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छत्तीसगढ़

मुकेश चंद्राकर हत्याकांड: जेल के अंदर से गवाहों को प्रभावित करने का आरोप, पत्रकारों ने की निष्पक्ष जांच की मांग!

बीजापुर/जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के चर्चित पत्रकार मुकेश चंद्राकर हत्याकांड में एक नया विवाद सामने आया है। बस्तर संभाग के पत्रकारों ने आरोप लगाया है कि मामले के कुछ गवाहों को प्रभावित करने और अदालत में बयान बदलवाने की कोशिश की जा रही है। इस संबंध में पत्रकारों ने पुलिस प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच और आवश्यक कार्रवाई की मांग की है।

पत्रकारों का आरोप है कि हत्याकांड के मुख्य आरोपी सुरेश चंद्राकर से जुड़े कुछ लोग मामले के गवाहों से संपर्क कर रहे हैं। आरोप है कि गवाहों को कथित तौर पर आर्थिक प्रलोभन देकर अदालत में अपना पक्ष बदलने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।

वायरल ऑडियो के बाद उठा मामला

पूरा विवाद उस समय चर्चा में आया जब सोशल मीडिया पर एक कथित ऑडियो क्लिप वायरल हुई। पत्रकार संगठनों का कहना है कि ऑडियो में सामने आई बातों की फोरेंसिक और तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

इसी मांग को लेकर बीजापुर के पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस अधीक्षक के नाम अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक चंद्रकांत गवर्ना को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में मांग की गई है कि वायरल ऑडियो की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी प्रकार का दबाव या प्रलोभन देने का प्रयास हुआ है तो उसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

जेल प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल

पत्रकारों ने यह सवाल भी उठाया है कि यदि आरोप सही हैं तो केंद्रीय जेल जगदलपुर में बंद आरोपी तक बाहरी लोगों की पहुंच कैसे संभव हो रही है। उन्होंने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली की भी जांच कराने की मांग की है।

हालांकि इस संबंध में अभी तक जेल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

पत्रकारों ने एकजुट होकर उठाई आवाज

ज्ञापन सौंपने वालों में पी. रंजन दास, पवन दुर्गम, गणेश मिश्रा, पुष्पा रोकड़े, नितिन रोकड़े, चेतन कापेवार, सतीश अल्लूर, भरत दुर्गम, संतोष तिवारी और घनश्याम यादव समेत कई स्थानीय पत्रकार शामिल रहे। इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र महापात्र और बादशाह खान भी मौजूद थे। पत्रकारों ने कहा कि वे मामले में निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित कराने के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे।

क्या है मुकेश चंद्राकर हत्याकांड?

गौरतलब है कि स्वतंत्र पत्रकार और यूट्यूब चैनल ‘बस्तर जंक्शन’ के संचालक मुकेश चंद्राकर की हत्या जनवरी 2025 में हुई थी। विशेष जांच दल (SIT) के अनुसार, सड़क निर्माण परियोजना में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से जुड़ी रिपोर्टिंग के बाद उन्हें एक परिसर में बुलाया गया, जहां उनकी हत्या कर शव को सेप्टिक टैंक में छिपा दिया गया था।

हत्याकांड का मुख्य आरोपी सुरेश चंद्राकर

मामले में मुख्य आरोपी सुरेश चंद्राकर सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बना और पत्रकार संगठनों ने इसे पत्रकार सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में शामिल बताया।

अब गवाहों को प्रभावित करने के नए आरोपों ने इस बहुचर्चित मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। पत्रकार संगठनों का कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आरोपों की गंभीरता से जांच होना आवश्यक है।


डेमोक्रेसी स्क्वार्ड नामक एक्स हैंडल लिखता है-

बस्तर में पत्रकार मुकेश चंद्रकार की हत्या सिर्फ एक पत्रकार की शारीरिक मृत्यु नहीं थी, बल्कि वह बस्तर की बची-कुची स्वतंत्र आवाज का गला घोंटने की एक हिंसक कोशिश थी। लेकिन इस त्रासदी का सबसे वीभत्स और डरावना अध्याय अब जगदलपुर केंद्रीय जेल की ऊंची दीवारों के पीछे लिखा जा रहा है। बीजापुर के पत्रकारों द्वारा 18 जून 2026 को सौंपा गया ज्ञापन महज एक शिकायत पत्र नहीं है; यह छत्तीसगढ़ के गृह और जेल प्रशासन के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह दस्तावेज़ साबित करता है कि राज्य की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली जेलें अब सुधार गृह नहीं, बल्कि अपराधियों के सुरक्षित ‘कमांड सेंटर’ में तब्दील हो चुकी हैं।एक खोजी पत्रकार के नजरिए से देखने पर, यह मामला जेल मैनुअल के उल्लंघन की छोटी-मोटी घटना नहीं है। यह सीधे तौर पर न्याय व्यवस्था को बंधक बनाने (Subversion of Justice) का एक सुनियोजित और संस्थागत प्रयास है।

मुख्य आरोपी सुरेश चंद्रकार जेल के भीतर बंद है, लेकिन उसका नेटवर्क बाहर उतना ही जीवंत और हिंसक है जितना पहले था। सुनील मर्सकोले जैसे छद्म और स्वयंभू चेहरों को मोहरा बनाकर गवाहों तक सीधे पहुंच बनाना और उन्हें आर्थिक प्रलोभन या परोक्ष धमकियां देना यह दिखाता है कि बस्तर का यह क्रिमिनल सिंडिकेट कानून की संप्रभुता को कितनी बेशर्मी से चुनौती दे रहा है।यहाँ सबसे बड़ा और तीखा सवाल राज्य के खुफिया तंत्र और जेल प्रबंधन पर उठता है।

आखिर एक विचाराधीन कैदी के पास बाहरी दुनिया से संपर्क साधने, वित्तीय लेन-देन तय करने और गवाहों को डराने के लिए संसाधन कहाँ से आ रहे हैं?

क्या जेल के सुरक्षा प्रहरी और अधिकारी इस सिंडिकेट के मूक दर्शक हैं या वे इसमें बराबर के हिस्सेदार हैं?

जब तक जेल प्रशासन की आंतरिक मिलीभगत न हो, तब तक कोई भी कैदी इस स्तर पर गवाहों को प्रभावित करने का साहस नहीं कर सकता। बस्तर जैसे संवेदनशील इलाके में, जहाँ पहले से ही पत्रकार माओवादी उग्रवाद और सुरक्षा बलों के दोहरे दबाव के बीच जी रहे हैं, वहाँ जेल के भीतर से पनपने वाला यह तीसरा मोर्चा पत्रकारों के अस्तित्व के लिए अंतिम कील साबित हो सकता है।इस मामले में सबसे खतरनाक रणनीति गवाहों के चयन की है। चूंकि इस हत्याकांड के अधिकांश मुख्य गवाह खुद स्थानीय पत्रकार हैं, इसलिए उन्हें निशाना बनाकर सिंडिकेट पूरे बस्तर के मीडिया जगत को एक स्पष्ट संदेश दे रहा है: “यदि जेल की दीवारें हमें तुम तक पैसे पहुंचाने से नहीं रोक सकतीं, तो वे हमें तुम तक मौत पहुंचाने से भी नहीं रोक पाएंगी।”

यह मनोवैज्ञानिक आतंक ग्रामीण क्षेत्रों के उन ईमानदार पत्रकारों को तोड़ने के लिए काफी है, जिनके पास न तो कोई सुरक्षा कवच है और न ही बड़े कॉर्पोरेट मीडिया घरानों का वरदहस्त। यदि छत्तीसगढ़ सरकार और न्यायपालिका ने इस ‘जेल-टू-स्ट्रीट’ सिंडिकेट को तुरंत मटियामेट नहीं किया, तो अदालती कार्यवाही महज एक कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएगी। गवाह मुकरेंगे, सबूत मिटेंगे और अंततः जीत उसी सिंडिकेट की होगी जिसने मुकेश चंद्रकार के सीने में गोलियां उतारी थीं। यह समय प्रशासनिक लीपापोती का नहीं, बल्कि जगदलपुर जेल के भीतर बैठे सफेदपोश मददगारों को बेनकाब करने और बस्तर में कानून के इकबाल को दोबारा बहाल करने का है।

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