चढ़ावा चोरी और गिरफ्तारी के साथ पदाधिकारियों के इस्तीफे की चर्चा की खबर दिल्ली के मेरे सभी अखबारों की लीड है। कोलकाता के द टेलीग्राफ में भी खबर पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है लेकिन ऑपरेशन सिन्दूर में छह सैनिकों के शहीद होने की सूचना सरकार ने 13 महीने बाद दी – यह अपने आप में शर्मनाक है। इस खबर को आज प्राथमिकता नहीं मिली यह दूरा शर्मनाक मामला है। इससे याद आता है कि जनरल एमएम नरवणे की किताब के तथ्य सार्वजनिक न हों इसके लिए लिए सरकार बहादुर ने क्या सब किए।
संजय कुमार सिंह
हमारे यहां इस्तीफे नहीं होते की महान घोषणा गलत साबित हुई यह बड़ी खबर है। इस्तीफा मांगा गया हो या लिया गया हो या स्वतः दिया गया – बेहद महत्वपूर्ण है। सच्चाई यह है कि इसपर भी कोई पारदर्शिता नहीं है। अगर इस्तीफा नहीं हुआ है तो इसकी खबर उड़ाकर सरकार की छवि बचाने की कोशिश चल रही है। सरकार, उसकी पार्टी और उसका अपंजीकृत स्वयंसेवक संगठन तो जो है सो है ही। इससे भी गंभीर बात है कि ऑपरेशन सिन्दूर में छह जवान शहीद हुए थे इसे छिपाकर रखा गया और 13 महीने बाद खुलासा हुआ है। लड़ाकू विमान मार गिराए जाने की भी खबर थी। उसका अभी पता नहीं चला है। यह सब असाधारण खबर है। इस्तीफे नहीं होते और हुए (अपुष्ट खबर है) तो तब जब चढ़ावा चोरी का मामला पक्का हो गया, दबाना संभव नहीं रहा। आज इन दो खबरों में एक धार्मिकता और आस्था से जुड़ा है तो दूसरा देशभक्ति और देश की सेना से। इसमें देश के सेना प्रमुख रहे जनरल एमएम नरवणे की किताब, उसके खुलासे और उसे दबाने रोकने के सरकारी उपायों को याद कीजिए और नोट कीजिए कि अघोषित इमरजेंसी वाली यह ‘सरकार’ 25 जून 1975 की इमरजेंसी के “काले दिनों” की यादों और परिवारों के संघर्षों को सोशल मीडिया पर साझा करने की अपील करती हैं। पद्म विजेताओं ने किताबें लिखी हैं सो अलग। अभी चंदा चोरी पर क्या चल रहा है यह अखबारों में भी स्पष्ट नहीं है और विश्व गुरू इसे (भी) दर्ज करने की बात नहीं ही करेंगे जबकि दोनों महत्वपूर्ण है। आज दो तरह की खबरें एक साथ हैं और यह हेडलाइन मैनेजमेंट और राजनीति भी हो सकती है। अगर आप इन दोनों खबरों में उलझ गए तो तथ्य यह भी है कि एसआईटी की रिपोर्ट, एफआईआर, गिरफ्तारी और फिर न्यायायिक हिरासत में भेजा जाना बताता है कि अपराध तो हुआ है, कार्रवाई जरूरी है। अपराधी यही हों या कोई और – लंबे समय तक होता रहा और संभव है कि जिनकी निगरानी में था उन्हें पता ही नहीं चला हो या उन्हीं की मिलीभगत से हुआ हो। लेकिन आरोपी के छूट जाने का मतलब यह नहीं होगा कि अपराध नहीं हुआ या चोरी का माल बरामद हो जाए तब भी रक्षकों के भक्षक होने का मामला या संदेह खत्म नहीं होगा। आस्था की सीढ़ियों से यहां तक पहुंचे लोगों को इसका जवाब तो देना ही होगा और असामान्य इस्तीफा इससे बचने की कोशिश हो सकती है। इस्तीफा दूसरे खुलासे का महत्व कम करने के लिए भी हो सकता है हालांकि यह भी संभव है कि दोनों योजनाबद्ध हों। यह सब पत्रकारीय अटकल है जो अब रिपोर्टिंग का भाग नहीं होता है और इसीलिए इस्तीफे को ज्यादा महत्व दिया गया है जबकि चढ़ावा चोरी के आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजा जाना उनके ऊपर के लोगों की जवाबदेही का भी मामला है।
आइए अब शीर्षक देख लें। पहल हिन्दी अखबार दैनिक भास्कर – राम मंदिर चढ़ावा चोरी, 79.85 लाख बरामद, सियासत भी तेज। मुख्य शीर्षक – राय मंदिर ट्रस्ट से चंपत… देना पड़ा इस्तीफा, 8 लोग गिरफ्तार। अमर उजाला – चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा तय, आरोपियों से मिले 80 लाख रुपए। उपशीर्षक है – दोनों ट्रस्टी पहले दिन से सवालों के घेरे में…कुछ और नाम सामने आए और (दूसरा) गिरफ्तार आठो आरोपियों को 29 जून तक न्यायिक हिरासत में जेल भेजा। दैनिक भास्कर में जहां ऑपरेशन सिन्दूर में छह सैनिकों के शहीद होने की खबर है वहां अमर उजाला में सेप्टिक टैंक की सफाई करने उतरे तीन मजदूरों की मौत की खबर है। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, चंपत राय व अनिल मिश्रा ने दिया इस्तीफा। उपशीर्षक है, अनियमितताओं के आरोपों के बाद दोनों पदाधिकारियों पर पद छोड़ने का था दबाव। नवोदय टाइम्स का फ्लैग शीर्षक है, अयोध्या चढ़ावा चोरी मामले में 8 गिरफ्तार, 29 तक रिमांड पर। मुख्य शीर्षक है – चंपत राय, अनिल मिश्रा का इस्तीफा। यहां दिलचस्प उपशीर्षक है – विहिप प्रवक्ता को इस्तीफे की जानकारी नहीं है। गौरतलब है कि इस्तीफे की पुष्टि के बिना हिन्दी अखबारों ने इस खबर को लीड बनाया है। द हिन्दू ने तो लिखा है कि विश्व हिन्दू परिषद ने अपने प्रमुख के इस्तीफे का खंडन किया। देशबन्धु और दैनिक भास्कर की यह खबर सूत्रों के हवाले से है। हालांकि देशबन्धु ने लिखा है, इस्तीफा दिया जबकि दैनिक भास्कर ने लिखा है, देना पड़ा इस्तीफा। अमर उजाला का शीर्षक है, इस्तीफा तय। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि जब इस्तीफा घोषित नहीं है तो तय के है और हैर भी तो खबर देने की क्या जल्दी है। यही बताने के लिए ना कि चंदा सुरक्षित है, जिनकी जिम्मेदारी थी उनलोगों ने जवाबदेही स्वीकार कर ली जबकि धर्मेन्द्र प्रधान जैसा मामला हो तो उन्हें संरक्षण मिल रहा है और आस्था का मामला होने के कारण संरक्षक सामने नहीं आना चाहता है और यह संदेश भी नहीं देना चाहता है कि दोषी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है। मुझे लगता है कि यह भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट है जो हिन्दी अखबारों में खासतौर से कामयाब दिख रहा है।
अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, राम मंदिर चढ़ावा : एफआईआर के बाद गिरफ़्तारियां, इस्तीफ़े और भारी मात्रा में कैश बरामद। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में 8 लोग न्यायिक हिरासत में। उपशीर्षक है – चंपत राय के इस्तीफे की चर्चा लेकिन कोई स्पष्टता नहीं है। एक और खबर का शीर्षक है, छिपे हुए कैमरे, सीसीटीवी से आरोपियों को पकड़ने में सहूलियत हुई। इंडियन एक्सप्रेस में लीड का शीर्षक है, राम मंदिर में (चढ़ावा) चोरी : पुलिस ने आठ लोगों को गिरफ्तार किया चोरी के पैसों का एक हिस्सा बरामद किया। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, अयोध्या चढ़ावा मामला : सभी आठ अभियुक्त न्यायिक हिरासत में। उपशीर्षक है – अभियोजन अधिकारी के अनुसार, गिरफ्तार लोगों से लगभग 80 लाख रुपये बरामद किए गए हैं; गिरफ्तार लोगों में राम मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख चंपत राय के करीबी सहयोगी भी शामिल हैं; वीएचपी ने प्रमुख के इस्तीफे की खबरों का खंडन किया है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, अयोध्या मामला : गिरफ्तार आठ लोग 29 तक पुलिस हिरासत में भेजे गए। फ्लैग शीर्षक में तीन बुलेट प्वाइंट हैं 1) विपक्ष ने कहा लीपापोती 2) योगी ने सख्त कार्रवाई की घोषणा की और 3) ट्रस्ट के प्रमुख अधिकारियों के इस्तीफे को लेकर अटकलें। कोलकाता के अखबार द टेलीग्राफ में यह खबर लीड नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर है। अयोध्या की चोरी के मामले में गिरफ्तारियां, इस्तीफे की चर्चा। ऑपरेशन सिन्दूर में छह फौजियों के शहीद होने की खबर यहां चार कॉलम में बॉटम है। टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू में यह सेकेंड लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सिंगल कॉलम की खबर है। कहने की जरूरत नहीं है कि आज यह खबर बुरी तरह पिट गई है। नवोदय टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अमर उजाला में तो नहीं ही है। देश बन्धु में तीन कॉलम में है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



