राहुल जी कुत्ता लेकर आए हैं, ताजा रील में। मोदी जी अपने रील में हैंडलूम पर वीडियो बनाने को बोले हैं। उधर मोहन भागवत जेनजी से बड़ी भारी मीटिंग किए हैं और कह दिए हैं जेनजी देशद्रोही नहीं है।
रील युग है भाई। नेतागिरी भी बदल रही है। जेनजी ने सब बदलने का काम शुरू कर दिया है। वरिष्ठ पत्रकार संजीव पालीवाल सही लिखते हैं- “Gen Z सरकारों को जवाबदेह बना कर ही मानेंगे। हमारी पीढ़ी तो कायर निकली। डर गयी। चमचागिरी करती रही। भक्त बन गयी।”
-यशवंत सिंह
पुष्प रंजन-
देश में बुनकरों और कामगारों की संख्या 67 लाख से घटकर लगभग 35 लाख रह गई है।
शुक्रवार 7 अगस्त को “राष्ट्रीय हथकरघा दिवस” है. इसकी पूर्व संध्या पर अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट से पीएम मोदी ने एक खास वीडियो संदेश जारी किया है. मान्यवर ने देश के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम और स्वदेशी आंदोलन की नींव को याद दिलाते हुए भारत के पारंपरिक बुनकर समुदाय को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का आह्वान किया है.
यह सब सुनने में कितना अच्छा लग रहा है. लेकिन, कभी पीएम मोदी ने बनारसी’ बुनाई उद्योग का पुरसेहाल जाना है? और कहीं नहीं तो पीएम मोदी वाराणसी, गोरखपुर (रसूलपुर, पूरणा गोरखनाथ), आज़मगढ़ (मुबारकपुर, इब्राहिमपुर, शाहपुर) और मऊ (घोसी, मधुबन) में जाकर कारीगरों और बुनकरों का हाल देख लें।
मऊ जिले में मुस्लिम महिलाएं ‘ कफन ‘ बुन रही हैं, जो एक ऐसा कपड़ा है जिसका उपयोग केवल हिंदू लोग मृत्यु के बाद के अनुष्ठानों में करते हैं, जो उस समन्वयवादी हिंदू-मुस्लिम संस्कृति को प्रदर्शित करता है जो एक विभाजनकारी शासन द्वारा खतरे में है।
भारत सरकार की पहली हथकरघा जनगणना (1987-88) के मुकाबले चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना (2019-20) तक देश में बुनकरों और कामगारों की संख्या करीब 67 लाख से घटकर लगभग 35 लाख रह गई है। अर्थात, हथकरघा और इससे जुड़े परिवारों तथा कामगारों की संख्या में लगभग 32 लाख की भारी कमी आई है। आगे के पांच वर्षों में कितने हस्तकरघा कारीगर उजड़ गए, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा सरकार ने जारी नहीं किया है.
जेन ज़ी का सवाल सुनिए और वहाँ मौजूद बच्चों का शोर….उसने उनके दिल का सवाल पूछ लिया….भागवत फंस गए….अपने ही सरकार्यवाह अतुल लिमये के बयान को काटना पड़ा….जेन ज़ी को अपना बताना पड़ा।
जेन ज़ी से संवाद भागवत को उल्टा पड़ गया। और ये तब है जब अपना जेन ज़ी, सुरक्षित जेन ज़ी को बुलाया गया था। जंतर मंतर वाला जेन ज़ी बुला लेते भागवत की धज्जियाँ उड़ जातीं।
-मुकेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार


