विनोद कापड़ी-
आज “PYRE” सिनेमाघरों में रिलीज़ हो रही है।
आज का दिन मेरे लिए सिर्फ़ एक फ़िल्म की रिलीज़ का दिन नहीं है। यह लगभग आठ साल के एक ऐसे सफ़र का पड़ाव है, जिसमें उम्मीदें थीं, सपने थे, संघर्ष था, निराशा थी और कई ऐसे पल भी आए जब लगा कि PYRE के रूप में मैंने अपनी चिता बना ली है ।
जून 2018 में मुनस्यारी में मेरी मुलाक़ात 84 साल के केसर सिंह जी और उनकी पत्नी से हुई थी। उनकी ज़िंदगी, उनका अकेलापन और अपने बेटे का इंतज़ार मुझे भीतर तक छू गया। उसी मुलाक़ात से PYRE की कहानी का जन्म हुआ।
मैंने तय किया कि इस कहानी को फ़िल्म के रूप में दुनिया के सामने लाना है। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। सबसे पहले मैंने कई स्टूडियो और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म से संपर्क किया। लगभग सभी ने यह कहकर मना कर दिया कि आज के दौर में ऐसी फ़िल्म का कोई भविष्य नहीं है, जिसमें गाँव के लोग हों, गैर-पेशेवर कलाकार हों और कहानी भी एक बुज़ुर्ग दंपती की हो।
एक निर्माता तैयार हुए और फ़िल्म की शूटिंग शुरू हुई। लेकिन फ़िल्म पूरी होने से पहले ही उन्होंने बीच में हाथ खींच लिया। उन्होंने अपने लगाए हुए पैसे वापस माँगे। मेरे सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया।
आख़िरकार मैंने अपनी सारी बचत, म्यूचुअल फ़ंड, ज़मीन और यहाँ तक कि अपनी कार भी बेच दी। किसी तरह निर्माता के पैसे लौटाए और फ़िल्म पूरी की।
इस मुश्किल दौर में एक इंसान ने मेरा लगातार साथ दिया। मैं उनका नाम यहाँ नहीं लिख रहा हूँ, लेकिन जीवन भर उसका आभारी रहूँगा।
फ़िल्म पूरी हुई तो एक नई लड़ाई शुरू हो गई। अब सवाल था कि इसे फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स तक कैसे पहुँचाया जाए। एक सेल्स एजेंट ने दुनिया भर के फ़ेस्टिवल्स में फ़िल्म पहुँचाने का भरोसा दिया। लेकिन कुछ महीनों बाद उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। इसके बाद फ़िल्म की पूरी ज़िम्मेदारी मेरे और (Arindra Rai Chaudhuri) अरिंद्र राय चौधरी के कंधों पर आ गई। अरिंद्र ने जब इस फ़िल्म पर पहली बार भरोसा जताया था, तब वो सिर्फ़ 25 साल का था।
और फिर एक दिन ख़बर आई कि हमारी फ़िल्म का चयन दुनिया के प्रतिष्ठित 28th Tallinn Black Nights Film Festival के लिए हो गया है। यह फ़िल्म का वर्ल्ड प्रीमियर था। वहाँ फ़िल्म को Best Film – Audience Award भी मिला।
इसके बाद PYRE दुनिया के लगभग 28 अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में पहुँची और 18 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते, जिनमें 15 Best Film Awards शामिल हैं।
लेकिन इतने अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिलने के बावजूद भारत का कोई स्टूडियो या कोई ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म इस फ़िल्म को हाथ लगाने या इसे रिलीज़ करने के लिए तैयार नहीं था। दुनिया भर के दर्शकों और फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स ने इसे इतना प्यार दिया, लेकिन अपने ही देश में इसे रिलीज़ करने का रास्ता नहीं मिल रहा था।
मैं बहुत हैरान था। दुखी भी। मन में बार-बार एक ही सवाल उठता था कि जिस फ़िल्म को ऑस्कर विजेता संगीतकार माइकल डाना (MYCHAEL DANNA) ने पसंद किया हो, जिस फ़िल्म के लिए गुलज़ार साहब जैसी संवेदनशील और महान शख़्सियत ने बिना किसी आर्थिक लेन-देन की बात किए गीत लिखा हो, जिस फ़िल्म की एडिटिंग में एक और ऑस्कर विजेता जर्मन एडिटर पेट्रीशिया रोमल (PATRICIA ROMMEL) ने बिना कोई पारिश्रमिक लिए सहयोग किया हो, और जिस फ़िल्म को दुनिया भर में इतने सारे पुरस्कार मिले हों, उसे भारत के स्टूडियो और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म क्यों नहीं अपना रहे हैं? आख़िर इस फ़िल्म में ऐसी क्या कमी है?
मेरे लिए PYRE धीरे-धीरे बुझती हुई एक चिता जैसी बनती जा रही थी। PYRE में मुझे अपनी चिता दिख रही थी।
एक समय ऐसा आया जब मुझे लगा कि शायद यह फ़िल्म कभी भारतीय दर्शकों तक नहीं पहुँच पाएगी। मैं भीतर से बहुत टूट चुका था। मानसिक, व्यक्तिगत और आर्थिक रूप से मैंने बहुत कुछ खो दिया था। कुछ नुक़सान ऐसे भी थे, जिन्हें शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
लेकिन अरिंद्र ने हार नहीं मानी। वह लगातार कोशिश करते रहे। उन्हीं की कोशिशों से लंदन में रहने वाले सुरेश जोशी तक हमारी फ़िल्म पहुँची। सुरेश ने फ़िल्म देखी और फिर जो कहा, वह मैं कभी नहीं भूल सकता।
उन्होंने कहा, “अगर मैंने इस फ़िल्म को सपोर्ट नहीं किया तो फिर जीवन का कोई अर्थ नहीं है।” और आज PYRE आपके सामने है।
अगर आज यह फ़िल्म सिनेमाघरों तक पहुँची है, तो इसका सबसे बड़ा श्रेय अरिंद्र और सुरेश जोशी जी को जाता है। मैं दोनों का दिल से आभार व्यक्त करता हूँ। शायद जीवन में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं, जो आपके डूबते हुए विश्वास को फिर से ज़िंदा कर देते हैं।
आज मैं आप सबसे बस एक छोटी-सी गुज़ारिश करना चाहता हूँ। कृपया PYRE देखने जाइए। अपने माता-पिता, परिवार और दोस्तों के साथ जाइए। यह एक बुज़ुर्ग दंपती की कहानी है। उनके प्रेम, अकेलेपन, उम्र और अपने बेटे के लौटने के इंतज़ार की कहानी है। हमारा बहुत सीमित theatrical release है, देश भर में करीब 80 screens का।
यह फ़िल्म किसी बड़े बजट, बड़े सितारे या बड़े प्रचार के सहारे नहीं बनी है। यह हिमालय के उन दो लोगों की कहानी है, जिन्होंने पहली बार कैमरे के सामने अभिनय किया और अपनी ज़िंदगी से इस फ़िल्म को सच बना दिया।
आपका प्यार और आपका साथ ही इस छोटी-सी फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त होगा।
अगर फ़िल्म अच्छी लगे तो इसके बारे में अपने दोस्तों को बताइए, सोशल मीडिया पर साझा कीजिए। छोटी फ़िल्मों को दर्शकों तक पहुँचाने में आपकी भूमिका बहुत बड़ी हो सकती है।
कल तक यह मेरी फ़िल्म थी। आज से यह आपकी है। मेरे आमा और बूबू को अपना प्यार दीजिएगा।
PYRE IN CINEMAS TODAY
30 OCTOBER 2026
दिल से शुक्रिया।
इस शोर के बीच भी
एक सन्नाटा है
मेरा ईश्वर गवाह है
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