शशि भूषण-
अविनाश मिश्र विलक्षण लेखक हैं। जितने दक्ष उतने ही पारखी। सांस्कृतिक-ऐतिहासिक, उत्तर-आधुनिक, आलोचकीय, समकालीन विडंबनाओं और विमाओं के माहिर। यह लेखक हस्तक्षेप, बौद्धिकता, मर्म, व्यंजना, तनाव-संघर्ष को ऐसे साधता है कि पढ़कर ख़ुद्दार अनुभव-आनंद मिले। सत्ता केंद्रों, अवसरवादियों, धूर्तताओं, खाइयों, दीवारों, पहाड़ों, दुरभिसंधियों, गुटबाज़ियों, रफ़्तार और असफलता से डर न लगे।
दो टूक फटकारना अविनाश मिश्र की ऐसी ख़ासियत है जो विनम्र गुण कथन और मधुर आरोपण दोनों से उनकी सदैव रक्षा करती रहेगी।
जिस दिन शालिनी श्रीनेत ने एक साक्षात्कार में अविनाश मिश्र के विनम्र स्वीकार को “अनामिका जी ने माफ़ कर दिया” इस शीर्षक तक सीमित कर देने की कोशिश कर डाली उस दिन मुझे लगा था कि अविनाश मिश्र को अपने अस्वीकारों, साहस, जवाब दे देने और जूझ से नहीं अपनी विनय से बिना स्पष्ट आरोपण के सीमित करने की अचूक मीडिया सामर्थ्य से ख़तरा है।

हमारे समय में टकराने को, तनाव को, इंटेलेक्चुअल थ्रिल को, साहित्यिक संघर्ष को सुंदर प्रतिभा-गद्य में ढाल देने वाले किसी एक लेखक का नाम लेना हो, तो मेरे मुँह में जल्द ही अविनाश मिश्र का नाम आ जाएगा। अविनाश मिश्र के गद्य में हीनता नहीं मिलती, दैन्य नहीं मिलता, पलायन नहीं मिलेगा और नहीं मिलेगी अति महत्वाकांक्षी वीरता जो अक्सर करियर और अवसरवाद की कार्यशालाओं में सीख ली जाती है। यहाँ प्रयुक्त दोनों शब्द दैन्य, पलायन के संदर्भ में मुझे पूर्ण स्मरण है कि उल्था सम्बद्ध करना नहीं है। स्पष्ट कर दूँ- दैन्य नहीं, पलायन नहीं का सबसे कठोर उपदेश कृष्ण ने अर्जुन को दिया। यह कोरा उपदेश ही था। कृष्ण का अपना जीवन दैन्य, पलायन की कथित उत्कृष्टताओं से भरा रहा।
मैंने बोध-चेतना तक जाने की कोशिश की है अविनाश मिश्र की भाषा में। उसमें प्रतिकार मिलेगा, क्रोध मिलेगा, आक्रामकता मिलेगी लेकिन द्वेष और क्षुद्रता की जगह नहीं है। ‘तनाव’ अविनाश मिश्र के लेखन का केंद्रीय तत्व प्रतीत होता है। लेकिन मुझे इसके भरपूर साक्ष्य मिले हैं कि संवेदना अविनाश मिश्र का मूल पिंड है। मुझे आशा है कि जिस दिन अविनाश मिश्र ने दुःख को अपना विषय बना लिया उस दिन उनका लेखक करुणा का सिपाही नज़र आएगा। इतना ही निर्भीक, इतना ही साहसी और इतना ही व्यंग्य शक्ति का अनूठा सिद्ध।
महानगरीय जीवन परिस्थितियाँ, संपादन-आलोचना में होने के कारण लगातार साहित्यिक आभिजात्य का संपर्क अविनाश मिश्र की लेखकीय सीमा हो सकती है क्योंकि ऐसे नवोन्मेषी लेखक जनसाधारण के लेखक होकर ही पूर्ण विकसित होते देखे गए हैं।
दरअसल साहित्य में नया जनता से ही आता है। साहित्य से, साहित्य के द्वारा और साहित्य के लिए बड़ी से बड़ी प्रतिभा अक्सर समकालीन लेखकों को सम्पादन, प्रकाशन, समीक्षा नेतृत्व देती ही देखी गयी है। अविनाश मिश्र की सृजन मौलिकता में जनता के साहित्य की धारिता है।
यह मेरा निजी विश्वास, अपेक्षा है कि जिस दिन अविनाश मिश्र गद्य में, फिक्शन में आम लोगों के दुःख, सपनों, संघर्ष के साथ पूरी तरह खड़े हो जाएँगे उस दिन उनका लेखन समसामयिक साहित्यिक सुधार और चोट से निकलकर सामाजिक असीम हो जाएगा। इसके संकेत उनके अपनी बड़ी बहन पर लिखे एक औपन्यासिक से संस्मरण में मुझे दिख चुके हैं।
रोज़-रोज़ की मुश्किलें और लड़ाइयाँ अपनी जगह लेकिन मनुष्य जाति के स्मृति-इतिहास को लिख सकने के लिए अविनाश मिश्र जैसे लेखक चाहिए। बशर्ते वो अपने पर क़ायम रह सकें। इसकी आशा भी रखी जा सकती है क्योंकि अविनाश का ही स्वीकार है कि बुद्ध और गांधी के प्रभाव ही मेरे लिए काम्य हैं।
पढ़ें अविनाश मिश्र को, दस सवालों के जवाब-
https://hindwi.org/bela/ravivasariy-4-das-sawalon-ke-jawab-avinash-mishra


