भाजपा के किस नेता ने इस तरह अपनी जिम्मेदारी निभाई और स्वीकार की है?
आज के अखबारों में देशबन्धु अपवाद है। बाकी में दो खबरें ऐसे छपी हैं जैसे कल का अखबार बनाने वाले सभी लोगों ने पत्रकारिता की पढ़ाई एक ही मास्टर से पढ़ी हो। मुझे लगता है कि खबरों की प्रस्तुति शीर्षक में कुछ अंतर या विविधता होनी चाहिए थी। बहुत सारी सूचनाएं नहीं हैं। कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद झारखंड में अचानक छात्र आंदोलन शुरू हो गया जो भले छात्रों की मांग पर था लेकिन कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन से बिल्कुल अलग था। राहुल गांधी के विरोधी पहले भी कहते रहे कि राहुल गांधी को जंतर मंतर जाना चाहिए पर वे नहीं गए। रांची का आंदोलन बिल्कुल अलग था, राज्य सरकार के खिलाफ था फिर भी राहुल गांधी को जाना चाहिए। और जाने का सीधा मतलब होता अमित शाह से इस्तीफा मांगना कमजोर होना। राहुल गांधी झारखंड नहीं गए लेकिन उसपर लाठी चली. छात्रों पर पुलिसिया (या सत्ता का) गुस्सा निकला और फिर अमित शाह 20 दिनों बाद लोकसभा आने, बिन्दुवार जवाब देने के लिए तैयार हो गए। अखबारों में खबर तो छपी है लेकिन वह सरकार का प्रचार है। देखिए समझिए कैसे। इस हिस्से में सिर्फ अंग्रेजी अखबारों की प्रस्तुति।
1. द टेलीग्राफ
तीनों खबरें छह कॉलम में एक साथ हैं। फ्लैग शीर्षक छह कॉलम का है, चार कॉलम की फोटो है और लीड का शीर्षक दो कॉलम का है। फ्लैग शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता – परीक्षा में फ्रॉड के खिलाफ विधानसभा तक मार्च करने वालों पर वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठी। मुख्य शीर्षक है, 1) झारखंड के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा 2) शाह सदन में जवाब देने के लिए ‘तैयार’ हैं और 3) राहुल ने बल प्रयोग की निन्दा की। तीनों शीर्षक दो कॉलम में हैं। लीड का फौन्ट बड़ा है। बाकी दोनों लगभग बराबर।
2. दि एशियन एज
चार कॉलम की लीड किरेन रिजिजू की दो कॉलम की फोटो के साथ है। मुख्य शीर्षक है, प्रदर्शन पर सरकार लोकसभा में चर्चा के लिए तैयार, (अमित) शाह जवाब देंगे :(किरेन) रिजिजू। फ्लैग शीर्षक है, 1) पर्याप्त नहीं है, गृहमंत्री को जाना चाहिए : राहुल 2) तीन मांगों पर कोई समझौता नहीं हो सकता है : कांग्रेस। इसके नीचे तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, झारखंड के छात्रों ने विधानसभा तक मार्च किया, आंसूं गैस, लाठियों का सामना किया। उपशीर्षक है, 1) जबरदस्ती विधानसभा में घुसने की कोशिश की 2) राहुल गांधी ने पुलिस कार्रवाई की निन्दा की। 3) ईडी ने जांच शुरू की 4) सीआईडी ने जेपीएससी के चेयरपर्सन को गिरफ्तार किया।
3. द हिन्दू
पांच कॉलम की लीड है। शीर्षक है, प्रदर्शनकारियों ने झारखंड विधानसभा तक मार्च किया; झड़प में पांच घायल उपशीर्षक है, जेएसएससीएल – सीजीएल परीक्षा के छात्र और उम्मीदवार परीक्षा रद्द करने और गड़बड़ियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर रांची में धरना दे रहे हैं; पुलिस ने बल प्रयोग से इनकार किया; जेपीएससी के पूर्व चेयरमैन गिरफ्तार; राज्य सरकार के तीन परीक्षाएं रद्द करने पर सहमत होने के (बाद भी,) अगले दिन यह मार्च हुआ। इस मुख्य खबर के साथ सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, राहुल ने पुलिस की कार्रवाई की आलोचना की; भाजपा ने हमले तेज किए। खबर इस प्रकार है, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोमवार को झारखंड में प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई की निंदा की, वहीं भाजपा ने हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार पर हमले तेज कर दिए और कांग्रेस को चुनौती दी कि अगर वह छात्रों की मांगों को लेकर गंभीर है, तो सरकार से अपना समर्थन वापस ले ले। कहने की जरूरत नहीं है कि समर्थन वापस लेना एक चीज है और भाजपा की सरकार बनवा देना बिल्कुल अलग। समर्थन वापस लेने का मतलब भाजपा की सरकार बनवाने में मदद करना और भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाना भी हो तो कांग्रेस ऐसा नहीं करेगी और भाजपा जो करती रही है, दुनिया जानती है फिर भी भाजपा अपनी ऐसी चालों और मांगों को सार्वजनिक करने की हिमाकत करती है क्योंकि लोग इसे समझते नहीं हैं या समझते हैं तो बताते नहीं है या उसका मजाक नहीं बनाते हैं। द हिन्दू की सेकेंड लीड का शीर्षक है, सरकार ने कहा प्रदर्शन पर चर्चा के लिए तैयार। यहां भी किरेन रिजिजू का यह कहा हाईलाइट किया गया है कि सरकार विस्तृत चर्चा के लिए तैयार है। गृहमंत्री बिन्दुवार जवाब देंगे।
04. टाइम्स ऑफ इंडिया
चार कॉलम की लीड का शीर्षक है, पुलिस ने झारखंड विधानसभा मार्च को लाठियों, आंसू गैस से रोका। इसका इंट्रो है, राज्य सीआईडी ने जेपीएससी के पूर्व प्रमुख को गिरफ्तार किया, वार्ता अधर में। सरकारी बयान की खबर सेकेंड लीड है और दो कॉलम में छपी है। इसका शीर्षक है, सरकार ने शाह के बयान की पेशकश की। विपक्ष नहीं माना।
05. हिन्दुस्तान टाइम्स
चार कॉलम की लीड का शीर्षक किरेन रिजिजू के हवाले से है, छात्रों के प्रदर्शन पर अमित शाह सदन में जवाब देंगे। उपशीर्षक है, विपक्ष राम मंदिर मामले पर भी चर्चा चाहता है; सरकार ने राहुल गांधी पर ‘मुद्दे बदलने’ का आरोप लगाया। मुझे लगता है कि पहले भी लगाती रही है क्योंकि वह चाहती है कि उसे मुद्दों पर जवाब देने के लिए 20 दिन का समय दिया जाए या वह जब जो बोले उसी को सुना जाए। वह किसी मांग, सवाल के प्रति जवाबदेह नहीं है। जो भी हो, हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज राहुल गांधी और जेपी नड्डा के बयानों की खास बातें हाईलाइट की है जो इस प्रकार है। इससे आप समझ सकते हैं कि राहुल गांधी क्या चाहते हैं और सरकार कैसे बचने की जुगत में है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है, “हमें [अमित] शाह के किसी भी काल्पनिक बयान में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्हें यह साफ़ करना होगा कि दिल्ली में युवाओं पर गोली चलाने का आदेश किसने दिया… उन्हें कीलों वाली लाठियों से पीटा गया। शाह या तो लापरवाही के दोषी हैं या फिर सीधे तौर पर ज़िम्मेदार हैं और उन्हें इस्तीफ़ा देना चाहिए।” संसदीय कार्यमंत्री की सहायता में लगाए गए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा, “जब गृह मंत्री उनकी मांग मान गए, तो कांग्रेस नेता ने अपना मुद्दा ही बदल दिया… मैं साफ़ तौर पर कहना चाहता हूँ: राहुल गांधी, चर्चा से भागिए मत। हम तैयार हैं। हम सदन के अंदर हर मुद्दे पर चर्चा करने के लिए तैयार हैं।”
06. दि इंडियन एक्सप्रेस
पांच कॉलम की लीड का फ्लैग शीर्षक है, (20 दिन बाद) संसद में गतिरोध खत्म करने की (सरकारी) कोशिश। इसमें कोष्ठक वाले अंश मेरे हैं और कायदे से होने चाहिए थे वरना यह सरकारी पक्ष का प्रचार लग रहा है। मुख्य शीर्षक है, पुलिस कार्रवाई पर शाह बयान देंगे, विपक्ष बाधा न डाले : सरकार। मुझे याद नहीं है कि संसद में गतिरोध खत्म करने के लिए 20 दिन बाद कभी किसी सरकार ने ऐसी शर्त लगाई हो या लगाई हो तो वह लीड के शीर्षक में हो। जो भी हो, पूरा मामला ही अटपटा है और पूर्व तड़ीपार चाणक्य की विशेष राजनीति हो सकती है। हालांकि, अखबार ने राहुल गांधी की मांग को साथ ही स्पष्ट कर दिया है। यह हिन्दुस्तान टाइम्स में दोनों के बयान छापने की तरह है। इस खबर के साथ राष्ट्र या देश पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, उच्च शिक्षा सचिव को बनाए जाने के कुछ ही दिन बाद बदल दिया गया। इन्हें क्यों बनाया गया और क्यों बदला गया – बताना मुश्किल होगा, समझना मुश्किल नहीं है। यहां छात्रों के प्रदर्शन की खबर लीड के नीचे हैं। चार कॉलम की फोटो के साथ चार कॉलम का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता – लाठी, आंसू गैस के गोले और प्रदर्शनकारियों का सागर : झारखंड का गुस्सा विधानसभी पहुंचा।
आप समझ सकते हैं कि 20 दिन बाद आने वाले सरकार के बयान को आज अखबारों ने कितना महत्व दिया गया है। लीड या सेकेंड लीड। इसमें बोफर्स के दो प्रचारकों की लीड एक नहीं है। फिर भी सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स ने राहुल गांधी और जेपी नड्डा के बयानों के अंश को हाईलाइट करके बताया है कि सरकार क्या कोशिश कर रही है और राहुल गांधी उसे खूब समझ रहे हैं तथा मौका देने के लिए तैयार नहीं है जिसे नड्डा राहुल गांधी का भागना कह रहे हैं। 20 दिन तक खुद भागे रहने पर चुप हैं और मीडिया ने इसे रेखांकित नहीं किया है। इन खबरों के आधार पर आराम से कहा जा सकता है कि भ्रष्ट, नालायक और दिशाहीन सरकार जबरन सत्ता पर कब्जा जमाए बैठी है। राहुल गांधी के विरोध और उसे मिल रहे समर्थन से परेशान है और उनकी छवि खराब करने की अपनी कोशिशों से बाज नहीं आ रही है। राहुल गांधी इसे अच्छी तरह समझ रहे हैं। समस्या उनसे है जो सरकार, उसकी रणनीति, राजनीति और कार्यशैली को नहीं समझ रहे हैं या समझ कर भी उसका साथ दे रहे हैं। ऐसे लोग यह जानते हुए साथ दे रहे हैं कि देश बर्बाद हो रहा है और साथ देने का कारण हिन्दुत्व हो सकता है वैसे डर और ब्लैकमेल भी हो तो कोई ताज्जुब नहीं है। कुछ खबरों और सोशल मीडिया पोस्ट से लगता है कि कांग्रेस पर भ्रष्ट होने का भाजपाई आरोप अभी भी चिपका हुआ है। मनमोहन सिंह के बरी होने और बोफर्स मामला खत्म होने के बावजूद। कहने की जरूरत नहीं है कि मामले यही दो नहीं हैं और राहुल गांधी को कमजोर करने के लिए यही आरोप नहीं लगाए गए हैं एपस्टीन मंत्री रखने वाली सरकार के मंत्री देश के पहले प्रधानमंत्री को अय्याश कह रहे हैं और उन्हें संसद में कहने दिया जा रहा है जबकि गाली देने वाले प्रधानमंत्री को गाली नहीं दी जा सकती है और गाली देने वाली बच्ची को माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया। (समाप्त)
पिछले अंक में पढ़ें – आज के अखबार : सरकार को जवाब तैयार करने में बीस दिन लग गए, लेकिन क्यों? इसकी खबर क्यों नहीं है!
लिंक यह रहा –https://www.bhadas4media.com/sarkaar-ko-jawaab-taiyaar-karne-mein-20-din/

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


