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सुख-दुख

मोदी सरकार की आलोचना की क़ीमत फ़र्ज़ी मुकदमों से चुकानी पड़ी!

मुकुल सरल-

क़ीमत चुकाती सच्ची पत्रकारिता : न्यूजक्लिक पर ईडी का केस रद्द होने पर बहुत लोग मुझे भी फ़ोन करके बधाई दे रहे हैं, लेकिन मेरे मन में कोई उत्साह नहीं जग रहा। हालांकि मैं निराश नहीं हूं लेकिन बहुत ख़ुश नहीं हुआ जा रहा। क्यों, क्योंकि आपने एक संस्थान के सारे संसाधन छीन लिए, उसे बर्बादी के कगार पर लाकर छोड़ दिया गया तो अब यह राहत भी राहत नहीं दे पा रही है।

ये तो वही बात हुई कि आप किसी व्यक्ति के हाथ-पांव काटकर कहें कि अब दौड़कर दिखा, लड़कर दिखा।
याद आते हैं गोरख पांडेय–
एक दिन राजा मरलें आसमान में ऊड़त मैना
बान्हि के घरे ले अइलें मैना ना।
खेले लगलें राजकुमार
उनके मन में बसल सिकार
पहिले पांखि कतरि के कहलें अब तू उड़ि जा मैना
मेहनत कै के उड़ि जा मैना ना।

आप जानते हैं कि यह सरकार कितनी चालाक है, शातिर है। उसे पता होता है कि उसके बनाए केस में कोई दम नहीं है और यह अदालत में नहीं टिकेगा तो जब फ़ैसले की घड़ी आती है वो उससे पहले ही कोई और फ़र्ज़ी केस बनाकर लाद देती है। अब आप एक से निकलो तो दूसरा तैयार है।

आपको मालूम है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने ईडी का केस रद्द करते हुए कहा कि फेमा के उल्लंघन का भी कोई मामला नहीं बनता और यह क़ानून का घोर दुरुपयोग है, लेकिन सरकार कहां मानती है। उसकी एजेंसी ने ऐसा ही एक और फेमा का केस बनाया हुआ है जिसमें न्यूज़क्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ पर 184 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है। अरे भइया इतना पैसा न्यूज़क्लिक या प्रबीर के पास होता तो उनके साथ काम करने वाले हम सब पत्रकार आज करोड़पति होते। यूं एक बार फिर नौकरी खोजने के लिए दर-दर न भटकते। न वालिंटरी या टोकन मनी में न्यूज़क्लिक में काम करते।

आप जानते हैं कि सरकार के हमलों के चलते एक झटके में करीब 100 पत्रकार सड़क पर आ गए। उनकी रोज़ी-रोटी छिन गई। इन 100 पत्रकारों के अपने परिवार भी हैं। तो आप समझ सकते हैं कि कितने लोग प्रभावित हुए। और इनमें ज़्यादातर वो प्रतिबद्ध पत्रकार हैं जो गोदी मीडिया में भी नहीं जा सकते। और आज के हालात ये हैं कि जो अच्छी और जनवादी पत्रकारिता करते हैं उन संस्थानों के पास काम तो है, लेकिन देने के लिए पैसा नहीं है। ये संस्थान ख़ुद क्राउड फंडिंग के सहारे चल रहे हैं और सरकार क निशाने पर हैं ही।

और आप जानते हैं कि न्यूज़क्लिक के फाउंडर और एडिटर इन चीफ़ प्रबीर पुरकायस्थ अब 80 बरस के हो रहे हैं। इस उम्र में भी 2021 से शुरू हुई लड़ाई इतने दिन खींच लाए। अक्टूबर 2023 में छापे का उत्पीड़न झेलने के बाद, एकाउंट फ्रिज़ होने के बाद भी वे इतना लंबा लड़े। हम सब साथी पत्रकारों के भी मोबाइल छिन गए, लैपटॉप चले गए। लेकिन हम भी काम करते रहे…लेकिन कब तक…अब प्रबीर से भी कितनी उम्मीद की जाए कि वे लड़ते रहें, न्यूज़क्लिक चलाए रखें। उम्र और मुकदमों की टेंशन से उनकी सेहत पर भी असर पड़ा है।

वे कहते हैं कि अगर यही सब 10 साल पहले होता तो वो झेल जाते लेकिन अब कब तक…। एक मुकदमे से निकलो तो दूसरा मुकदमा। एक एजेंसी के बाद दूसरी एजेंसी। आज ये काग़ज़ जमा करो, कल वो जवाब दाखिल करो। आज इस वकील से बात करो, कल उस वकील से मिलो। आज इस अदालत जाओ, कल उस अदालत। इसमें ही सारा दिन, सारी एनर्जी चली जाती है। और हां, मोदी जी के परम मित्र अडानी जी ने भी तो प्रबीर और प्रंजॉय गुहा ठाकुरता जैसे बुजुर्गों पर दूर-दराज के इलाकों में केस कर रखा है। और उसमें अदालत का आदेश होता है कि फिज़िकल पेशी होनी है।

ख़ैर फिर भी हम दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले से ख़ुश हैं। लेकिन ये भी सच है प्रक्रिया ही सज़ा बन गई है। अब जो नुक़सान हो चुका है उसकी भरपाई कैसे हो, यही सवाल है। ईडी या सरकार तो माफ़ी भी नहीं मांगेंगे कि उनसे ग़लती हुई, जबकि क़ायदे से उनको न्यूज़क्लिक और उसके पत्रकारों को मुआवज़ा भी देना चाहिए।


ED का एक और केस धराशायी हुआ। एक मीडिया कंपनी बंद हो गई, प्रेस फ़्रीडम पर सीधा हमला हुआ।आलोचना की क़ीमत फ़र्ज़ी मुकदमों से चुकानी पड़ी। न्यायिक प्रक्रिया को हथियार बनाकर प्रक्रिया को ही सज़ा बना दी गई। ये सब प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से अदालत कह रही है।

आशुतोष मिश्रा


दिल्ली पुलिस का केस औंधें मुँह गिर गया. FIR के मुताबिक़ Newsclick चलाने वाली कंपनी में 2018 में ₹9.59 करोड़ विदेशी निवेश अमेरिका से आया था. तब डिजीटल मीडिया में विदेशी निवेश की कोई सीमा नहीं थी. यह सीमा 2019 में 26% की गई थी. दिल्ली पुलिस का आरोप था कि विदेशी निवेश नियमों का उल्लंघन था. शेयरों की क़ीमत ज़्यादा लगाई गई और निवेश दूसरे कामों के लिए डायवर्ट किया गया. इसी आधार पर ED ने भी Money Laundering का केस बनाया.अब दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि कोई केस बनता ही नहीं है. हालांकि प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ UAPA का केस चल रहा है. इस केस में वो ज़मानत पर हैं.

मिलिन्द खांडेकर

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