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भड़ास के लिए चिट्ठी आई है! : दस साल वाले आयोजन में सिविल समाज की तो कोई आवाज ही न थी!

एडिटर

भड़ास4मीडिया

नमस्कार

आज रात मैंने आप के भड़ास के दस वर्ष पूरे होने हुए आयोजन के कई वीडियो का अवकोलन किया. इस समारोह में एक सेमिनार भी था जिसका विषय आप ने रखा ‘मीडिया, लोकतंत्र व नागरिक समाज’. इसमें कुछ वक्ताओं के विचार YouTube पर सुना. निश्चय ही प्रोग्राम बड़ा ही भव्य था. मुझे इसमें भाग न ले पाने का हमेशा दुख रहेगा. रायसाहब, ओम थानवी जैसे लोगों को पास से सुनने-समझने का मौका मिलता क्योंकि प्रभाष जोशी, कुलदीप नैय्यर के जाने के बाद ऐसा लगने लगा है कि हम एक युग के अवसान की तरफ बढ रहे हैं.

गोष्ठी का विषय अत्यन्त ही प्रभावशाली था. शायद वर्तमान समय में इससे महत्वपूर्ण व समीचीन शीर्षक संवाद के लिए नहीं हो सकता है. इस समय एक बहुत बड़े वर्ग को यह लग रहा है कि हमारे लोकतंत्र को सबसे अधिक संकट के दौर से गुजरना पड़ रहा है. इस लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चितिंत हो रहे हैं. यह चिंता पहली बार लोकतंत्र के इतिहास में वहां से आ रही है जहां से पहले कभी नहीं आयी थी अर्थात् मीडिया से. वर्तमान में मीडिया जिस प्रकार से अपनी भूमिका अदा कर रही है, यह चिंता निर्मूल नहीं है. कम से कम आज के दौर में मीडिया को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ तो नहीं ही माना जो सकता है. लोकतंत्र को खड़ा रखने या स्थिर रखने में निश्चय ही मीडिया रूपी स्तम्भ अपनी भूमिका सही रूप से नहीं निभा रहा है.

क्षमा पूर्वक यह कहना चाहूंगी कि एक कमी मुझे पूरे संगोष्ठी में नजर आयी, वह यह थी कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर जो संवाद व विमर्श होना चाहिए था, वह नहीं हुआ. इतने बड़े वक्ताओं के बाद भी संवाद के विषय को उस स्तर पर नहीं ले जाया जा सका जिसकी अपेक्षा सामान्य भाव से ही इन महानभावों से की जा सकती है. पता नहीं, मुझे ऐसा क्यों लगा कि वक्ताओं ने वही बोला जो उन्होंने पहले से सोच रखा था. या यूं कहें कि वह अपना भड़ास निकाल रहे थे जिससे वह मूल विषय से ही विरत होते चले गये. यद्यपि मीडिया पर वर्तमान समय में पड़ने वाले दबाव, मीडिया की अपनी आंतरिक स्वतंत्रता, मीडिया कर्मी की एकता की कमी के दुष्प्रभाव, कारपोरेट घरानों तथा विदेशी पूंजी का बढता दखल, निर्भीकता का अभाव आदि तथ्यों को बहुत अच्छे ढंग से पकड़ने का प्रयास गोष्ठी में किया गया किन्तु इस सारा चिन्तन का दृष्टिकोण एकांगी नजर आता है.

सिविल समाज की ओर से इस विषय को देखने का प्रयास नहीं किया गया. इस समय उपर्युक्त तथ्यों व विषयों से सिविल समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, लोकतन्त्र के मूल शासक अर्थात जनता के अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों, अधिकारों व संस्कृति के विकास में यह चतुर्थ स्तम्भ अपनी क्या भूमिका अदा कर रहा है, इसका उल्लेख नहीं हुआ.

चिंता का विषय यह उतना बड़ा नहीं है कि मीडिया का औजार बना कर कोई सरकार अपने कार्यों व विचारों की छ्द्म वैधता प्राप्त करे या बनाये रखे, जैसा कि फासीवाद या नाजीवाद के युग में किया गया या बहुत से लोगों का यह मानता है कि आज की सरकार ऐसा कर रही है. बल्कि बड़ा खतरा तो यह है कि लोकतन्त्र का यह चतुर्थ स्तम्भ लोकतांत्रिक भावना एवं मूल्य को ही सिविल समाज से दूर तो नहीं कर रहा है क्योंकि यदि ऐसा है तो यह हमारे देश के लोकतांत्रिक विकास के लिए अत्यन्त ही प्रतिकूल है.

विधि का शासन अर्थात रूल्स आफ लॉ लोकतंत्र की छाया है. दोनों को अलग नहीं किया जा सकता है. हमारे समाज में कानून के प्रति आदर का भाव कम हो रहा है. प्रभुत्वशाली वर्ग अपने किए को तोड़-मरोड़ रहा है. यह सब हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था के किए शुभ संकेत नहीं है. इस सन्दर्भ में मीडिया कि भूमिका की भी मीमांसा होनी चाहिए.

वैचारिक सहिष्णुता लोकतंत्र का आधार है. अलग-अलग विचारों के साथ हम संसद से लेकर पंचायत तक ही नहीं बल्कि अपने परिवार में बने रहते हैं. वैचारिक विमर्श के साथ श्रेष्ठ विचार पर पहुंचने का सतत् प्रयास ही लोकतंत्र है, चाहे वह पारिवारिक हो, सामाजिक हो या राजनीतिक. किंतु वर्तमान में वैचारिक असहिष्णुता जिस रूप में बढ रही है वह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं हैं. आज कल हमारे एंकर संवाद के समय जिस प्रकार से स्वयं वैचारिक असहिष्णुता का परिचय देते हैं या इसे बढाने का प्रयास करते हैं, इसे देखते हुए लोकतन्त्र की समृद्धि में इस दृष्टिकोण से भी मीडिया की भूमिका की समीक्षा होनी चाहिए.

संपादक महोदय, पुनः आप बधाई के पात्र हैं क्योंकि आप के प्रयास ने निश्चय ही मानसिक व्याकुलता को जन्म दिया है. बहुत दिनों बाद मैं कोई पत्र लिख रही हूं. यद्यपि लिखना तो बहुत कुछ चाह रही हूं किन्तु मोबाइल पर हिंदी में टाइपिंग करने की क्षमता की मेरी अपनी सीमाएं हैं. फिर भी समृद्ध लोकतंत्र के किए जनमत कैसा होना चाहिए तथा इसके निर्माण में मीडिया की भूमिका क्या हो, वर्तमान में मेरे समझ से सबसे प्रासंगिक व महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर हमें चिंतन करना चाहिए.

डा. मनीषा सिंह

प्राध्यापक

[email protected]


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