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आज के अखबार : वाराणसी, नागपुर में हार पर PM ने कुछ कहा नहीं, जयराम रमेश ने जो कहा वह छपा नहीं

Hindi news article about ballot paper controversy in Maharashtra; photo of a man wearing glasses with a pink subheading box above

संजय कुमार सिंह

आज एक नवंबर की इंडिया गठबंधन की रैली के लिए ‘चलो दिल्ली’ की अपील बड़ी खबरों में एक है। देशबन्धु ने इसे छह कॉलम में लीड बनाया है। शीर्षक है, ‘चलो दिल्ली’ हिन्दुस्तान की आत्मा का मार्च। उपशीर्षक है, विपक्ष के नेता ने कहा, यह किसी एक पार्टी का नहीं, लोकतंत्र बचाने, वोट चोरी रोकने का मार्च है। लीड के साथ की एक खबर का शीर्षक है, ज्ञानेश के खिलाफ जन महाभियोग का कार्यक्रम आज। यह आज की दूसरी बड़ी खबर है। सीईसी के खिलाफ यह विपक्ष का प्रतीकात्मक महाभियोग है। दैनिक भास्कर में इसकी खबर सेकेंड लीड है और शीर्षक में है…. भाजपा ने भी जवाबी रणनीति तैयार की। आज की तीसरी बड़ी खबर, पुरानी दिल्ली के लाहौरी गेट में दिन दहाड़े 2.30 करोड़ की लूट है। यह नवोदय टाइम्स की लीड है।

दि इंडियन एक्सप्रेस की सिंगल कॉलम की खबर, जामिया ने छात्र यूनियन चुनाव कराने की छात्रों की मांग मानी, विरोध प्रदर्शन समाप्त भी महत्वपूर्ण है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर फोटो के साथ तीन कॉलम में है। शीर्षक है, छात्र यूनियन चुनाव के लिए टाइम लाइन पर जेएमआई की सहमति के बाद तनाव खत्म। एक खबर हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड है। इसका शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, एनसीएलटी को मंत्रालय ने पूरी तरह  हाईजैक कर लिया है। लगभग यही लीड टाइम्स ऑफ इंडिया की है। दि इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड एसआईआर की अंतिम तिथि बढ़ाए जाने की खबर है। द हिन्दूतथा कुछ अन्य अखबारों की लीड इन सारी खबरों से अलग है।     

आज सरकारी प्रचार की खबर, डिजिटल ठगी पर सुप्रीम कोर्ट के विचार या सुझाव हैं। हमेशा की तरह प्रस्तुति खबर की तरह है जबकि दैनिक भास्कर ने ‘तैयारी’ लिखा है। मुझे तो यह ऐसा भी नहीं लग रहा है और तैयारी की बात हो तो मताधिकार बहाल करने की भी नजर नहीं आ रही है। जो दिख रहा है वह यही कि सरकार, उसके समर्थक या मीडिया स्वयं – खबरों के जरिए स्थिति को अपने पक्ष में करने में लगी है। दि एशियन एज की सेकेंड लीड का शीर्षक है, हिंसक प्रदर्शन में शामिल लोगों को उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरी नहीं मिलेगी। समाज वादी पार्टी, कांग्रेस ने इस कदम की आलोचना की, भाजपा ने बचाव किया।

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार जो चाहे नियम बनाए अगर वह सत्ता में रहेगी तभी लागू कर पाएगी। देश का पिछला इतिहास गवाह है कि आंदोलनकारियों को सम्मान के साथ देखा जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानियों को तब तक सुविधाएं मिलीं जब तक अंतिम स्वतंत्रता सेनानी जीवित रहे। 1975 की इमरजेंसी और मीसा का विरोध करने वालों को भी पेंशन आदि मिलती है। इसलिए ऐसी धमकियों का कोई मतलब नहीं है फिर भी आज यह खबर प्रमुखता से छपी है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटाले के पीड़ितों के लिए मुआवजे की मांग की है।

खबर के अनुसार, शीर्ष अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई है कि पढ़े-लिखे लोग भी ऐसे घोटालों का शिकार हो रहे हैं। कोर्ट ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ के मामलों में दर्ज एफआईआर का विवरण मांगा है। साथ ही, साइबर धोखाधड़ी को रोकने के लिए आरबीआई द्वारा सुझाए गए निर्देशों पर भी कोर्ट विचार करेगा। अखबार ने भारत के मुख्य न्यायाधीश, सूर्य कांत की फोटो के साथ उनका कहा हाईलाइट किया है जो इस प्रकार है, लोग क्यों नहीं समझते? इन पीड़ितों के साथ आखिर क्या दिक्कत है?… गिरफ्तारी का यह कैसा डर है? क्या वे इतनी सी बुनियादी बात नहीं समझ सकते कि मोबाइल फोन कॉल पर किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता?… बस अपने मोबाइल को दीवार पर दे मारें… हमें बहुत निराशा होती है… हम इस अपराध को क्यों नहीं रोक पा रहे हैं?

मुझे निराशा की बात तो समझ में आती है और यह वाकई निराश होने वाली बात है लेकिन फोन दीवार पर दे मारना समाधान नहीं है। पुरानी खबरों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के एक बुजुर्ग जोड़े से जुड़े ‘डिजिटल अरेस्ट’ मामले में स्वतः संज्ञान लिया था। दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर देशव्यापी साइबर धोखाधड़ी की समग्र जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का आदेश दिया था। कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि सीबीआई को देशव्यापी जांच के लिए सहमति दें। सीबीआई ने आदेश के बाद देश के विभिन्न राज्यों में अंतर-राज्यीय साइबर सिंडिकेट के खिलाफ ‘ऑपरेशन चक्र’ जैसे अभियान चलाए।

जांच में यह सामने आया कि ठगी की रकम को तुरंत कई फर्जी या ‘म्यूल खातों’ में ट्रांसफर किया जाता था। सीबीआई ने इन फर्जी खातों को उपलब्ध कराने वाले स्थानीय सहयोगियों और कुछ बैंक कर्मचारियों की संलिप्तता की जांच शुरू की। मुझे लगता है कि ऐसे मामले में खाताधारक न मिलें तो बैंक के संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। खाता खोलने के नियम ऐसे हैं कि बिना मिली-भगत खाता खुल ही नहीं सकता है। डिजिटल अरेस्ट से वसूली गई धनराशि और अपराधी का पता नहीं चल रहा है तो मामला समझना मुश्किल नहीं है और मोटी समझ भी कहती है कि बड़े सफेदपोश अपराधियों के बिना ऐसी ठगी हो जाए लूट का माल (जो काला धन होगा) उसकी खपत कैसे होगी? आम आदमी के लिए नियम अभी भी कम सख्त नहीं हैं।

खबर के अनुसार, विदेशी सर्वर और सीमा पार के सिंडिकेट के नेटवर्क को तोड़ने के लिए सीबीआई ने इंटरपोल के साथ समन्वय स्थापित कर जांच को आगे बढ़ाया। आज की खबर कल की सुनवाई से संबंधित है। कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि साइबर फ्रॉड रोकने के लिए बैंक और वित्तीय संस्थान कितने जिम्मेदार हैं। आज खबर है कि अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि बैंक की लापरवाही या लचर व्यवस्था के कारण ग्राहक ठगा जाता है, तो क्या बैंक को पीड़ितों को मुआवजा देना चाहिए। आरबीआई द्वारा केवाईसी नियमों और सुरक्षा तंत्र को कड़ा करने के लिए प्रस्तावित नए निर्देशों पर भी कोर्ट ने संज्ञान लिया है, जिन्हें दिसंबर तक लागू किया जाना है।

कहने की जरूरत नहीं है कि लाखों रुपए अगर इतनी आसानी से ठगे जा सकते हैं, विदेश भी जा सकते हैं और ना भेजने वाले को पकड़ा जा सकता ना पाने वाले का पता चलता है तब आम आदमी के साथ छोटे लेन-देन के लिए सख्ती का कोई मतलब नहीं है। फिर भी सरकार की ओर से कोशिश हो रही है और यह खबर उसी सब का प्रचार है। लिहाजा शीर्षक भी ऐसा ही हैं। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है – डिजिटल ठगी बैंक की लापरवाही से तो लौटाना होगा पूरा पैसा। उपशीर्षक है – अपराध रोकने के लिए कोर्ट आरबीआई के प्रस्तावित केवाईसी संशोधन निर्देशों की करेगा समीक्षा।

इस खबर के साथ अटॉर्नी जनरल का यह दावा हाईलाइट किया गया है कि डिजिटल अरेस्ट के मामले 50 फीसदी घटे। खबर के अनुसार, “अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इसका श्रेय कोर्ट के हस्तक्षेप, सरकारी मंत्रालयों एवं विभागों की कार्रवाई और जन जागरूकता अभियानों को जाता है।” वैसे अपराध के मामले अपने तरीके के आधार पर बढ़ेंगे और फिर उनका घटना तय है। लगातार बढ़ते रहना असंभव है या अराजकता की स्थिति में ही होगा। फिर भी सरकार चाहे तो श्रेय ले सकती है।     

मतपत्रों से हुए विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस को बिग फैट जीरो आने की खुशी तो जल्दी ही धुल गई थी, झटका यह लगा कि नागपुर और वाराणसी में भाजपा हार गई। यही नहीं, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के ‘गढ़’- पटना के साथ राजनाथ सिंह के गृहक्षेत्र लखनऊ और अयोध्या के बाद की ‘प्रयोगभूमि’ मथुरा और प्रयागराज में भी भाजपा हार गई है। आप समझ सकते हैं कि ऐसे नतीजों के बाद भाजपा की खुशी कांग्रेस की हार में ही है। प्रधानमंत्री इस पर अपनी खुशी पहले ही जाहिर कर चुके हैं अब जब कई प्रमुख जगहों पर भाजपा हार गई तो प्रधानमंत्री के किसी ट्वीट की खबर नहीं है या उनकी कोई पोस्ट ही नहीं होगी। आप समझ सकते हैं कि इसका कारण क्या होगा। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार, कांग्रेस के कम्युनिकेशन इंचार्ज जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा है,….कांग्रेस की सीटें गिनने से पहले उन्होंने भाजपा की हार का कारण बताया होता और लिखते कि प्रधानमंत्री के वाराणसी की अपने ही संसदीय क्षेत्र की दोनों सीटों पर भाजपा कैसे हार गई। यही नहीं, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि कांग्रेस ने आरएसएस के गढ़ नागपुर की दोनों सीटें कैसे जीत लीं। नागपुर के नतीजे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवन्द्र फडणवीस को एक्स से अपनी पोस्ट हटाने के लिए न सिर्फ शर्मिन्दा किया होगा बल्कि अपमानित भी किया। इसमें उन्होंने कांग्रेस के प्रदर्शन पर तंज कसा था।

देशबन्धु की खबर के अनुसार, शिवसेना (यूबीटी)) के सांसद संजय राउत ने कहा है, महाराष्ट्र में बैलट पेपर से भाजपा चुनाव हार गई। आगे कहा, मोदी के संसदीय क्षेत्र में भी बैलट पेपर से चुनाव हारी भाजपा। यह खबर तीन कॉलम में है। आप जानते हैं कि विधान परिषद के चुनाव में आम लोग वोट नहीं देते हैं और यह लोकसभा तथा विधानसभा के चुनावों की तरह मोहल्ले के मतदान केंद्रों पर नहीं होता है। इसलिए ईवीएम होना या न होना भी अलग मुद्दा है। फिर भी प्रधानमंत्री ने जानबूझकर मुद्दा बनाया और यह पूरी तरह पिट गया। ऐसे में संजय राउत ने जो कहा वह प्रधानमंत्री की कल की खबर का जवाब है। कल जब प्रधानमंत्री की खबर छपी थी तो आज इसे भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए था। पत्रकारिता के नियमों के अनुसार, इसपर कांग्रेस का पक्ष लिया जाना चाहिए था। लेकिन जो हुआ वह आपने देखा।

सोशल मीडिया पर स्मृति ईरानी का कहा घूम रहा है, “आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स Weaponize हुए हैं सरकारों के खिलाफ… हिंदुस्तान की सरकार संविधान की मर्यादा में जवाब देगी। सच्चाई यह है कि बैलेट पेपर वाले ट्वीट से प्रधानमंत्री का जवाब संविधान की मर्यादा में हो या नहीं, प्रधानमंत्री के पद की मर्यादा के अनुकूल नहीं है। इसीलिए संजय राउत से चुनौती मिली है जिसे अखबारों ने महत्व नहीं दिया है। और भले प्रधानमंत्री के सम्मान में नहीं दिया हो, पर प्रधानमंत्री को ऐसी तुच्छता करनी ही नहीं चाहिए और जब उनके किए को महत्व दिया गया तो उसके जवाब को महत्व दिया जाना चाहिए। जाहिर है जवाब प्रधानमंत्री को नहीं किसी और को देना था और वह उपलब्ध है। स्मृति ईरानी सोशल मीडिया का उपयोग सरकार के खिलाफ किए जाने का रोना रो रही हैं लेकिन सरकार जो कर रही है उसकी खबर भी यदा-कदा ही कहीं दिखती है।

दूसरी ओर एक्स पर एक पोस्ट के अनुसार, प्रियंका गांधी का एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें वह बैलेट पेपर से चुनाव की चुनौती दे रही हैं। यह वीडियो हाल ही में 4 राज्यों की 28 विधान परिषद सदस्य की सीटों पर हुए बैलेट पेपर चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद चर्चा में है, जहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। यह एक पुरानी पोस्ट है और 28 अक्तूबर 2026 को शाम 5.21 पर की गई है। तथ्यात्मक रूप से गलत है फिर भी ना हटाई गई ना हटवाई गई और ना भारत में इसका दिखना मेटा ने बंद किया है। मैं 30 अक्तूबर 2026 को दिन में 1.41 बजे इसे सामान्य तौर पर देख पा रहा हूं।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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