरखपुर के सभी पुराने साथी उनका अंतिम दर्शन भी न कर सके।
राजशेखर की अभी जाने की उम्र नहीं थी, मगर जाना पड़ा। ईश्वर उनके आत्मा को शान्ति दे। चले तो गए लेकिन उनकी याद दिल मे हमेशा रहेंगी। आप बहुत याद आएंगे अनुज।
गोरखपुर वाले राजशेखर त्रिपाठी जी नहीं रहे……
ये खबर नहीं एक धमाके कि तरह है जिसने पूरे वजूद को हिला दिया। इंडिया टीवी में उनके साथ कुछ साल काम करने का मौका मिला था। वो जब भी कहीं मिलतें या हमारे रिसर्च वाले केबिन में आतें तो ज्यादातर बातचीत गोरखपुर वाली भोजपूरी में करतें। उनसे मिलता तो लगता कि कोई तो है जो अपने ननिहाल साइड से है। मुझको ठाकुर बुलाते थें। बहुआयामी प्रतिभा के धनी, बेबाक। इंडिया टीवी छोड़ते वक्त जिन तीन लोगों से मिलने गया था, उनमें एक राजशेखर जी भी थें। उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा था कि कोई भी आपकी किस्मत तय करने की ताकत नहीं रखता। अपने पसंद का करना। आज राजशेखर जी का जाना अखर रहा है। पत्रकारिता जगत से एक कीमती मोती टूटकर बिखर गया। यह अपूर्णीय क्षति है।
विनम्र श्रद्धांजलि। भगवान उनको चिर शांति और परिवार को दुख सहने की शक्ति प्रदान करें। -भूपेन्द्र सिंह तोमर, लखनऊ हाईकोर्ट
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