सुभाष सिंह सुमन-
भाजपा झूठ की फैक्ट्रियाँ चलाती है। भाजपा का आईटी सेल झूठ फैलाता है, यह तो समझ आता है। उनका काम ही यही है। लेकिन सरकार और स्वायत्त नियामक संस्थाएँ भाजपा आईटी सेल का हिस्सा नहीं हैं। प्रधानमंत्री या बाकी कोई मंत्री पार्टी चलाने के लिए नहीं चुना जाता है। अमृतलाल भाई ने डंका पीटने की होड़ में पार्टी और सरकार के बीच की रेखा ही गायब कर दी है। भाजपा के पितामह अटली जी के शब्द हैं:- पार्टियाँ आती-जाती रहेंगी, यह देश लेकिन रहना चाहिए। आज यदि अटल जी जीवित होते और अपनी यही बात दोहराते, मुझे पूरा विश्वास है आज की भाजपा सरकार और आज के भजपइये उनकी भी मैया-दैया कर देते। टिक्कर सिंह पाकिस्तान एयरड्रॉप भी कर आता अटल जी को।
इथेनॉल वाले मुद्दे पर लौटते हैं। इस मुद्दे पर भी पूरी भाजपा और पूरी सरकार झूठ की खेती करने में जी-जान से लगी है। भाजपा आईटी सेल वाले मालवीय जी इस मुद्दे पर अपनी पूरी धूर्त प्रतिभा सार्वजनिक किये हैं, जिसे सरकार का अनुमोदन प्राप्त है। मालवीय का दावा है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की शुरुआत मनमोहन सिंह के सरकार में हुई। यह दावा शुद्ध झूठ है। पीआईबी पर 04 नवंबर 2021 को एक फैक्टशीट पब्लिश की गयी। शीर्षक:- इथेनॉल ग्रोथ स्टोरी। मालवीय ने इसी फैक्टशीट का सहारा लिया है, लेकिन बड़ी बेशर्मी से उसके शब्दों को बदल दिया है।

फैक्टशीट के पहले पन्ने पर बताया गया है कि पायलट (ट्रायल/एक्सपेरिमेंट) बेसिस पर पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की शुरुआत 2001 में की गयी। लेकिन इसमें कोई खास प्रगति तबतक नहीं आयी, जबतक नीतियों में हालिया बड़े संशोधन नहीं किये गये। मालवीय ने इस दूसरी पंक्ति को बदल दिया और उसमें 2004 जोड़ दिया, क्योंकि 2004 में केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार आ गयी थी। और इस तरह इथेनॉल के पाप का ठिकरा मनमोहन सिंह के माथे मढ़ने का प्रयास हुआ। भजपिल्ले और कमलची इसे लेकर उड़ पड़े। बेचारों से इससे अधिक की अपेक्षा नहीं की जा सकती। भक्ति में सबसे पहले बुद्धि की बलि चढ़ती है। अंधभक्ति में डूबा व्यक्ति सबसे पहले सोचने-समझने-चिंतन करने की शक्ति से वंचित होता है।
उसी फैक्टशीट में हम अब दूसरे पन्ने पर चलते हैं। दूसरे पन्ने पर पहला पॉइंटर है:- EBP was launched in January 2003. मतलब इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का कार्यक्रम) जनवरी 2003 में शुरू हुआ। इसे और अच्छे से समझते हैं। इससे पहले 2001 में जिस शुरुआत की बात है, वो पायलट बेसिस पर शुरू करने की बात है। यानी परीक्षण। फिर जनवरी 2003 में प्रोग्राम पूरी तरह से अमल में आ गया। जनवरी 2003 में किसकी सरकार थी गदहों?
फैक्टशीट को थोड़ा और खंगालते हैं। दूसरे पन्ने पर एक और महत्वपूर्ण बात आती है:- In 2006, the Ministry of Petroleum and Natural Gas directed the Public Sector Oil Marketing Companies (OMCs) to sell 5% EBP in 20 states and 4 UTs. हिन्दी में:- पेट्रोलियम मंत्रालय ने 2006 में सरकारी तेल कंपनियों (इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल) को 20 राज्यों और 4 केंद्रशासित प्रदेशों में 5% इथेनॉल की मिलावट वाला पेट्रोल बेचने के लिए कहा।
अब इसके बाद वाला पॉइंट और मजेदार है:- The programme was implemented only in limited states and UTs till 2019 excluding north-eastern states and the entire state of J&K and Ladakh. मतलब 2019 तक 5% इथेनॉल की मिलावट का कार्यक्रम गिने-चुने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ही लागू हो पाया। उसके आगे डंकापति के गुणगान हैं। गुणगान में दिसंबर 2014 से दिसंबर 2020 तक पूरे 14 मास्टरस्ट्रोक गिनाये गये हैं, जिनकी वजह से पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट बिना किसी ऊपरी सीमा के बढ़ाना संभव हो सका।
मेरी राजनीतिक किताब कमजोर है। अर्थनीतियाँ और आँकड़ों से गुल्ली-डंडा खेल सकता हूँ, लेकिन राजनीति में अटक जाता हूँ। इस कारण मैं याद नहीं कर पा रहा हूँ। राजनीतिक रूप से चैतन्य लोग मदद करें। क्या 2019 में मनमोहन सिंह की सरकार केंद्र में थी? या कहीं ऐसा तो नहीं कि 2019 में भी केंद्र में नेहरू सरकार ही थी? मुझे हल्का-हल्का बस इतना याद आ रहा है कि अमृतलाल की सरकार 2014 में ही बन गयी थी। लेकिन सही से याद नहीं, तो कोई दावा नहीं करूँगा। आपलोग इस पैराग्राफ के प्रश्नों का उत्तर दें और तथ्यों का फैक्टचेक करें।
मैं उसी पर आता हूँ, जो मुझे अच्छे से आता है। मालवीय और समस्त भजपिल्ला जगत का प्रयास इथेनॉल का ठिकरा मनमोहन सिंह के माथे पर फोड़ने का रहा। इसका क्या अर्थ निकाला जाये? क्या भजपिल्ले भी ऐसा मान रहे हैं कि इथेनॉल की बेतहाशा मिलावट गलत है? यदि ऐसा मान रहे हैं, तो यह पहले एककोशिकीय जीव की उत्पत्ति के बाद ब्रह्मांड का सबसे बड़ा इवॉल्यूशन है। अमृतलाल ब्रो होड़ करता है नेहरू से, लेकिन अटल जी या मनमोहन सिंह के भी आस-पास भाई पहुँच नहीं पाता है।
अटल सरकार या मनमोहन सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल की अँधाधुंध मिलावट क्यों नहीं होने दी? इन गदहों से तो बहुत होशियार थे दोनों। कारण समझना भी रॉकेट साइंस नहीं है। इथेनॉल का बेतहाशा उत्पादन भारत जैसे देश के लिए भयंकर है। गाड़ियाँ बर्बाद हो रही हैं, इसे अभी किनारे कर दो। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इथेनॉल मिलाना पूरा गलत नहीं है। सीमित स्तर पर मिलावट हमारे लिए अत्यंत लाभदायक है। लेकिन इथेनॉल के उत्पादन में जैसे ही हम गन्ना, मक्का और चावल जैसे फसलों का बड़े पैमाने पर उपयोग करने लगते हैं, यह पूरा गलत बन जाता है।
भारत जैसे देश में अन्न भंडारण और प्रबंधन की तमाम खामियाँ हैं। उसके चलते अनाजों की बर्बादी होती है। रखे-रखे अनाज सड़ जाते हैं। हम इस सरप्लस से इथेनॉल बना सकते हैं। यही काम अटल सरकार और मनमोहन सरकार कर रही थी। इसके आगे भी हमारे पास संभावनाएँ और संसाधन हैं। पराली से इथेनॉल बना सकते हैं। म्यूनिसिपल वेस्ट यानी शहरों के कचरे से हम इथेनॉल बना सकते हैं। इससे हम पराली जलाने की समस्या हल कर सकते हैं और हर शहरों में खड़े कूड़ों के कृत्रिम पहाड़ हटा सकते हैं। इतने भर से हमें उतना इथेनॉल मिल जायेगा, जितने की हमें वास्तव में जरूरत है। पेट्रोल में 5-10% इथेनॉल की मिलावट ऑलमोस्ट सेफ है। मिलावट इससे जितना बढ़ता है, उतना खराब होते जाता है। इतनी मिलावट भर का इथेनॉल हम सरप्लस अनाजों और पराली-शहरी कूड़े से बना सकते हैं।
लेकिन गन्नाकरी ब्रो ने अलग रास्ता क्यों बनाया? कारण है कि सीधे अनाजों से इथेनॉल बनाने की मशीनें सस्ती हैं। प्रक्रिया तेज और आसान है। इसमें लागत मामूली आती है और मुनाफा कूटकर होता है। पहले से चीनी मिल हो, फिर तो अतिरिक्त लागत नाममात्र की रह जाती है। गन्नाकरी ब्रो के लौंडे शुगरमिल सिंडिकेट के लीडरों में हैं। गन्नाकरी ब्रो ने इथेनॉल उत्पादन में सीधे अनाजों के उपयोग की छूट दे दी। साल- दो साल पहले तक यह प्रतिबंधित था। फिर क्या था! इस मास्टरस्ट्रोक के बाद देश में शुरू हुआ इथेनॉल का नंगानाच।
जिस ई20 यानी 20% इथेनॉल वाले पेट्रोल को पूरे देश में 2030 तक लागू करना था, अमृतलाल सरकार 2025 में ही लागू करके डंका पीटने लगी। अब तो कोई पूरे विश्वास से यह बता ही नहीं सकता है कि अपनी गाड़ी में जो पेट्रोल वह डलवा रहा है, उसमें 20% इथेनॉल है या 25-30-40-50%। सरकारी कागजों पर अभी 20% ब्लेंड ही बिक रहा है। लेकिन लोगों की खराब हो रही गाड़ियाँ जब वर्कशॉप पहुँचती हैं और उनकी टंकी को खाली किया जाता है, उसमें 40-50% इथेनॉल भी निकल आता है। कौन-कहाँ-कब-कैसा खेल कर रहा है, यह एप्सटीन ब्रो के आइलैंड वाले खेल से कम रहस्यमयी नहीं है।
एप्सटीन ब्रो से याद आया। अमृतलाल सरकार में भी शायद कोई तो पेट्रोलियम मंत्री है। नाम मुझे याद नहीं आ रहा। कोई तो है। लेकिन मुझे यह नहीं समझ आ रहा कि जब पेट्रोलियम मंत्रालय भी है और उसमें कोई मंत्री भी है, फिर पेट्रोल और इथेनॉल वाली फाइलों पर गन्नाकरी के साइन कैसे हो रहे हैं? गन्नाकरी ब्रो खुद ही 100% इथेनॉल वाली फाइल पर साइन करने के दावे कर चुका है। यह सवाल इस कारण भी मुझे महत्वपूर्ण लग रहा है कि पीआईबी की फैक्टशीट में इथेनॉल से जुड़े सारे पुराने फैसले पेट्रोलियम मंत्रालय के हवाले से बताये जा रहे हैं।
मतलब अमृतकाल से पहले तक पेट्रोल से जुड़े फैसले पेट्रोल से संबंधित मंत्रालय में ही हो रहे थे। पेट्रोल के फैसले गन्नाकरी के मंत्रालय में होने की परिपाटी नयी है। भजपिल्ले इस बात पर चैन की साँस लें। इसका श्रेय मनमोहन सिंह या नेहरू नहीं ले पायेंगे।
अश्विनी जायसवाल-
सरकार कहती है कि देश का पैसा बचाना है, इसलिए पेट्रोल में एथेनॉल (E20) मिलाकर बेचेंगे। कंपनियां छाती ठोककर गाड़ी पर स्टीकर लगाती हैं कि हमारी गाड़ी ‘E20 रेडी’ है, आंख बंद करके खरीदो।
बिहार के मनीष कश्यप के साथ जो हुआ है, उसने भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और हमारे सिस्टम के सबसे गंदे चेहरे को बेनकाब कर दिया है। 25 से 30 लाख रुपए की Toyota Innova Hycross महज़ 12,000 किलोमीटर में कबाड़ हो गई! और कंपनी ने क्या किया? सीधे हाथ खड़े कर लिए— वारंटी नहीं मिलेगी, 4-5 लाख का बिल भरो!
यह सिर्फ मनीष कश्यप की गाड़ी का इंजन सीज होने की कहानी नहीं है, यह इस देश के करोड़ों मिडिल क्लास परिवारों के ‘भरोसे के कत्ल’ की दास्तान है।
ग्राहक अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई, अपनी जमीन बेचकर या भारी-भरकम लोन लेकर गाड़ी खरीदता है।
और जब सरकार के ही अधिकृत पेट्रोल पंप से तेल डलवाने के बाद गाड़ी का इंजन जंग खाकर सड़ जाता है, तो टोयोटा जैसी बड़ी कंपनी बड़े प्यार से कहती है— आपके तेल में पानी था, एथेनॉल का केमिकल लोचा था, हमारी कोई गलती नहीं है!
अरे टोयोटा वालों! और इस देश के नीति निर्माताओं! एक बात कान खोलकर सुन लीजिए
क्या अब इस देश का आम आदमी गाड़ी चलाने से पहले पेट्रोल पंप पर केमिकल लैब खोलेगा? क्या वो बाल्टी में तेल निकालकर चेक करेगा कि इसमें पानी है या एथेनॉल की मात्रा ज्यादा है? अगर पेट्रोल पंपों पर घटिया और मिलावटी तेल बिक रहा है, तो उस पर नकेल कसने की जिम्मेदारी किसकी है? ग्राहक की या सरकार और प्रशासन की?
आज मनीष कश्यप के पास कैमरे की ताकत है, सोशल मीडिया पर लाखों लोगों का हुजूम है, तो टोयोटा को जवाब देना भारी पड़ रहा है। लेकिन जरा सोचिए उस बेबस आम इंसान का क्या होता होगा, जो अपनी जिंदगी की आखिरी जमापूंजी ऐसी गाड़ियों में लगा देता है और जब कंपनी वारंटी देने से मना करती है, तो वो अंदर से टूट जाता है, डिप्रेशन में चला जाता है!
गाड़ियों पर E20 Compatible का ठप्पा मारना बंद करो साहब, जब तक इस देश के पेट्रोल पंपों पर मिलने वाले तेल की कोई गारंटी न हो। कंपनियों का यह रवैया सीधे-सीधे दिनदहाड़े डकैती है।
आज अगर हम और आप चुप रहे, तो कल किसी और कंपनी की गाड़ी में आपकी और हमारी जेब पर भी ऐसे ही डाका डाला जाएगा।



