नवेद शिकोह-
जो धरोहरें आपके पुरखे आपको दे गए हैं उनकी हिफाज़त की जिम्मेदारी आपकी है। वक्त की गर्द से उन्हें बचाना है, सजाना-संवारना और संरक्षित रखना है।
भारत की आजादी की पहली किरण का साक्षी “स्वतंत्र भारत” अखबार भी एक धरोहर है। चार-पांच दशक पहले इस अखबार ने उस वक्त की इकलौती खबरिया मीडिया अखबार से कला-साहित्य का जिस तरह मिलन कराया था वो प्रयोग आज भी जिन्दा है। पत्रकारों, कलमकारों, साहित्यकारों को अपना कर्तव्य निभाते हुए निस्वार्थ भावना से आगे आकर पत्रकारिता का फख्र से सर बुलंद करने वाले ऐसे अखबारों और उनके एतिहासिक यादगार कॉलम्स को जिन्दा करने में योगदान देना चाहिए है।
स्वतंत्र भारत अखबार के तमाम कॉलम एक धरोहर की तरह याद किए जाते है। आजाद भारत के इतिहास में अखबारों के जिक्र में स्वतंत्र भारत के तमाम कॉलम्स के जिक्र का सिलसिला हम व्यंग्य कॉलम- कांव-कांव से शुरु कर रहे हैं।
मीडिया का विस्तृत रूप नई सूरतों में आ रहा हैं और आता-जाता रहेगा। लेकिन प्रिंट मीडिया कभी नहीं खत्म होगा, क्योंकि कागज़ और पक्की स्याही की जोड़ी ने पेशेवर मीडिया को जन्म दिया था। जिस जमीन से पत्रकारिता पैदा हुई वही मीडिया का आधार है। आधार छोड़ कर कोई हुनर, प्रोफेशन या मिशन जीवित नहीं रह सकता।
सैटेलाइट टीवी चैनलों की बाढ़ को डिजिटल मीडिया ने कमज़ोर कर दिया। सोशल मीडिया में तैरती डिजिटल मीडिया उतनी विश्वसनीय, गंभीर और मुकम्मल नहीं जितना भरोसा पाठकों को अखबार पर है।
अखबार के लम्बे सफर में कई पड़ाव आए, वक्त ने नई-नई सूरतों से अखबार को सजाया-संवारा। खबरों की सादगी में पटे समाचार पत्रों को कला और साहित्य ने एक मजबूत और प्रभावशाली नया रंग देने वाला पहला अखबार स्वतंत्र भारत था।
1947 में आज़ाद भारत की पहली किरण के साक्षी “स्वतंत्र भारत” अखबार ने तमाम कॉलम शुरु करने का सफल प्रयोग किया था। उर्मिल कुमार थपलियाल की नौटंकी शैली में नट और नटी की तंजिया गुफ्तगू हो या अशोक कुमार बाजपेयी का व्यंग्य कॉलम “कांव-कांव” हो। सत्तर के दशक में स्वतंत्र भारत के इस तरह के व्यंग्य साहित्य के कॉलम इस कदर पसंद किए गए कि नब्बे के दशक के बाद ऐसे कॉलम्स को हर नवोदित अखबार को अपनाना पड़ा।
करीब पचास बरस पहले स्वतंत्र भारत ने सियासत, हुकूमत और अन्य खबरों की अखबारी सुर्खियों पर एक व्यंग्य कॉलम शुरु किया था। नाम था- “कांव-कांव”, इसे पत्रकार अशोक कुमार बाजपेयी ‘काकभुशुण्डि उवाच) नाम से लिखते थे। ये सिलसिला लम्बे समय तक चलता रहा। अखिलेश मिश्र, घनश्याम पंकज, माधवकांत मिश्र, प्रमोद जोशी, नवीन जोशी और अनूप श्रीवास्तव जैसे संपादकों के दौर में ये कॉलम खूब फलाफूला।
सन 2000 के दशक में कॉरपोरेट जगत ने अपने-अपने अखबारों का प्रकाशन शुरु कर सत्ता को रिझा कर कारोबार बढ़ाने का सिलसिला तेज किया तो स्वतंत्र भारत जैसे अखबार की कमजोर माली हालत मात खा गई। रचनात्मकता के सौंदर्य से सजे इस अखबार की चमक को वक्त की गर्द ने धुंधला कर दिया। ऐसे में स्वतंत्र भारत जैसे अखबार की रचनाधर्मिता को करोड़ों-अरबों की लागत के कॉरपोरेट कल्चर के राष्ट्रीय अखबारों ने कॉपी किया। उर्मिल कुमार थपलियाल और केपी सक्सेना जैसे तमाम स्थापित लेखक कॉरपोरेट के बड़े अखबारों में मोटे पारिश्रमिक पर ऐसे कॉलम लिखने लगे।
नब्बे के दशक में जब टेलीविजन आम हो रहा था तब उस ज़माने के टीवी स्टार शेखर सुमन ने भी स्वतंत्र भारत अखबार के “कांव-कांव” की तर्ज पर एक टीवी शो शुरु किया। जिसका नाम था – “मूवर्स एंड शेखर” ये शो बेहद लोकप्रिय हुआ। लेकिन कम लोग ये जानते हैं कि शेखर सुमन का ये शो अखबारी कॉलम “कांव-कांव” का टीवी वर्जन था।
लगभग तीन दशक बाद शेखर सुमन ने “शेखर टू नाइट” नाम से खबरों की सुर्खियों पर आधारित अपना दूसरा शो शुरु किया है। सियासत और हुकूमत पर तंज़ करने वाला ये शो इंटरनेट मीडिया पर इतना छा गया है कि देश का सबसे बड़ा कपिल शर्मा शो भी पीछे हो गया है। लेकिन कम लोग जानते हैं कि इस तरह के ग्लैमरस शो का मूल आधार स्वतंत्र भारत अखबार का व्यंग्य कॉलम- “कांव-कांव” ही है।



