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दो पीड़ित पत्रकार भाइयों को एनएचआरसी ने पच्चीस पच्चीस हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया

झारखंड के पूर्वी सिंघभूम के जादूगोड़ा थाना क्षेत्र के रहने वाले दो पत्रकार भाई संतोष अग्रवाल एवं सुशील अग्रवाल को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 25-25 हज़ार रूपये हर्जाना देने का निर्देश झारखंड राज्य के गृहविभाग को दिया है. मानवाधिकार आयोग के इस फैसले ने यह मुहर लगा दिया है किस प्रकार सच को दबाने के लिए पुलिस प्रशासन किसी भी हद तक जा सकता है. इसका ताज़ा उदाहरण यूपी के ईमानदार पत्रकार जगेन्द्र के साथ हुई दर्दनाक वारदात पुलिस प्रशासन की जनविरोधी कार्यशैली की पुष्टि करती है.

झारखंड के पूर्वी सिंघभूम के जादूगोड़ा थाना क्षेत्र के रहने वाले दो पत्रकार भाई संतोष अग्रवाल एवं सुशील अग्रवाल को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 25-25 हज़ार रूपये हर्जाना देने का निर्देश झारखंड राज्य के गृहविभाग को दिया है. मानवाधिकार आयोग के इस फैसले ने यह मुहर लगा दिया है किस प्रकार सच को दबाने के लिए पुलिस प्रशासन किसी भी हद तक जा सकता है. इसका ताज़ा उदाहरण यूपी के ईमानदार पत्रकार जगेन्द्र के साथ हुई दर्दनाक वारदात पुलिस प्रशासन की जनविरोधी कार्यशैली की पुष्टि करती है.

जादूगोड़ा क्षेत्र में कमल सिंह एवं कई दलालों द्वारा एक फर्जी नानबैंकिंग चिटफंड कंपनी चलाया जा रहा था. इस कारोबार में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह से मिला हुआ था. इस फर्जी कंपनी के खिलाफ अखबार में समाचार छापने के कारण 2012-13 में दोनों पत्रकार भाइयों पर 7-7 झूठा मुकदमा दर्ज़ करा दिया गया. इसमें से 5 को वरीय अधिकारियों ने जांच कर असत्य करार दिया. एक मामले मे जांच चल ही रहा था कि जादूगोड़ा के तत्कालीन थानेदार नयन सुख दाड़ेल ने 12-04-2013 में सादे वर्दी में कई लोगों के साथ आकर दोनों भाइयो को बिना वारंट के घर से किसी आतंकवादी की तरह गिरफ्तार कर लिया एवं उन्हें सरेबाज़ार पैदल चलाते बेइज़्ज़त करते हुए थाना ले गए.

वहां से उन्हें कोर्ट भेजने के नाम पर बिना अरेस्ट ऑफ मेमो बनाए दूसरे पुलिस स्टेशन भेज दिया गया और वहाँ पर दोनों भाइयों के साथ सात-सात पुलिस वालों ने मारपीट किया और सादे कागज पर हस्ताक्षर कराने को लेकर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया. इसके बाद दोनों भाइयो को चार दिन अस्पताल में रहना पड़ा. इस मामले में स्थानाीय लोगों ने इसके विरोध में दो दिन बाज़ार भी बंद रखा लेकिन तत्कालीन एसएसपी अखिलेश झा ने इस थानेदार के खिलाफ कोई कारवाई नहीं की.

डीआईजी ने मामले की जांच की.  इसके बाद थानेदार का स्थानांतरण कर दिया गया.  हालांकि कुछ दिनों बाद जानकारी मिली की एसएसपी ने डीआईजी के सामने बहुत हाथ पैर जोड़े जिसके कारण थानेदार को सस्पेंड नहीं किया गया लेकिन डीआईजी ने आदेश दिया कि थानेदार नयन सुख दाड़ेल को एक साल तक कहीं का थानेदार नहीं बनाया जाए. इसी मामले मे मानवाधिकार आयोग से शिकायत की गयी थी. इसके आलोक में सीआईडी जांच में भी थानेदार पूर्वाग्रह से ग्रसित बताया गया और दोषी पाया गया. इसी मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने झारखंड सरकार को दोनों पीड़ित भाइयों को 25-25 हज़ार रुपया हर्जाना देने का निर्देश दिया है.

दोनों पत्रकार भाई जिस कमल सिंह के राजकॉम नान बैंकिंग चिटफंड कंपनी के बारे मे लिखते थे वो कंपनी सितंबर 2013 में ही लोगों का करीब 1500 करोड़ रुपये लेकर भाग खड़ी हुई। दोनों पत्रकार भाइयों ने बताया की उन्हें प्रताड़ित करने वाले पुलिस अधिकारियों को जेल भेजा जाए एवं नौकरी से बाहर कर दिया जाए, तभी उन्हें न्याय मिलेगा, क्योंकि पुलिस अधिकारी रहते हुए ये अधिकारी न जाने कितने निर्दोषों के साथ अन्याय कर रहे होंगे. एनएचआरसी का डिटेल्स देखने के लिए वेबसाइट मे जाकर केस नंबर 785/34/6/2013 एंटर करें.

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