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धन्यवाद अमर उजाला, आपने लखपत के दुनिया छोड़ देने के बाद उसे पत्रकार तो माना

रुदप्रयाग में अमर उजाला के युवा पत्रकार लखपत की 11 अप्रैल को हार्टअटैक से असमय मृत्यु हो गई। मौत की खबर में अमर उजाला ने लखपत को पत्रकार तो लिखा लेकिन अपना पत्रकार नहीं बताया। मौत के बाद पत्रकार से संस्थान के पल्ला झाड़ने और उनके परिवार की पीड़ा को श्रीनगर की वरिष्ठ पत्रकार श्रीमती गंगा असनोड़ा (Ganga Asnora) ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है। उनका पूरा लेख आप नीचे देख सकते हैं। उनकी फेसबुक वॉल से साभार।

रुदप्रयाग में अमर उजाला के युवा पत्रकार लखपत की 11 अप्रैल को हार्टअटैक से असमय मृत्यु हो गई। मौत की खबर में अमर उजाला ने लखपत को पत्रकार तो लिखा लेकिन अपना पत्रकार नहीं बताया। मौत के बाद पत्रकार से संस्थान के पल्ला झाड़ने और उनके परिवार की पीड़ा को श्रीनगर की वरिष्ठ पत्रकार श्रीमती गंगा असनोड़ा (Ganga Asnora) ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है। उनका पूरा लेख आप नीचे देख सकते हैं। उनकी फेसबुक वॉल से साभार।

धन्यवाद अमर उजाला, आपने लखपत के दुनिया छोड़ देने के बाद उसे पत्रकार तो माना

एक प्रतिष्ठित अखबार का सच क्या है, आज इसे हर व्यक्ति जान रहा है, जबकि पत्रकारिता की नैतिकता सरेआम बाजार में दांव लग रही हो। इसके बावजूद लिखने से खुद को नहीं रोक पा रही हूं। हमारे बीच से हमारा एक अजीज साथी लखपत ‘लक्की’ असमय विदा हो गया है। गमजद़ा साथियों को उसके चले जाने के दुख के साथ घर-परिवार के हालातों की भी चिंता है। लखपत की 22 वर्षीय पत्नी का क्या होगा। इकलौते पुत्र से आस लगाए माता-पिता का क्या होगा? इन सारी चिंताओं के बीच अमर उजाला का आभार कि संस्थान ने उसके चले जाने के बाद प्रकाशित खबर में लखपत को भले ही अमर उजाला से जुड़ा हुआ पत्रकार नहीं बताया, लेकिन कम से कम पत्रकार तो लिखा।

दरअसल नौ साल के पत्रकारिता जीवन में स्व. लखपत बीते छह वर्षों से अमर उजाला में कार्यरत थे। हालांकि अपने स्ट्रिंगर्स से पत्रकार न होने का जो प्रमाण संस्थान लेता रहा, वह इस पत्रकार से भी लिया गया जिसमें अनिच्छा के साथ यह स्वीकार करना होता था कि मैं शौकिया पत्रकार हूं। रोजी-रोटी से मेरी पत्रकारिता का कोई लेना-देना नहीं है। रोजी-रोटी के लिए तो मैं अन्य कार्य करता हूं। मजीठिया के दबाव में अपने कर्मियों को लाभों से वंचित रखना पड़े, इसके लिए संस्थान ने जो ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया, उसमें एक नया नायाब नुस्खा निकाला और करीब एक वर्ष पहले वे इन स्ट्रिंगरों को शौकिया पत्रकार की पद से भी मुक्त कर चुके हैं।

विज्ञापनों की भूख ने उन्हें इतना छोटा कर दिया कि वर्षों से काम कर रहे शौकिया पत्रकार ‘एजेंसी’ बन गए। मार्केटिंग के लिए काम करने वाली एजेंसी। लखपत को भी संस्थान ने यही औहदा दिया था। बेहद न्यून वेतन पर कई वर्षों तक काम करके जिस लखपत के दुनियां छोड़कर चले जाने के बाद अखबार मानता है कि उसने आपदा तथा कई अन्य मामलों में बेहतरीन रिपोर्टिंग की, उसे अपने संस्थान से जुड़ा पत्रकार नहीं बताता। लखपत के साथी उसके संस्थान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं कि क्या इस परिवार की मदद के लिए संस्थान कुछ करेगा? जो बेमानी है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने लखपत की मृत्यु पर शोक जताया है, क्या वे इस परिवार की मदद के लिए व्यक्तिगत रूप से आगे आएंगे। कई ऐसे परिवार रहे होंगे, जिन्हें लखपत की लेखनी ने आबाद किया होगा, क्या लखपत के चले जाने के बाद उसकी पत्नी की नौकरी लगे, इसके लिए ईमानदार कोशिशें होंगी? नेताओं या अखबार मालिकों की ओर देखने से काम नहीं चलेगा, लखपत तुम्हारी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता, लेकिन लखपत के परिवार को जिस तरह की मदद की जरूरत है, उसे हम सब लोग ही सामने आकर पूरा कर सकते हैं। इसलिए प्लीज आइये….।

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2 Comments

2 Comments

  1. RAJ

    April 13, 2016 at 5:20 pm

    किसी को लखपत की पत्नी का एकउंट नंबर पता हो तो बताने की कृपा करे। ताकि जो लोग मदद करना चाहते हैं वे रकम जमा करा सकें।

  2. Bijay singh

    April 15, 2016 at 6:34 am

    We are with you..

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