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उत्तराखंड

सीएम धामी को आज़ाद मीडिया से डर लगता है!

पत्रकार हेम भट्ट की रिहाई के लिए पत्रकार होने लगे गोलबंद

Hindi protest-style poster with a man in a suit on the right and bold red headlines; left side lists allegations and snippets of text in Hindi, criticizing a journalist and police actions.

संदीप भंडारी-

आज प्रातः लगभग 4 बजे जय भारत टीवी के निर्भीक पत्रकार भाई हेम भट्ट जी को पुलिस द्वारा घर से उठाना और उनकी पत्नी का फोन तक अपने साथ ले जाना केवल एक व्यक्ति पर कार्रवाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।
सवाल यह है कि आखिर उत्तराखंड में पुलिस जनता की सुरक्षा कर रही है या सत्ता की सुरक्षा एजेंसी बन चुकी है? क्या अब सच दिखाना अपराध हो गया है? क्या पत्रकारिता का मतलब केवल सत्ता के सामने सिर झुकाना रह गया है?

Male reporter in a light blue shirt holding a microphone with a news logo, standing outdoors in a sunny, leafy area.
हेम भट्ट

जब-जब सत्ता डरती है, सबसे पहले कलम पर हमला होता है। क्योंकि सत्ता जानती है कि सच बोलने वाली आवाज जनता को जगाने की ताकत रखती है।

आज पूरी दुनिया भारतीय मीडिया को किस नजर से देख रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। विदेशों में कई मंचों पर भारतीय मीडिया की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर सवाल उठ चुके हैं। नॉर्वे की वह घटना भी देश नहीं भूला, जब एक सामान्य विदेशी पत्रकार ने भारतीय मीडिया की कार्यशैली का मजाक उड़ाते हुए हमारे देश की छवि और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री तक का अपमान करने का दुस्साहस किया। यह केवल किसी व्यक्ति का अपमान नहीं था, बल्कि उस मीडिया व्यवस्था पर सवाल था जो सत्ता से सवाल पूछने के बजाय अक्सर सत्ता की ढाल बनती दिखाई देती है।

दुर्भाग्य यह है कि आज भारत की मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जनता की आवाज बनने के बजाय “प्रायोजित राष्ट्रवाद” और “सत्ता भक्ति” का प्रतीक बनता जा रहा है। जो पत्रकार सरकार से सवाल पूछते हैं, उन पर मुकदमे, दबाव, धमकी और गिरफ्तारी—यही आज का नया लोकतांत्रिक मॉडल बना दिया गया है।

उत्तराखंड में लगातार बढ़ती दमनकारी घटनाएँ बेहद चिंता का विषय हैं। रात के अंधेरे में पत्रकारों को उठाना यह साबित करता है कि सरकार आलोचना से बौखला चुकी है। जो शासन सवालों से डरने लगे, समझ लीजिए उसका नैतिक पतन शुरू हो चुका है।
इतिहास गवाह है— चाहे मुगलकाल का दमनकारी शासन हो, अंग्रेजों का अत्याचार हो या दुनिया का कोई भी अहंकारी सत्ता तंत्र, जनता की आवाज को दबाने वाले शासन ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए। लाठियों और पुलिसिया डर के सहारे कुर्सी बचाई जा सकती है, जनता का विश्वास नहीं।

हम स्पष्ट चेतावनी देते है कि यदि पत्रकार भाई हेम भट्ट जी के साथ न्यायपूर्ण और सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया गया, तो उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा सड़क से लेकर हर स्तर पर लड़ेगा।

हम हर उस आवाज के साथ खड़े हैं जिसे दबाने की कोशिश की जा रही है। लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध सवाल पूछना नहीं, बल्कि सवालों को कुचलना होता है।

आज प्रातः लगभग 04 बजे #जयभारतटीवी के रिपोर्टर भाई #हेमभट्टजी को पुलिस द्वारा घर से उठाया जाना और साथ में उनके #पत्नी का #फोनछीनकर साथ ले जाना #धामीसरकार के #कायरता का एक और उदाहरण है देहरादून पुलिस द्वारा असंवैधानिक तरीके से एक पत्रकार को इस तरीके से परेशान करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है!
ऐसी घटनाएं बार – बार याद दिलाती है कि मीडिया को धामी सरकार घर के जमाई समझ बैठे है जो सत्ता से प्रश्न करेगा उसे और उसके परिवार को इसी तरह परेशान किया जाएगा!
परन्तु इस राज्य में संघर्ष वाले व्यक्तित्वों की कमी नहीं है, और हम न ही सत्ता की हनक से घर बैठने वाले लोग हैं यदि भाई हेम भट्ट जी को तत्काल सकुशल घर तक वापस नहीं छोड़ा जाता तो आज देहरादून में प्रदर्शन होगा।

जय उत्तराखण्ड, जय स्वाभिमान
उत्तराखण्ड स्वाभिमान मोर्चा

-बॉबी पंवार


क्या इस तरह किसी अपराधी द्वारा नाम लिया जाएगा और Dehradun Police सुबह के चार बजे पत्रकार को घसीटते हुए ले जायेंगे? अगर कोई अपराधी भाजपा नेताओं का नाम ले तो इसी तरह बिना नोटिस के घसीटते हुए ले जाओगे? मजाक बना रखा है सिस्टम का? अरे भाई शर्म तो आती होगी थोड़ा बहुत ख़ुद पर, इस तरह की हरकतें करते हुए। हमेशा ये सरकार बहादुर नहीं रहेगी। जनता ज़ुल्म देख रही है और वही शाश्वत भी है। उसके ताप झेलने के लिए तैयार रहना भाई। बाक़ी तुम्हारे गुनाहों को भगवान माफ़ करे तो करे इंसान तो नहीं कर पायेंगे। हम श्री हेम भट्ट जी की जल्द रिहाई चाहते हैं।

-संजय सिल्सुवाल

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