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वेब-सिनेमा

इंटरनेट फ्रीडम पर सरकार की मनमानी, पत्रकारों और क्रिएटर्स के वीडियो ब्लॉक होने की जुबानी!

Phone screen shows a bright warning triangle; chat bubbles warn 'Your post is unavailable in India' while a shadowy person sits within a blue facial-recognition frame in the background.

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का दिल्ली के जंतर-मंतर पर करीब 36 दिनों तक चला छात्र आंदोलन 26 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद समाप्त हो गया। आंदोलन खत्म होने के कुछ ही घंटों बाद सोशल मीडिया पर आंदोलन से जुड़े वीडियो और पोस्ट ब्लॉक किए जाने के कई मामले सामने आए, जिसके बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया मॉडरेशन और सरकारी निगरानी को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

याकूत अली का इंटरव्यू तीन बार ब्लॉक

पत्रकार याकूत अली ने आंदोलन समाप्त होने के बाद अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर CJP की पूर्व प्रवक्ता विजेता दहिया का इंटरव्यू पोस्ट किया। बातचीत में सोनम वांगचुक को ऑनलाइन ट्रोल किए जाने का मुद्दा उठाया गया था। इंटरव्यू में न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उल्लेख था और न ही उनके खिलाफ कोई अभद्र टिप्पणी की गई थी, लेकिन कुछ ही मिनटों में वीडियो भारत में ब्लॉक कर दिया गया।

न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद याकूत अली ने अपने दूसरे इंस्टाग्राम अकाउंट Notyaqut से वही वीडियो दोबारा पोस्ट किया और उसे मुख्य अकाउंट के साथ कोलैबरेट भी किया, लेकिन यह वीडियो भी भारत में उपलब्ध नहीं रहा। तीसरी बार बिना किसी हैशटैग के वीडियो अपलोड किया गया, जो लगभग सात-आठ घंटे तक दिखाई देता रहा, लेकिन बाद में उसे भी आईटी अधिनियम के तहत भारत में ब्लॉक कर दिया गया।

दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और ऑनलाइन नैरेटिव की जंग

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली पुलिस आंदोलन से जुड़े कथित आपत्तिजनक कंटेंट पर कार्रवाई का दावा कर रही है। पुलिस के अनुसार उसकी सोशल मीडिया टीम विभिन्न प्लेटफॉर्म्स की निगरानी कर रही है और अब तक करीब 450 पोस्ट चिन्हित की जा चुकी हैं, जिनमें कथित तौर पर डीपफेक या एआई से तैयार सामग्री शामिल है।

पूरे आंदोलन के दौरान इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कंटेंट क्रिएटर्स ने भाजपा के खिलाफ मजबूत ऑनलाइन नैरेटिव तैयार किया था। इसके जवाब में सरकार और भाजपा नेताओं ने भी सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ाई। आंदोलन के अंतिम दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं को संबोधित करते हुए सेल्फी-स्टाइल वीडियो जारी किए। इन्हीं में से एक वीडियो को फेसबुक ने कुछ समय के लिए ब्लॉक कर दिया था, जिसे बाद में बहाल करते हुए मेटा ने तकनीकी गड़बड़ी बताया और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार से माफी भी मांगी।

हालांकि प्रधानमंत्री के वीडियो पर हुई चर्चा के बीच कई अन्य पोस्टों पर लगी रोक अपेक्षाकृत चर्चा से बाहर रही।

ज्योति यादव के तीन वीडियो भी ब्लॉक

कंटेंट क्रिएटर ज्योति यादव ने दावा किया कि तीन सप्ताह के भीतर उनके कई वीडियो भारत में ब्लॉक कर दिए गए।

  • 5 जुलाई को एआईएसए (AISA) के सदस्य के साथ भूख हड़ताल पर बातचीत।
  • 23 जुलाई को आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह के साथ पेपर लीक मामले पर इंटरव्यू।
  • 25 जुलाई को भीम आर्मी के सदस्यों के साथ पेपर लीक मुद्दे पर चर्चा।

इन वीडियो में किसान आंदोलन समेत पूर्व आंदोलनों का भी उल्लेख था। एक वीडियो में भीम आर्मी के एक सदस्य ने हिंदुत्व कार्यकर्ता पिंकी चौधरी को “नालायक” कहा था और स्वतंत्रता दिवस पर उनका सामना करने की बात कही थी। ये तीनों वीडियो फिलहाल भारत में उपलब्ध नहीं हैं, हालांकि फेसबुक पर अब भी देखे जा सकते हैं।

ज्योति यादव का कहना है कि वह स्वतंत्र रूप से काम करती हैं और उन्हें लगातार यह डर बना रहता है कि किसी भी समय उनका अकाउंट या पेज भी प्रतिबंधित किया जा सकता है।

न्यूज डिग्गी के वीडियो पर भी रोक

सितंबर 2022 से अपना प्लेटफॉर्म चला रहे गजेंद्र सिंह ने 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान घायल हुए एक प्रदर्शनकारी का वीडियो पोस्ट किया था। अगले ही दिन वह वीडियो भारत में ब्लॉक कर दिया गया। नोटिस में आईटी अधिनियम की धारा 73(3)(b) का हवाला दिया गया।

गजेंद्र सिंह का कहना है कि अभिनेत्री स्वरा भास्कर का लिया गया उनका एक अन्य इंटरव्यू भी भारत में उपलब्ध नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई फर्जी वीडियो नहीं डाला गया है तो फिर ऐसी कार्रवाई क्यों की जा रही है।

राघव त्रिवेदी और मॉलिटिक्स की पोस्ट भी हटाई गई

पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर राघव त्रिवेदी ने गाजियाबाद की एक घटना पर वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने दावा किया कि सत्याम पंडित नामक व्यक्ति ने CJP आंदोलन से लौट रहे लोगों से उनका धर्म पूछकर हमला किया। वीडियो में यह भी सवाल उठाया गया कि छात्रों पर लाठीचार्ज करने वाली पुलिस प्रदर्शनकारियों पर हमला करने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रही।

यह वीडियो मॉलिटिक्स के साथ इंस्टाग्राम कोलैब पोस्ट के रूप में साझा किया गया था। इसे केवल भारत में ब्लॉक नहीं किया गया, बल्कि प्लेटफॉर्म से पूरी तरह हटा दिया गया। हटाने के नोटिस में कहा गया कि पोस्ट में “बच्चों के साथ दुर्व्यवहार दर्शाया गया हो सकता है, भले ही उसे मीम, व्यंग्य, मजाक या आक्रोश व्यक्त करने के उद्देश्य से साझा किया गया हो।”

इसी दौरान मॉलिटिक्स का एक अन्य वीडियो, जिसमें आर्टिकल-19 के नवीन कुमार सरकार समर्थक मीडिया पर चर्चा कर रहे थे, पहले हटाया गया लेकिन बाद में उसे बहाल कर दिया गया।

अभिनव बिष्ट का अकाउंट सस्पेंड

सीजेपी आंदोलन से जुड़े रील्स पोस्ट करने के बाद इंस्टाग्राम पर तेजी से लोकप्रिय हुए अभिनव बिष्ट का अकाउंट भी कुछ समय के लिए सस्पेंड कर दिया गया। उनके फॉलोअर्स कुछ हजार से बढ़कर छह लाख से अधिक हो चुके थे। बाद में अकाउंट बहाल कर दिया गया, लेकिन बिष्ट का कहना है कि उन्हें आज तक यह नहीं बताया गया कि अकाउंट क्यों सस्पेंड किया गया था।

पश्चिम बंगाल में गिरफ्तारी

पश्चिम बंगाल के बारासात में सौमिक चटर्जी नामक व्यक्ति को भाजपा नेता की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर जलाकर उससे सिगरेट सुलगाने का वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था।

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने उठाए सवाल

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) ने कहा कि पूरे भारत में कई यूजर्स शिकायत कर रहे हैं कि दिल्ली छात्र आंदोलन से जुड़े वीडियो और रील्स को इंस्टाग्राम “संवेदनशील सामग्री” के रूप में चिह्नित कर रहा है। इसमें CJP के आधिकारिक अकाउंट और अनीश गावंडे द्वारा साझा की गई स्टोरीज़ भी शामिल हैं।

आईएफएफ के अनुसार कई मामलों में “See Reel” विकल्प भी काम नहीं कर रहा और अनेक कंटेंट क्रिएटर्स अपनी पोस्ट की पहुंच में अचानक भारी गिरावट की शिकायत कर रहे हैं। संस्था का कहना है कि यह स्थिति सामान्य तौर पर “शैडोबैनिंग” कहलाती है।

दिल्ली पुलिस से पारदर्शिता की मांग

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि दिल्ली पुलिस सोशल मीडिया पोस्ट हटवाने के लिए किस कानूनी प्रावधान का उपयोग कर रही है।

पीटीआई के अनुसार दिल्ली पुलिस के एक सूत्र ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान और उसके बाद अपलोड की गई सामग्री की समीक्षा की जा रही है तथा आपत्तिजनक पोस्ट हटाने के लिए नोटिस जारी किए जाएंगे।

आईएफएफ के संस्थापक निदेशक अपार गुप्ता ने मांग की कि दिल्ली पुलिस प्रत्येक नोटिस और उसके कानूनी आधार को सार्वजनिक करे ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बन सके। इस संबंध में न्यूज़लॉन्ड्री ने दिल्ली पुलिस और मेटा दोनों से प्रतिक्रिया मांगी है।

निगरानी पर भी उठे गंभीर सवाल

इसी बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने जंतर-मंतर पर कथित निगरानी व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को व्यापक दिशा-निर्देशों की मांग करने की सलाह दी।

प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस की ‘इक्षणा’ नामक मोबाइल निगरानी वैन की तस्वीरें साझा की थीं। इस वैन में टेलीस्कोपिक मस्तूल पर लगे हाई-रेंज कैमरों के जरिए पूरे प्रदर्शन स्थल का 360 डिग्री वीडियो रिकॉर्ड किया जा सकता था। इसके अलावा ड्रोन कैमरों और मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा भी लगातार रिकॉर्डिंग की जा रही थी।

2,873 लोगों की जांच का दावा

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार द्वारा सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि संसद मार्च के दौरान पुलिस और वाहनों पर हमले के मामलों में 2,873 लोगों की जांच की गई। इनमें 989 लोगों का गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़ा रिकॉर्ड होने का दावा किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक इनकी पहचान फेस रिकग्निशन कैमरों, सीसीटीवी फुटेज और पुलिस व आम लोगों द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो के आधार पर की गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि प्रशासन ने केवल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दी थी, संसद मार्च की नहीं।

पुलिस का दावा है कि जांच में हिंसा के दौरान 101 हत्या के आरोपियों, 284 डकैती और लूट के मामलों के आरोपितों तथा 92 ऐसे लोगों की पहचान हुई, जिनके खिलाफ महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों के मामले दर्ज हैं।

फेस रिकग्निशन तकनीक पर आपत्ति

आईएफएफ ने फेस रिकग्निशन तकनीक के उपयोग को लेकर दिल्ली पुलिस को कानूनी नोटिस भेजा है और सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी भी मांगी है।

संस्था का दावा है कि आरटीआई से मिले जवाब बताते हैं कि दिल्ली पुलिस के पास फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल के लिए कोई स्पष्ट नीति या नियम नहीं हैं। साथ ही इस तकनीक के उपयोग से पहले कोई Privacy Impact Assessment भी नहीं किया गया। आईएफएफ का कहना है कि केवल 80 प्रतिशत समानता मिलने पर भी किसी व्यक्ति की पहचान सकारात्मक मान ली जाती है, जिससे गलत पहचान की आशंका बनी रहती है।

आईएफएफ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में लाइव फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगाने, प्रदर्शनकारियों का बायोमेट्रिक डेटा हटाने और यदि कोई नियम मौजूद हों तो उन्हें सार्वजनिक करने की मांग की है। संस्था ने इस संबंध में चार नए आरटीआई आवेदन भी दाखिल किए हैं, जिनमें ‘इक्षणा’ निगरानी वैन के लिए निजी कंपनी के साथ हुए अनुबंध का ब्योरा भी मांगा गया है।

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