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उत्तराखंड

आत्महत्या करने को मजबूर हैं उत्तराखंड के आपदा प्रभावित व्यापारी

देश के कई राज्यों में पिछले कई सालों से किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आत्म हत्याओं का यह सिलसिला थम नहीं रहा है। इसके लिए संबधित राज्यों की सरकारों के साथ केन्द्र सरकार भी जिम्मेदार है। देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा उत्तराखंड में इस तरह के मामले न के बराबर हैं। लेकिन पिछले साल आई प्राकृतिक आपदा के चलते यहां एक नई परेशानी पैदा हो गई है। आपदा प्रभावित इलाकों के व्यापारी आत्महत्या करने लगे हैं। पहले गुप्तकाशी में एक युवा व्यापारी ने मौत को गले लगाया और अब उत्तरकाशी में दूसरे व्यापारी ने सरकार की उपेक्षा के चलते आत्महत्या कर ली। आपदा प्रभावित क्षेत्र में रह रहे प्रभावित अभी पहली घटना के कारणों का अध्ययन कर ही रहे थे कि दूसरी घटना ने राज्य सरकार की प्रभावितों के बारे में की जा रही कोरी बयानबाजी को उजागर कर दिया है।

देश के कई राज्यों में पिछले कई सालों से किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आत्म हत्याओं का यह सिलसिला थम नहीं रहा है। इसके लिए संबधित राज्यों की सरकारों के साथ केन्द्र सरकार भी जिम्मेदार है। देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा उत्तराखंड में इस तरह के मामले न के बराबर हैं। लेकिन पिछले साल आई प्राकृतिक आपदा के चलते यहां एक नई परेशानी पैदा हो गई है। आपदा प्रभावित इलाकों के व्यापारी आत्महत्या करने लगे हैं। पहले गुप्तकाशी में एक युवा व्यापारी ने मौत को गले लगाया और अब उत्तरकाशी में दूसरे व्यापारी ने सरकार की उपेक्षा के चलते आत्महत्या कर ली। आपदा प्रभावित क्षेत्र में रह रहे प्रभावित अभी पहली घटना के कारणों का अध्ययन कर ही रहे थे कि दूसरी घटना ने राज्य सरकार की प्रभावितों के बारे में की जा रही कोरी बयानबाजी को उजागर कर दिया है।

गौरतलब है कि उत्तराखंड में विग वर्ष जून माह के मध्य में भीषण आपदा आई थी जिसमें बड़ी मात्रा में जन धन की हानि हुई थी। देश दुनियां से आये हजारों श्रद्धालु भी इस आपदा के शिकार हुए। इस आपदा में जनपद चमोली, रूद्रप्रयाग व उत्तरकाशी के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। बदरी केदार सहित गंगोत्री व यमुनोत्री घाटी में सैकड़ों व्यवसायिक प्रतिष्ठान व स्थानीय लोगों की संपत्ति या तो पूरी तरह तबाह हो गई या जर्जर स्थित में पहुंच गई। राज्य व केन्द्र सरकार की योजनाओं के तहत स्थानीय लोगों ने बैंकों से लोन लेकर व्यवसायिक प्रतिष्ठान खोले। लेकिन आपदा में सब बह गया। जो बचा उसमें व्यवसायिक गतिविधि चलाई नहीं जा सकती।

आपदा के बाद यात्रियों का अवागमन भी कम हो गया है। इन चार घाटियों में रह रहे अधिकांश लोगों का जिनके परिजन सेना में या अन्यत्र कहीं सेवारत नहीं हैं का प्रत्यक्ष रोजगार पर्यटन पर ही आधारित था। लेकिन आपदा के बाद हालात बेहद नाजुक हो गये हैं। इस पर राहत राशि में की गई घांघलेबाजी से लोगों का धैर्य जबाव देने लगा है। शासन प्रशासन व उनके खुद के चुने हुए जनप्रतिनिधियों से लगाई गई गुहार जब उद्देश्यहीन होने लगी तो व्यापारियों ने मौत को गले लगाना शुरू कर दिया। एक के बाद एक दो व्यापारियों द्वारा की गई आत्महत्याओं ने प्रभावितों के जख्मों को फिर गहरा कर दिया।
 
दो व्यापारियों ने आत्महत्या क्यों की। इसके लिए सरकार अपनी ओर से जांच करवा रही है। जांच तो इससे पहले भी कई कराई गई हैं। क्योंकि इस तरह की जांच से कोई निष्कर्ष नहीं निकलने वाला। दरअसल सरकार द्वारा इस दिशा में की गई पहल धरातल पर दिखाई नहीं दे रही है। आपदा राहत राशि में बंदरबांट का आरोप शुरूआती दिनों से लग रहा है। लेकिन सरकार इस ओर मुंह फेरे रही। एक ही व्यक्ति द्वारा दो दो नामों से पैसा लिये जाना हो या बिना संपत्ति के ही राहत राशि डकारने का मामला, कहीं न कहीं इसमें अधिकारी व सफदेपोशों के गठजोड़ की संलिप्ता अवश्य रही है।
 
अब जब दो व्यापारियों ने इसी मामले को लेकर आत्महत्या की तो सरकार को भी लगने लगा कि लोगों ने जो आरोप लगाये हैं उसमें कहीं न कहीं सच्चाई जरूर है। रूद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि व ऊखीमठ विकासखंड के दर्जनों व्यापारियों को नोटिश जारी कर दिये गये हैं। उत्तरकाशी में भी ऐसा ही होगा। नोटिश जारी होगे के साथ ही उनके आका भी उनको बचाने के लिए आगे आ जायेंगे। कुछ दिन मामला सुर्खियों में रहने के बाद ठंडे बस्ते में चला जायेगा।
इस मामले में आपदा के बाद से ही राज्य सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही है।

बात चाहे आपदा में मारे गये मृतकों की संख्या की रही हो या फिर आपदा के बाद की स्थितियों से निपटने का मसला। सरकार की कोशिश केवल मामले को निपटाने की रही। कुर्सी बचाने की कवायद भी इस दौरान ज्यादा रही। सरकार देहरादून में कम और दिल्ली से ज्यादा चली। आपदा प्रभावितों पर जिस धन का  उपयोग होना उसको देश की मीडिया को विज्ञापन के तौर पर बांट दिया गया। मीडिया प्रबंधन के नाम पर करोड़ों रूपाए पानी की तरह बहाए गए। अगर इस धन को आपदा प्रभावितों में बांट दिया जाता तो शायद व्यापारी आत्महत्या को विवश न होते।
 
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन लोगों ने पहले बिना जांच पड़ताल के राहत राशि की बदरबांट की अब वो ही इस प्रकरण की जांच भी करेंगे। क्या ऐसे में जांच सही निष्कर्ष पर पहुंच पायेगी। जो अधिकारी पहले सफदेपोशों के फरमानों पर राहत राशि बांट रहे थे क्या वो अब उन्ही के करीबियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति करेंगे। ये कई सवाल हैं जिनका जवाब शायद ही सरकार व सरकारी कारिन्दें देना चाहेंगे। न तो घटनाओं के मनोविज्ञान को पढ़ने की आवश्यकता है ओर नहीं किसी तरह की विवेचना की। मामला बिल्कुल साफ है। आपदा में अपनी जीवन भर की पूंजी गंवा चुके लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा है।

असल में राहत राशि के सही मायनों में हकदार थे उनकी सुनी नहीं जा रही है। सत्ता में पहुंच व पकड़ रखने वाले कागजी प्रभावितों के दोनों हाथों में मलाई है। अपनी उपेक्षा व सरकारी तंत्र की विफलता ने पहाड़ के लोगों का भी दिल पिघला दिया है। उनके पास अब कोई चारा नहीं है। यही कारण है कि उनको मौत को गले लगाना सबसे आसान काम लग रहा है। यदि वक्त रहते सरकार इस ओर गंभीर न हुई तो स्थिति विकट हो सकती है।

 

बृजेश सती/ देहरादून
09412032437

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