री-नीट में भी गड़बड़ यानी एनटीए का वही पुराना रवैया – निकम्मेपन का पर्याय हो गया है हालांकि नागपुर में ही सेंटर देने की घोषणा कुछ ही घंटे में हो गई। वायु सेना का कमाल हो सकता है। उसने कम समय में ही बदल दिया। एनटीए का काम है प्रतिभा तलाशना और प्रतिभा से वंचित पूरी तरह तरसता लग रहा है।
संजय कुमार सिंह
आज अखबारों में खबरों का संकट दिख रहा है लेकिन टीएमसी के बागी सांसदों का क्या हुआ, क्या हो सकता है और अभिषेक बनर्जी की मुलाकात लोकसभा अध्यक्ष से हुई या नहीं, क्या स्थिति है, क्या बात हुई है और टीएमसी के खाते बंद करने की मांग या कोशिशों का क्या हुआ – लीड हो सकती थी। खाता बंद हो गया है और दलबदल पर फैसला नहीं हुआ है तो खबर क्या होगी और फैसला नहीं हुआ है लिख दें तो फैसला करने वाला दबाव में आ सकता है। इसलिए लिखें कैसे? समाजवादी पार्टी को तोड़ने की खबरों पर आगे क्या हुआ और शिवसैनिक 50 करोड़ में बिकने को तैयार हैं – सही है या गलत जैसी खबरों से पहला पन्ना भरा हो सकता था लेकिन कुछ खास नहीं है। आज की खबरों के बाद मुझे लगता है कि कल युद्ध विराम की खबर को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया था। कारण समझना मुश्किल नहीं है। और यह भी एक खबर हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में ट्रम्प ने जो कहा वह भी सुर्खियों में रहा पर ट्रम्प अपनी बातों और काम में कितने गंभीर हैं इसका पता सोशल मीडिया पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के एक वीडियो से चला। इसमें उन्होंने कहा है, “न मैं और न ही मेरा देश इटली, कभी किसी के सामने भीख मांगते हैं।” इस वीडियो और संबंधित खबरों से अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने एक इतालवी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में दावा किया था कि हाल ही में हुए जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान मेलोनी उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए बहुत बेताब थीं। उन्होंने यह भी कह दिया कि मेलोनी ने उनसे फोटो की मिन्नतें की थीं और उन्हें (ट्रम्प को) उन पर तरस आ गया था। इस विवाद के बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने अपनी अमेरिका यात्रा रद्द कर दी। जाहिर है, ट्रम्प के कहने का मतलब है और उन्हें कुछ भी कहने नहीं दिया जा सकता है। अबकी बार ट्रम्प सरकार वाले भारत में मामला में थोड़ा अलग है। इसका पता सोशल मीडिया पर चलता है लेकिन अखबारों में वे प्रधानमंत्री के मित्र हैं, सर्वशक्तिमान हैं। हालांकि, यह पता नहीं चलता है कि ऐसा प्रधानमंत्री के कंप्रोमाइज्ड होने और एप्सटीन फाइल में नाम होने की चर्चा के कारण है या वैसे ही।
इसलिए मैं भी अभी उसमें नहीं जा रहा हूं। हालांकि, अनुसंधान का एक मुद्दा है और यूट्यूब वीडियो के पैसे मिलते हों तो कॉक्रोच के लिए कमाई का साधन भी हो सकता है। आज खबर है कि समझौते के बावजूद लेबनान पर इस्राइली हमला हुआ। इस कारण अमेरिका व ईरान की वार्ता टल गई। बाद में युद्ध विराम कराया गया। यह खबर अमर उजाला ने दी है और आज लीड है। नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड तो नहीं है लेकिन टॉप पर चार कॉलम का शीर्षक है, लेबनान पर इजराइली हमले, फिर युद्ध विराम। उपशीर्षक है, स्विटजरलैंड में बातचीत टलने के बाद इजराइल, हिजबुल्ला में बनी सहमति। देशबन्धु में दो कॉलम की खबर का फ्लैग शीर्षक है, ईरान-अमेरिका शांति समझौता खतरे में – इजरायल ने लेबनान पर बरसाए बम, 18 की मौत। बीच में हाईलाइट किया गया है, तेहरान ने बातचीत रोकी। दैनिक भास्कर ने 110 दिन के युद्ध की कहानी बताई है और समझौते से पहले की 7500 मौतों, 162 लाख करोड़ रुपए … तब शांति का बैनर शीर्षक लगाया है। इसके साथ तीन उपशीर्षक हैं। इनमें पहला है, ट्रम्प चारो खाने चित; अमेरिका 4 लक्ष्य लेकर युद्ध में उतरा, सब अधूरे…उल्टा ईरान मजबूत। इसके साथ भास्कर एक्सपर्ट की राय है – नए वर्ल्ड ऑर्डर की शुरुआत; ईरान खाड़ी का बॉस, 28 लाख करोड़ के पैकेज भी लेगा। जाहिर है कि यह पूरी खबर नहीं है और ढेरों सूचनाएं हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि आपका अखबार आपको कैसी खबरें दे रहा है और उसके तेवर कैसे हैं। कल मैंने लिखा था, “ट्रम्प ने ईरान के साथ करार पर दस्तखत कर लिए – आज इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड है”।
आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, “करार मुश्किल में :लेबनान पर इजराइल के हमले के बाद ईरान ने वार्ता टाली”। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यही लीड है, लेबनान में हमलों ने अमेरिका-ईरान वार्ता रोकी। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड, सेकेंड लीड दोनों यह खबर नहीं है। लीड टेलीग्राम पर प्रतिबंध की खबर है और हाईकोर्ट ने कहा है, टेलीग्राम पर प्रतिबंध न्यूनतम है जो सरकार कर सकती थी। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का शीर्षक यही है। सेकेंड लीड सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला है कि पैदल चलना एक बुनियादी अधिकार है, सभी सड़कों पर फुटपाथ जरूरी है। अमेरिका-ईरान समझौते के बाद की खबर जो आज कई अखबारों में लीड है वह टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने के अधपन्ने पर लीड है। दि एशियन एज की लीड के शीर्षक में लेबनान पर हमले का जिक्र छोटे फौन्ट में है। तीन बुलेट प्वाइट में मुख्य खबर के फ्लैग शीर्षक हैं। इनमें दूसरा लेबनान पर इजराइल के हमले का है जबकि इससे पता चलता है कि अमेरिका जिस इजराइल के साथ युद्ध कर रहा था वह उसकी बात नहीं मान रहा है या सहमति का ख्याल रखने की परवाह नहीं कर रहा है। यह अमेरिका की स्थिति है लाखों गंवाने के बाद है। इजराइल भारत का अपेक्षाकृत नया मित्र है और जो कर रहा है तथा ट्रम्प भारत पर हमले की स्थिति में साथ देने का वादा कर रहे हैं – बड़ा मामला है लेकिन खबरों से यह समझ में आएगा इसकी उम्मीद कम है। मुख्य शीर्षक है, स्विस वार्ता खटाई में इसलिए ईरान-अमेरिका शांति वार्ता मुश्किल में। बाकी अखबारों की खबरों से मुझे लगता है कि सही स्थिति यह नहीं है। वैसे भी, खबरों से साफ है कि अमेरिका – ईरान के बीच करार के बाद इजराइल ने लेबनान पर हमला किया। इस लिहाज से दि एशियन एज की प्रस्तुति थोड़ी अलग है। द टेलीग्राफ ने आज भी तृणमूल और उसमें तोड़फोड़ की खबर को प्राथमिकता दी है। अंग्रेजी अखबारों में अकेले द हिन्दू ने अमेरिकी खबर को पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है। यहां पहले पन्ने से पहले का कोई अधपन्ना नहीं है और लीड टेलीग्राम पर प्रतिबंध को जारी रखने का हाईकोर्ट का फैसला है। हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि फुटपाथ पर पैदल चलने का अधिकार बुनियादी अधिकार है।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे सेकेंड लीड बनाया है। फुटपाथ होना जरूरी है, पैदल चलने का अधिकार बुनियादी अधिकारों में है तो भी सुप्रीम कोर्ट को अब कहना पड़ रहा है। इस खबर को प्रमुखता मिली है तो कारण यही है कि अभी भी देशभर में, माफ कीजिएगा देश की राजधानी में या राज्यों की कई राजधानियों में फुटपाथ नहीं है, उनपर कब्जा है। साथ ही, पैदल चलने वालों की मुसीबतों का ख्याल रखने वाला कोई नहीं है। सच्चाई यह है कि सरकार डबल इंजन वाली हो या बिन इंजन वाली -फुटपाथ हैं, होते थे और लोग पैदल चलते रहे हैं। लेकिन ऐसा देश भर में नहीं है। पूरे शहर में नहीं है तो कई मोहल्लों में भी पूरा नहीं है। सत्ता और हुक्मरानों ने यही किया है। डबल इंजन वाले राज्यों में भी नहीं है तो कोई नई बात नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कुत्तों के बारे में भी आदेश दिया था। मुझे तो कोई बदलाव महसूस नहीं हुआ। मुझे तो यकीन नहीं है कि राजेन्द्र नगर के बेसमेंट में फिर पानी नहीं भरेगा और नहीं भरेगा तो कई साल नहीं भरेगा। आज जब सांसदों (जनप्रतिनिधियों) को वापस बुलाने के अधिकार की बात होनी चाहिए थी, उससे संबंधित खबर होनी चाहिए थी तो पैदल चलने और फुटपाथ के अधिकार की बात हो रही है। सरकारी एजेंसियां इतनी निकम्मी हैं कि नागपुर के बच्चे को री-नीट का एडमिट कार्ड अबू धाबी के सेंटर का भेज दिया है। आज सुबह इस खबर ने अखबारों के प्रति उत्सुकता ही खत्म कर दी। बच्चे को खबर तो कल ही मिली होगी लेकिन खबर बनी मीडिया वालों को पता चला तब। मैं गलत हो सकता हूं पर सुबह-सुबह दफ्तर खुलने के समय से पहले छात्र को एडमिट कार्ड मिले, अबू धाबी सेंटर हो और सूचना सोशल मीडिया पर फैल जाए तो अखबार पुराने लगने लगते हैं।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


