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सुख-दुख

अकबर उर्दू नहीं, फ़ारसी बोलता था!

Two men sit at a dining table eating and talking, one gesturing with his hand while the other listens.

शम्भूनाथ शुक्ला-

जावेद अख़्तर बताते हैं कि जो लोग समझते हैं कि अकबर उर्दू बोलता था वे मूर्ख हैं। अकबर को फ़ारसी आती थी। थोड़ी-बहुत पंजाबी, ब्रज और अवधी। अकबर कोई ताज या मुकुट नहीं लगाता था। वह सिर पर साफ़ा लगा लेता। बदन पर बंडी व नीचे लुंगी लपेटे रहता।

एक अरब व्यापारी को तो वह एक दूकान में टकरा गया। जहाँगीर शराब पीता था और नूरजहाँ के आग़ोश में ही रहना उसे पसंद था। शाहजहाँ से मुग़लों की शाहख़र्ची पता चली। उसने दिल्ली का लाल क़िला और जामा मस्जिद बनवाई। औरंगज़ेब को भी अपने पुरखों की तरह ब्रज और अवधी में प्रवीणता हासिल थी। फ़ारसी तो खैर राजभाषा थी ही। उर्दू तो तब आई जब मुग़ल वंश की बादशाहत बस दिल्ली-पालम की हो गई थी। उर्दू तब तक कोई मुसलमानों की भाषा नहीं थी।

दिल्ली में रहते हुए अमीर खुसरो ने भी अवधी में दक्षता हासिल कर ली थी। उस समय अवधी का विस्तार बहुत हो गया था। अब यह काम श्री मधुकर उपाध्याय कर रहे हैं। उनके यू ट्यूब “अवध पंच” में जब मैं उनको अवधी बोलते सुनता हूँ तो लगता है काश! मैं भी ऐसी फ़र्राटे की कनपुरिया अवधी बोल पाता!

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