आशीष रंजन-
जो लोग स्वतंत्र रूप से नौकरी करने या करियर बनाने के ख्याल से दिल्ली, मुंबई या बैंगलोर वगैरह छोड़कर वापस बिहार जाकर कुछ करना चाहते हैं, उनके लिए बिहार नरक से कम नहीं है। मैं यह गलती कर चुका हूँ और मुझे इतनी नफ़रत हो गई है कि अब वहाँ किसी अन्य काम से भी जाने का मन नहीं करता। एक स्वस्थ मानसिकता वाले शांतिप्रिय, सभ्य, शालीन और सुशिक्षित व्यक्ति के लिए बिहार कतई सही जगह नहीं है। सरकारी नौकरी वालों के पास कोई चारा नहीं होता, चाहे वे रोकर रहें या हँसकर। जिनके परिवार की वहाँ पुश्तैनी संपत्ति, व्यवसाय या खेती-बाड़ी है, उनके लिए उतना कठिन नहीं है। लेकिन जो स्वतंत्र रूप से नौकरी या व्यवसाय करना चाहते हैं, वे वही हैं, जो ‘चूना’ के पहले अक्षर, अंतिम के दूसरे अक्षर और ‘चुहिया’ के तीसरे अक्षर को मिलाकर बनने वाले शब्द से संबोधित किए जा सकते हैं।
जब दूसरे कार्यकाल में नीतीश कुमार का ‘सुशासन’ अपने चरम पर था और मीडिया बिहार को इंग्लैंड-अमेरिका जैसा बताने लगी थी, तब मेरे भीतर भी वापस जाने का कीड़ा कुलबुलाने लगा। मेरे पास रॉयल बैंक ऑफ़ स्कॉटलैंड में चार वर्षों तक काम करने का अनुभव था। इसी दौरान एचडीएफसी बैंक से कॉल आई। टेलीफोनिक राउंड क्लियर होने के बाद फाइनल राउंड के लिए मुझे पटना भेजा गया। मुझे लगा कि इससे बेहतर क्या होगा कि घर में ही नौकरी मिल जाए। मैं गया। पैनल में दो सीनियर लोग बैठे थे। वे इतनी खराब अंग्रेज़ी बोल रहे थे, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। मेरी अंग्रेज़ी और नॉलेज उनसे कहीं बेहतर था। इंटरव्यू में मैं उन पर भारी पड़ रहा था, फिर भी मेरा चयन नहीं हुआ। मैंने सोचा कि कुछ दिन रुककर किसी अन्य नौकरी के लिए प्रयास करता हूँ।
मैंने तमाम कंसल्टेंट्स से संपर्क किया और अपने सारे नेटवर्क का इस्तेमाल किया। कुल मिलाकर यह समझ में आया कि 90% नौकरियाँ सेल्स-ओरिएंटेड थीं, जैसे इंश्योरेंस, मेडिकल रिप्रेज़ेंटेटिव और बैंकिंग से जुड़ी भूमिकाएँ, जिनकी सैलरी दिल्ली से भी आधी थी। बाकी की 10% ‘क्रीम’ नौकरियों में लोग कैसे भर्ती होते होंगे, यह तो मैं क्या, स्वयं ब्रह्मा जी भी शायद पता न लगा सकें। कहीं कोई जुगाड़ भी लगता, तो 12–15 हज़ार रुपये की सैलरी ऑफर होती। अंततः मैंने एक अन्य प्राइवेट सेक्टर बैंक कम सैलरी पर जॉइन किया। वहाँ का ब्रांच मैनेजर महाअनपढ़ और गंवार था। वह उस पद तक पहुँचा कैसे, यह मेरी समझ से बाहर था। किसी तरह दो महीने तक बर्दाश्त किया।
फिर एक दिन नौकरी डॉट कॉम के माध्यम से एक सुशिक्षित, अंग्रेज़ी बोलने वाली एचआर एक्जीक्यूटिव का कॉल आया, जो एक क्षेत्रीय टीवी चैनल से थीं। मेरी अंग्रेज़ी भी अच्छी थी, इसलिए मीडिया मार्केटिंग मैनेजर के पद पर मेरा चयन हो गया, हालाँकि सैलरी बहुत अधिक नहीं थी।
इस नौकरी में लोगों से मिलना और टीवी के लिए विज्ञापन लाना मुख्य काम था। इस दौरान मैंने पूरे पटना को छान मारा। तरह-तरह के लोगों से संपर्क और संवाद हुआ – जैसे बिल्डर्स, कोचिंग संस्थानों के मालिक, ज्योतिषाचार्य, लेखक, कवि और शैक्षणिक संस्थान चलाने वाले लोग। एक से बढ़कर एक नमूने मिले, हालाँकि इक्का-दुक्का भले और गुणीजन भी मिले। काम की बात में शायद ही किसी की रुचि होती थी। 90% लोगों का ध्यान इस बात पर रहता था कि मैं कायस्थ हूँ या भूमिहार, क्योंकि मेरा सरनेम ‘रंजन’ है।
एक कायस्थ सज्जन मिले, जिन्होंने मुझे भी कायस्थ समझते हुए कहा – “रंजन, रंजन के काम नहीं आएगा तो कौन आएगा?” उन्होंने बताया कि वे अरवल में एक स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोलने जा रहे हैं और फंडिंग की बात चल रही है। बोले, “आप अंग्रेज़ी अच्छी बोल लेते हैं। वहाँ लोगों को अंग्रेज़ी सिखानी होगी।” मैंने कहा, “ठीक है, बताऊँगा।”
एक कोचिंग संस्था के मालिक अपने ऑफिस में सोफे पर पसरे हुए मिले। उन्होंने मुझे प्रोफेशनल तरीके से अंग्रेज़ी बोलते देखा तो काम के अलावा मेरी निजी जानकारी लेने लगे, जैसे कहाँ तक पढ़े-लिखे हैं, पटना में कहाँ घर है, बाबूजी क्या करते हैं, पटना के अलावा पुश्तैनी घर किस पंचायत में है, और 12–14 हज़ार की नौकरी में क्यों फँसे हुए हैं। दरअसल रंजन होने का अर्थ ये है कि प्रॉपर पटना का हुआ तो कायस्थ अन्यथा भूमिहार – उनकी दिलचस्पी ये जानने में थी। मैंने बताया पटना में घर है मगर प्रॉपर पटना का नहीं हूं, अपनी जन्मभूमि का पंचायत बता दिया। फिर वे बोले, “एमबीए किए हुए हैं महाराज! दिल्ली छोड़कर यहाँ कहाँ आ गए?” प्राइवेट नौकरी के लायक ये जगह नहीं है।
एक और नामी-गिरामी कोचिंग सेंटर के डायरेक्टर से मुलाकात हुई। उन्होंने अपनी ओर से अंग्रेज़ी में बातचीत शुरू की। शायद उन्हें अंदाज़ा नहीं था और उन्होंने मुझे हल्के में लिया था। मैंने भी अंग्रेज़ी में ही जवाब दिया। लगभग एक घंटे की बातचीत में मैंने एक भी हिंदी शब्द का प्रयोग नहीं किया। धारा-प्रवाह अंग्रेज़ी में देश-दुनिया, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बातचीत होती रही। अंत में वे काफी प्रभावित हुए और बोले, “पटना आपके लायक जगह नहीं है। आपने दिल्ली छोड़कर गलती कर दी।”
एक लेखक-कवि, जो एक बड़े एजुकेशन सोसायटी के मालिक भी थे, उनसे मिलने गया। उन्होंने अपने आसपास मंडली जमा कर रखी थी। वे मानो आत्ममुग्ध होकर अपने मन की बातें सुनाए जा रहे थे। सुनने में उनकी दिलचस्पी कम थी। कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकला कि तमाम अनुभवों के आधार पर वहाँ के लोगों की मानसिकता मुझे बेहद संकीर्ण, क्षुद्र और पिछड़ी लगी। काम की बात से कम मतलब, जातिवाद, निजी मामलों में अनावश्यक दिलचस्पी, टालमटोल वाला रवैया, गैर-पेशेवर व्यवहार, बोलने की तमीज़ का अभाव, सेटिंगबाज़ी और चुगली करने वाले लोग अधिक मिले। 100 में 95 लोग वैसे ही मिलेंगे।
वहाँ रहने और काम करने के लिए बहुत मोटी चमड़ी चाहिए। कोई भी स्वस्थ मानसिकता वाला व्यक्ति वहाँ लंबे समय तक टिक नहीं पाएगा। जो लोग बिहार वापस जाकर बिहार का भला करना चाहते हैं, वे एक हज़ार बार सोच लें। दूर रहकर जितना भला कर सकते हैं, करते रहें।
कल बिहार की राजधानी पटना के एक बड़े से दिखने वाले होटल में पिता के सामने होटल के कमरे से उसकी बेटी को उठाने की कोशिश हुई, वीडियो देखा जिसमें लड़की का पिता रो-रोकर सारी कहानी बता रहा है। वह अपनी बेटी को परीक्षा दिलवाने आया था। सोचा होटल में रहेंगे तो सुरक्षित रहेंगे। लेकिन पता चला कि वह होटल तो सबसे असुरक्षित जगह था। बिहार का एक और वीडियो देखा जिसमें शराब बेचने वाले दो लड़कों को पुलिस ने पकड़ रखा है और वह कैमरे के सामने कह रहा है कि छूटने के बाद वह फिर शराब बेचेगा। शराब नहीं बेचेगा तो क्या करेगा। तीसरा वीडियो देखा जिसमें कुख्यात सोनू-मोनू के घर छापा मारने गई पुलिस की तलाशी बदमाशों के समर्थकों ने ली। तलाशी देने के बाद जब पुलिस अंदर पहुँची तब तक बदमाश वहाँ से भाग चुके थे। यही बिहार का विकास है!
-प्रभात रंजन
अनिल कुमार-
बिहार में सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद लोकतंत्र का अच्छा और बराबरी का चेहरा देखने को मिल रहा है. इस तरह के प्रयास समरसता बढ़ाने का काम करते हैं. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में पुलिस तनिक भी लोकतांत्रिक तरीके से काम नहीं करती है, वह केवल एकतरफा काम करती है, जबकि बिहार की धरती लोकतंत्र को मजबूत करने वाली धरती है, इसे एक बार फिर बिहार पुलिस और अपराधियों ने साबित करने का काम किया है. इसकी पूरे देश में सराहना हो रही है.
पटना जिले के बाढ़-मोकामा क्षेत्र के हाथीदह गांव में गैंगेस्टर ब्रदर्स सोनू एवं मोनू का घर है. दोनों भाई अपने लूट-वसूली-अपराध के काम से इलाके में बहुत नाम और इज्जत कमाये हैं. बीते दिनों अनंत सिंह के एक शुभेच्छु ग्राम प्रधान पर बोथ ब्रदर्स सोनू-मोनू एंड कंपनी ने हमला किया था. इसी मामले में पुलिस इन दोनों भाइयों के घर की तलाशी लेने पहुंची थी. अगर यूपी-उत्तराखंड पुलिस होती तो धड़ाधड़ बिना किसी से कुछ पूछे जांचें दोनों गैंगेस्टर ब्रदर्स के घर में घुस जाती और तलाशी लेती.
बिहार पुलिस ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने गैंगेस्टर ब्रदर्स के गुर्गों की बेहद मांग पर अपनी तलाशी करवाई. जब गुर्गों ने पुलिस की तलाशी ले ली, तब पुलिस घर में तलाशी लेने पहुंची. दोनों तरफ से तलाशी होने की इस घटना को ऐतिहासिक और लोकतांत्रिक बताया जा रहा है. साथ ही इस बात की सराहना भी की जा रही है कि बिहार में संविधान के अनुसार बेहद लोकतांत्रिक व्यवस्था है कि पुलिस अगर गैंगेस्टर के घर में तलाशी लेने पहुंचती है तो उससे पहले तलाशी देती है ताकि परस्पर समानता बनी रहे.
थानाध्यक्ष रंजन कुमार और दूसरे थाने के थानाध्यक्ष कुंदन कुमार के कुशल नेतृत्व में पुलिस गैंगेस्टर ब्रदर्स के गुर्गों को अपनी सफल तलाशी देने में कामयाब रही. दोनों गैंगेस्टर ब्रदर्स कहीं जरूरी काम से भाग निकले थे, इसलिये पुलिस तलाशी में पाये नहीं गये. वरना बताया जा रहा है कि अगर दोनों भाई घर पर होते तो वो खुद पुलिस की तलाशी लेते, लेकिन कहीं भाग निकलने की वजह से मजबूरन उन्हें अपने गुर्गों से पुलिस की तलाशी करवानी पड़ी, जिसका बिहार पुलिस ने कतई बुरा नहीं माना.
गैंगेस्टर ब्रदर्स के गुर्गों को तलाशी देते बिहार पुलिस के जवान बेहद मासूम एवं दुलरूआ लग रहे हैं. इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि केवल खुद की तलाशी देकर ही पुलिस वाले नहीं लौटे बल्कि उन्होंने अपनी तलाशी देने के बाद दोनों गैंगेस्टर ब्रदर्स के घर की भी तलाशी ली, फिर आपस में दुआ सलाम करने के बाद वापस लौटे. यह दिखाता है कि बिहार में पुलिस-अपराधी के बीच अच्छी समझ और परस्पर समन्वय है. मैं बिहार बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की भूरि भूरि प्रशंसा करना चाहता हूं.
बिहार हमेशा से देश को राह दिखाता आया है. बिहार पुलिस का जाति पूछकर एनकाउंटर करने का प्रयास एक उचित कदम होगा, अगर वह इस पर चलने का प्रयास करती है तो. वैसे, मैं तो शुरू से मांग करता आ रहा हूं कि बिहार पुलिस एनकाउंटर से पहले अपराधी को अपनी तलाशी दे, इसके बाद उससे जाति प्रमाण पत्र की फोटो कॉपी तथा हॉफिडाबिट ले. तत्पश्चात किसी का एनकाउंटर करे. उत्तर प्रदेश की मनबढ़ पुलिस को भी बिहार पुलिस से लोकतंत्र सीखने की जरूरत है.
तिरछी_कटारी


