यशवंत सिंह-
राजशेखर भाई का मेरा संबंध भड़ास शुरू होने के पहले से रहा है। मैं दिल्ली में मयूर विहार फेज थ्री की जीडी कॉलोनी में रहा करता था। राजशेखर भाई का निवास बगल में हुआ करता था। रात बिरात हम लोग साथ मिला करते थे। हम दोनों के बच्चे छोटे छोटे थे। उनकी बातें होतीं। नए तरह से खाने पकाने को जिया जाता।
बाद में ज़िन्दगी करियर के संघर्ष के चलते हम अलग अलग जगहों की इंसानी बस्तियों में बस गए। लेकिन संबंध अनवरत अटूट चलते रहे।
बहुत बाद में हम दुबारा इकट्ठे सपरिवार गौर सिटी ग्रेटर नोएडा के फिफ्थ एवेन्यू में मिले। बिना प्लान, अकस्मात! वे गौर सिटी में घर के मालिक थे और मैं उसी सोसाइटी के किसी टावर में किरायेदार। अचानक और बिना प्लानिंग था ये मिलन। संबंध जारी रहे। बहस विमर्श कभी फ़ोन पर कभी मिलकर जारी रहा।
इसके बाद मैं अपने फ्लैट में शिफ्ट हो गया। उनके नजदीक ही। उनके बिल्कुल बगल में ही।
कुछ माह पहले मेरी पत्नी एक बार बीमार हुई तो दोनों पति पत्नी अगली सुबह मिलने आए। ज़्यादा नहीं, बस दो माह पहले की ये घटना है। उनसे बातें होती रही। उन्होंने तनिक आभास नहीं होने दिया किसी कष्ट में हैं वो।
वो लीवर के प्रॉब्लम से जूझ रहे थे। पर मुझे तनिक न लगा ये प्रॉब्लम इतनी जल्दी उन्हें हमसे छीन ले जाएगी।
भाभी और बच्चों का चेहरा याद आ रहा है। बच्चों ने आख़िरी संस्कार किए। मुझे जीवन में किसी के जाने पर पहली बार रोना आया। क्या कहूँ।
राजशेखर जी अदभुत प्रतिभा के धनी थे। जीवंत और सदाबहार! हँसी और मस्ती के प्रभु! मैं उनके जाने पर हिल गया हूँ। लगता है हम सब बूढ़े हो रहे हैं। सन तिहत्तर के जन्मे हैं वो! मेरा भी पैदा होने का साल यही है।
मृत्यु हम सबका पीछा कर रही है। सबके जाने के बहाने अलग अलग होंगे।
आंतरिक यात्रा और ध्यान-मेडिटेशन, यथासंभव बस यही रास्ता है।
अपनी आदतों की ग़ुलामी करने से इंकार करें और ज़िन्दगी में कुछ मौन कुछ संन्यास भरें, यही कामना है।
मित्र राजशेखर की याद में भड़ास को चौबीस घंटे के लिए मौन में डालते हैं। मेरी तरफ़ से यही श्रद्धांजलि होगी।
उनकी अच्छी स्मृति को लिखिए , पब्लिश करिए!
प्रणाम!
आख़िरी यात्रा की कुछ तस्वीरें-















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