दैनिक जागरण और अमर उजाला ने अटलजी की मौत पर भी कारोबार कर लिया!

अगर नीचता और बेशर्मी की पराकाष्ठा देखनी है तो खुद को ब्रह्मांड का नंम्बर एक अखबार कहने वाले दैनिक जागरण का अटल जी की मौत के अगले दिन का अंक और “जोश सच का” यानी अमर उजाला का भी अटजी के मौत के अगले दिन का अंक उठा कर देखिये. हिंदी के दोनों प्रमुख अख़बारों ने नीचता की लकीर को छूते हुये “अटलजी की मौत” पर भी करोबार किया. Continue reading

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अमर उजाला पढ़ना, ”मेरे लिए ‘टॉरपिडो’ की तरह है”

Sanjaya Kumar Singh : अमर उजाला पढ़ना, ”मेरे लिए ‘टॉरपिडो’ की तरह है”. अमर उजाला हिन्दी के अच्छे, बड़े और पुराने अखबारों में है। आज शर्मिष्ठा (और राष्ट्रपति प्रणब) मुखर्जी की खबर दिलचस्प है। देख रहा था कि हिन्दी के अखबारों में कहां कैसे छपी है तो पता चला अमर उजाला में भी छपी है। Continue reading

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मीडिया अवॉर्ड में ‘अमर उजाला काव्य’ ने हासिल किए दो सम्मान

हिंदी के प्रतिष्ठित समाचार समूह अमर उजाला की वेबसाइट काव्य ने इनमा ग्लोबल मीडिया अवार्ड में दो कैटेगरी के तहत कांस्य पदक हासिल किया है। अमेरिका के वाशिंगटन स्थित अमेरिकन थिएटर मीड सेंटर में 4 जून को इनमा ग्लोबल मीडिया अवॉर्ड समारोह का शानदार आयोजन किया गया। Continue reading

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अमर उजाला के संपादक के खिलाफ बुलंदशहर में एफआईआर दर्ज

बुलंदशहर नगर कोतवाली में अमर उजाला के संपादक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। सिंचाई विभाग के अवर अभियंता की तहरीर पर जिला प्रशासन की तरफ से यह एफआईआर दर्ज कराई गई। संपादक के खिलाफ आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने पर यह एफआईआर दर्ज कराई गई है।

संपादक के खिलाफ एफआईआर दर्ज होते ही बुलंदशहर के ब्यूरो चीफ आशीष कुमार के पसीने छूट गए है। ब्यूरो चीफ ने डीएम और एसएसपी से काफी अनुरोध किया कि संपादक के खिलाफ एफआईआर दर्ज न हो, लेकिन ब्यूरो चीफ की एक नहीं चली। बताया जा रहा है कि एफआईआर दर्ज होने से अमर उजाला के संपादक डॉ इंदु शेखर पंचोली बुलंदशहर के ब्यूरो चीफ से काफी नाराज हैं। देखें एफआईआर की कापी…

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अखंड गहमरी ने अमर उजाला के स्थानीय संवाददाता से दुखी होकर प्रधान संपादक को भेजा लीगल नोटिस

हमारे गहमर में एक समाचार पत्र है अमर उजाला जिसके स्‍थानीय संवाददाता को कार्यक्रम में बुलाने के लिए जो मानक है वह मानक मैं पूरा नहीं कर पाता। इस लिए वह न तो हमारे कार्यक्रम की अग्रिम सूचना छापते हैं और न तो दो दिनो तक कार्यक्रम के समाचार। तीसरे दिन न जाने उनको क्‍या मिल जाता है जो आनन फानन में मुझसे बात कर न करके अन्‍य लोगो से व्‍यक्ति विशेष के बारे में सूचना मॉंगते है और मनगढ़त खबर बना कर प्रकाशित कर देते है।

अब इस मनगढ़त समाचार पर अमर उजाला समाचार पत्र के संवाददाता, ब्‍यूरो और संपादक के खिलाफ मानहानि और पेड-न्‍यूज का मुकदमा तो बनता ही है। हमारे संवाददाता महोदय ने पूरे के पूरे कार्यक्रम को बदल दिया… देखें कैसे…

(1) कार्यक्रम गहमर के आशीर्वाद पैलसे में किया गया परन्‍तु श्रीमान जी उसका नाम भूल गये एक जगह तो उन्‍होेनें लिखा ” एक” पैलसे और दूसरी जगह चित्र के नीचे लिख दिया ” गहमर पैलेस”। कम से कम बैनर तो देख लिया होता।

(2) उन्‍होंनेे बड़ी आसानी से मेरे मेहनत पर पानी फेरते हुए कवि सम्‍मेलन को काव्‍य-गोष्‍ठी बना दिया, अब जब श्रीमान जी को काव्‍य सम्‍मेलन या काव्‍य गोष्‍ठी में फर्क नहीं मालूम है तो किसी से पूछ लेना चाहिए था।

(3) उनके अनुसार कार्यक्रम में जो सम्‍मान दिये गये थे वो काव्‍य गोष्‍ठी के बाद तय किये गये थे, जब कि श्रीमान को यह पता नहीं कि मेरे सारे सम्‍मान 9 अगस्‍त 2017 को ही तय किये जा चुके थे, जिसकी सूचना सोशलमीडिया से लेकर समाचार पत्रों को प्रेस नोट के द्वारा दे दिया गया था।

(4) श्रीमान जी को आये हुए अतिथियों के नाम नहीं मिले और जो सम्‍मान न आने के कारण मंच से निरस्‍त कर दिये गये वही नाम उन्‍होनें प्रकाशित कर दिया। जिन्‍हेें सम्‍मान मिला ही नहीं, जो सम्‍मान पाये उनका नाम हवा में।

(5) श्रीमान जी ने रविता पाठक, सुलक्षणा अहलावत, बीना श्रीवास्‍तव, डा0 चेतना उपाध्‍याय, कमला पति गौतम, डा0 ज्‍योति मिश्रा को अलग अलग सम्‍मान दिया जाना लिखा है जबकि इन सभी को साहित्‍य सरोज शिक्षा प्रेरक सम्‍मान दिया गया। यहॉं तक की आरती का सम्‍मान न आने के कारण दिया ही नहीं गया।

(6) भाई साहब ने फोटो में भी लिखा है कि बीना श्रीवास्‍तव को सम्‍मानित करते साहित्‍यकार जबकि फोटो में साफ दिख रहा है कि बीना श्रीवास्‍तव जी को मुख्‍य अतिथि कमल टावरी जी सम्‍मानित कर रहे हैं।

(7) पूरे समाचार में आप कही भी इस कार्यक्रम को आयोजित करने वाली संस्‍था या आयोजक का नाम और साथ में यह कार्यक्रम कब हुआ उसका पता नहीं।

(8) जो सम्‍मान दिया जा रहा है वह शिक्षक दिवस के अवसर पर दिया गया 5 सितम्‍बर को और जो समाचार की हेडिंग बनी है वह है चार सितम्‍बर की।

(9) 4 सितम्‍बर को आयोजित ” आखिर क्‍यो कटघडे में मीडिया” परिचर्चा के अन्‍य वक्‍ताओं, सभा अध्‍यक्ष, मुख्‍यअतिथि सबके नाम गायब।

और भी बहुत कुछ है जिसकी चर्चा मैंने अपने कोर्ट नोटिस में किया है।

भाई, आपको मुझसे एलर्जी थी तो आप मत छापते मेरा समाचार. मैं आपके चरण तो पखार नहीं रहा था. और न ही आपको किसी डाक्‍टर ने मेरा समाचार छापने को कहा था। और यदि किसी मजबूरी या लालच के आधार पर छाप भी दिया तो सही सही छापना था। क्‍यों गलत सही छाप कर मेरे कार्यक्रम की तौहीन कर दिये। आपको किसने हक दिया था इसका।
अब आप सब खुद समझदार हैं। मैं अधिक बोलूगॉं तो आप सब यही कहेंगे कि मैं बेफजूल की बात कर रहा हूँ।

चलिये मैंने वीडियो रिकार्डिग और फोटो के आधार पर कोर्ट की नोटिस तो दिनांक 08 सितम्‍बर 2017 को प्रधान संपादक के नाम भेज कर कापी टू संपादक, ब्‍यूरो, कर दिया है। आगे देखते हैं क्‍या हेाता है। कुछ हो न हो पर मन को तसल्‍ली तो मिलेगी कि मैंने आवाज उठाई।

अखंड गहमरी

गहमर

गाजीपुर (उत्तर प्रदेश)

akhandgahmari@gmail.com

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अमर उजाला अखबार में छप गई दैनिक जागरण के रिपोर्टर से बातचीत वाली खबर!

अमर उजाला अखबार में गुरुग्राम डेटलाइन से छपी एक खबर में रिपोर्टर लिखता है- ”यह जानकारी प्रदेश के पुलिस महानिदेश बीएस संधू ने दैनिक जागरण से बातचीत में दी.” इस लाइन के छपने से हंगामा मच गया है. लोग कह रहे हैं कि अमर उजाला वालों ने दैनिक जागरण की खबर नेट से चुराई और उसे बिना पढ़े बिना एडिट किए ही अखबार में चेंप दिया. फिलहाल अमर उजाला अखबार में दैनिक जागरण से बातचीत वाली खबर की न्यूज कटिंग ह्वाट्सअप और सोशल मीडिया पर जोरशोर से घूम रही है.

इसके पहले अमर उजाला वालों ने दिल्‍ली के बहुचर्चित बीएमडब्‍लू कांड में दोषी उत्‍सव भसीन पर शनिवार को आए फैसले की ख़बर में भसीन की जगह एक युवा फिल्‍म निर्माता संदीप कपूर की फोटो लगा दी. संदीप कपूर ‘अनारकली ऑफ आरा’ फिल्‍म के निर्माता हैं. अमर उजाला में भसीन की जगह अपनी हंसती हुई तस्‍वीर देखकर संदीप ने फेसबुक पर लिखा- ”When the research of journalists begins and ends with Google and they take Google as Gospel Truth, such blunders happen. My picture has been used by this paper without checking and re-checking. Such journalists bring disrepute to the entire community.”

कुल मिलाकर इन दिनों अमर उजाला कंटेंट के मोर्चे पर निचले स्तर पर गिर चुका है. इस अखबार की एक जमाने में साख हुआ करती थी लेकिन जबसे यह अखबार ब्रांडिंग, सरकुलेशन और मार्केटिंग वाले लोग चलाने लगे, तबसे इसका दम निकलने लगा है. शीर्ष स्तर पर न कोई देखने वाला है और न कोई दुरुस्त करने वाला. सब अपनी नौकरी बचाने और सेलरी लेने में लगे हैं.

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अमर उजाला में संपादक लेवल पर फेरबदल : दिनेश जुयाल होंगे रिटायर… विनीत सक्सेना, रवींद्र श्रीवास्तव और राकेश भट्ट को नई जिम्मेदारियां

दिनेश जुयाल

अमर उजाला में कई बदलाव हुए हैं. बरेली के संपादक दिनेश जुयाल कल यानि 30 जून को रिटायर हो जाएंगे. उनकी जगह नया संपादक विनीत सक्सेना को बनाया गया है. विनीत अभी तक अमर उजाला मुरादाबाद के संपादक हुआ करते थे. मुरादाबाद का प्रभार रवींद्र श्रीवास्तव को दिया जा रहा है जो जम्मू के संपादक थे. जम्मू में संपादक पद पर राकेश भट्ट आसीन होंगे जो अभी तक अमर उजाला दिल्ली मेट्रो के संपादक हुआ करते थे.

दिनेश जुयाल Dinesh Juyal ने अपने रिटायरमेंट को लेकर फेसबुक पर एक पोस्ट साझा किया है, जो इस प्रकार है-

सभी आदरणीय और प्रिय मित्र तीन दिन बाद मैं नौकरी के हिसाब से बूढा हो जाऊंगा। यानी सेवानिवृत्ति का वक़्त आ गया। यूँ अभी मैं निवृत्त होने वाला नहीं लेकिन अमरउजाला से जुडी मेरी पहचान नहीं होगी। अमरउजाला का नंबर 8392922167 मेरे पास नहीं रहेगा इसलिए नया नंबर ले लिया है 7900333033
अब इसी पर संपर्क होगा।
जय हो.

दिनेश जुयाल अमर उजाला की स्वच्छ और ईमानदार पत्रकारिता के प्रतीक पुरुषों में से एक हैं. जाने माने कवि और अमर उजाला के पूर्व निदेशक स्व. वीरेन डंगवाल के बेहद करीबी रहे दिनेश जुयाल ने अपने कार्यकाल में अमर उजाला की कई यूनिटों का प्रभार संभाला और हर एक जगह अपने सरल व्यवहार और पत्रकारीय नैतिकता-शुचिता की छाप छोड़ी. माना जा रहा था अमर उजाला प्रबंधन उनके अदभुत योगदान और ईमानदार व्यक्तित्व को देखते हुए सेवा विस्तार देगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दिनेश जुयाल के करीबी लोगों ने बताया कि श्री जुयाल अमर उजाला से रिटायर भले हो रहे हैं लेकिन वे सक्रिय पत्रकारिता में बरकरार रहेंगे और अपनी नई पारी नए फार्मेट में जल्द शुरू करेंगे.

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सात दशकों की ‘निर्भीक पत्रकारिता’ वाले अमर उजाला को अब डर लगता है!

एक खलनायक संत से ब्रेकिंग न्यूज़ में 7 दशकों की ‘निर्भीक पत्रकारिता’ वाले अमर उजाला को डर लगता है… कहते हैं मीडिया ना सच दिखाता है ना झूठ दिखाता है.. वो जो हो, वो ही दिखाता है. पर आज स्थिति बहुत ही भयावह है। जो कुछ मुझे लगा और मैने देखा, शायद आपने भी वही देखा हो. रामपाल पर आरोप लगे. बरवाला आश्रम में हुडदंग को हमने देखा. आपने भी. पर क्या आपने देखा की अगले ही दिन लगातार बिना रुके न्यूज़ आती रही.

रामपाल के आश्रम से बहुत कुछ मिला जिसकी पुष्टि हुई. पिछले सात दशकों से निर्भीक जर्नलिज्म के नाम से बुलंद आवाज़ अमर उजाला एक अधर्मी संत से डर गया. ये संत वही है जिन्होंने हरियाणा सरकार से लेकर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट को चुनौती दी थी. इनका नाम है संत रामपाल. हालांकि संत को लेकर जो परिभाषा है, रामपाल उसमें कहीं भी फिट नहीं बैठते. हरियाणा में इन्हें लेकर आज से कुछ साल पहले यानी अगस्त 2014 में जो नाटक हुआ वो देश ही नहीं बल्कि दुनिया देख चुकी है.

इस हरियाणा संत के आचरण के बिलकुल खिलाफ इनके ढंग देख कर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में इन पर देशद्रोह का मुकद्दमा चल रहा है. संत का चोला लेकर रामपाल भले जेल में हों लेकिन उनके कथित गुंडे अब उस मीडिया पर हमला कर रहे हैं जिस मीडिया ने उनके अधर्मी संत को बेनकाब किया. उसी मीडिया ने जी न्यूज़ में काम कर रहे एक पत्रकार को खो दिया. अब एक बार फिर रामपाल के इन अंधभक्तों ने देश के नामी मीडिया हाउस को टार्गेट किया है.

खबर है कि अमर उजाला डाट काम ने रामपाल के खिलाफ एक खबर को चला दिया.. इस खबर में अधर्मी रामपाल का कच्चा चिटठा पूरी तरह से खुल गया. रामपाल को लेकर कुछ शब्दों से उनके गुंडे इस कदर खफ़ा हुए कि देखते ही देख सात दशकों की निर्भीक पत्रकारिता धरी रह गई. हरियाणा में रोहतक यूनिट में रामपाल के गुंडे हथियारों के साथ धमक पड़े… इसके बाद हरियाणा की राजधानी में इस ग्रुप के ऑफिस में सिक्यूरिटी बढ़ा दी गई… मीडिया हब के नाम से मशहूर नोएडा के अमर उजाला मुख्यालय पर रामपाल के गुंडे धरना देने लगे. रोहतक से मिली जानकारी के मुताबिक़ रामपाल की खबर पर मुहर लगाने के लिए उनके समर्थकों के ढेरों फोन कॉल काफी थे..

अमर उजाला के चंडीगढ़, रोहतक, नोएडा में फोन कॉल से खबर पर ढेरों प्रतिक्रियायें आयीं. रोहतक में रामपाल के समर्थकों ने अमर उजाला को एक धर्म विशेष का एजेंडा चलाने तक की बात कह दी. यही नहीं, रोहतक में आकर संत रामपाल के खिलाफ साजिश करने का अमर उजाला को हिस्सेदार बता दिया गया. इसके बाद रामपाल को लेकर अमर उजाला के मालिक ने सभी खबरों को रुकवा दिया. अगले दिन सुबह मीटिंग हुई तो पता चला रामपाल के खिलाफ सिर्फ कुछ शब्दों का इस्तेमाल हुआ, जिसे लेकर रामपाल के कथित गुंडे अमर उजाला पर सीबीआई जांच करवाने की मांग को लेकर खबर खरीदना चाहते थे.

अमर उजाला ने रामपाल के खिलाफ ‘अय्याश’ शब्द का इस्तेमाल किया.. इससे उनके अंधभक्त भड़क गए.अब सवाल है कि क्या एक शब्द को लेकर ही डील थी… या कुछ और… संत रामपाल का कच्चा चिट्ठा खुला तो रामपाल को नायक समझने वाले उनके अंधभक्त लाल हो गए… टीवी चैनल एबीपी न्यूज़ के ‘सनसनी’, आजतक के ऑपरेशन ‘गुंडागर्दी’ में जिस तरह रामपाल को बेनकाब किया गया, उससे अंध भक्तों को फर्क नहीं हुआ लेकिन जैसे ही अमर उजाला ने रामपाल को लेकर एक न्यूज़ ब्रेक की, सबकी हवा निकल गई…

अमर उजाला को मिली धमकियों के बाद ग्रुप में भारी उथल पथल मच गया है… खबर को लेकर जहां सम्मान होना था वहां अमर उजाला को अपने ही पत्रकार पर एक्शन लेना पड़ा. बिना किसी जांच, बिना किसी बहस, और बिना किसी खबर के अपने होनहार पत्रकार को अमर उजाला ने एक झटके में किनारा कर लिया… पत्रकारिता में ये आज के बाजारू दौर में आम हो चला है कि सच्ची खबर लिखने वाले पत्रकार को ही दबा दिया जाए… होना तो ये चाहिए था कि इस पत्रकार को मुहर और सम्मान मिले… लेकिन इसकी जगह पत्रकार को ही दबा दिया गया..  खबर पर मैनेजमेंट में एडिटर कोई सफाई नहीं दे पाए… इस मामले में नोएडा ऑफिस में एक चाटुकारिता करने वाले जनाब फंसे तो मामला उलझ गया… अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में सालों से बैठे धुरंधर इसे खेलने लगे… मीडिया की गन्दी वाली राजनीति में अपनी कुर्सी बचाने के लिए सब कुछ खेल कर दिया गया….

अमर उजाला के मालिकान पत्रकारिता भूल गए… अपने ही पत्रकार को नोटिस थमा दिया.. अब अगर लोग कहते हैं कि पत्रकारिता क्रेडिबल न रही तो इसे क्या कहिये, इसका क्या करें? रामनाथ गोयनका ने एक रिपोर्टर को नौकरी से निकाल दिया था, जब उनसे एक राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा था कि आपका रिपोर्टर बड़ा अच्छा काम कर रहा है… यहाँ तो सटीक खबर को लेकर ही अमर उजाला अपने स्टाफ के खिलाफ हो गया..  खबर को लेकर की गई आलोचना हमारे लिए इज़्ज़त की बात है, लेकिन मीटिंग में कुर्सी बचाने का खेल खेलने वाले इस बात को नहीं समझेंगे.. ये उन लोगों को जवाब है जिन्हें लगता है कि अच्छी पत्रकारिता मर रही है और पत्रकारों को सरकार ने खरीद लिया है…. अच्छी पत्रकारिता मर नहीं रही, ये बेहतर और बड़ी हो रही है… हां, बस इतना है कि बुरी पत्रकारिता ज़्यादा शोर मचा रही है जो कुछ दशकों पहले नहीं मचाती थी.

इंडियन एक्सप्रेस में रामपाल को लेकर और उनके आश्रम का सच बताया गया है… टीवी चैनल में रामपाल को लेकर दिखाया गया रीयल ड्रामा सबको याद भी है.. सर्च के दौरान देशद्रोह व हत्‍या के आरोपी कबीरपंथी बाबा रामपाल के बरवाला (हिसार, हरियाणा) स्थित सतलोक आश्रम में महिला टॉयलेट में सीसीटीवी कैमरा लगा था…. इतना ही नहीं, कैमरे का मुंह भी टॉयलेट के अंदर की ओर था.. रामपाल खुद सिंहासन पर बैठता था और लिफ्ट से मंच पर प्रकट होता था… 5 लाख रुपए का मसाजर भी उसके कमरे से मिला था… इसके अलावा, कंडोम और अश्लील साहित्य भी बरामद किया गया था… ऐसी खबर के बाद भी अगर अमर उजाला ने रामपाल को अय्याश बना कर सवाल उठाया तो गलत क्या था… लेकिन अमर उजाला ने अपने ही पत्रकार का साथ नही दिया…

फैक्ट्स और सच्चाई के बाद भी अगर देश का तीसरा बड़ा मीडिया ग्रुप डर गया तो शर्मनाक है.. इस ग्रुप के सात दशकों की निर्भीक पत्रकारिता पर सवाल है… लगता है कि इस ग्रुप ने अपना कंटेंट वाला तेवर खो दिया है और केवल मार्केटिंग का धुन अलाप रखा है….रामपाल दूध के धुले हैं तो 2014 से लेकर 2017 तक जेल में किस आरोप में बैठे हैं…

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यूपी-उत्तराखंड में अमर उजाला ने फिर दैनिक जागरण को पीटा, नंबर वन की कुर्सी बरकरार

एबीसी यानि ऑडिट ब्‍यूरो ऑफ सर्कुलेशंस की जुलाई-दिसंबर 2016 की रिपोर्ट आ गई है. इसके अनुसार उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड में अमर उजाला अखबार फिर नंबर वन हो गया है. उसने दैनिक जागरण को पीटकर यह कुर्सी हासिल की है.

एबीसी के आंकड़ों के अनुसार, अमर उजाला की सभी संस्‍करणों की कुल 22,57,323 कॉपियां उत्तर प्रदेश में बिकती है, वहीं उत्‍तराखंड में यह संख्‍या 2,62,760 है. अमर उजाला ने ‘दैनिक जागरण’ अखबार को उप्र में 62,065  कॉपियों से और उत्तराखंड में 71,210 कॉपियों से पीछे छोड़ दिया है.

लखनऊ में भी अमर उजाला 1,96,184 कॉपियों के साथ नंबर बन बना हुआ है. आगरा में 90,108 कॉपी, इलाहाबाद में 1,02,096 कॉपी,  बरेली में 62,935 कॉपी और मुरादबाद में 50,370 कॉपियों के साथ यह नंबर वन पर बना हुआ है. उत्‍तराखंड की राजधानी देहरादून में इसकी प्रसार संख्‍या संख्‍या 1,64,843 और नैनीताल में 97,917 कॉपियां हैं.

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मजीठिया वेज बोर्ड से डरे अमर उजाला प्रबंधन ने भी डंडा चलाना शुरू किया

मजीठिया वेज बोर्ड का खौफ अखबार मालिकों पर इस कदर है कि वह सारे नियम कानून इमान धर्म भूल चुके हैं और पैसा बचाने की खातिर अपने ही कर्मचारियों को खून के आंसू रुलाने के लिए तत्पर हो चुके हैं. इस काम में भरपूर मदद कर रहे हैं इनके चमचे मैनेजर और संपादक लोग. खबर है कि अमर उजाला प्रबंधन ने मजीठिया वेज बोर्ड से बचने की खातिर कर्मचारियों का तबादला करना शुरू कर दिया है. साथ ही इंप्लाइज की पोस्ट खत्म की जा रही है.

सूत्रों के मुताबिक अमर उजाला प्रबंधन अपना रजिस्टर्ड आफिस का एड्रेस नोएडा से हटाकर दिल्ली कनाट प्लेस दिखा रहा है. कर्मचारियों की सेलरी स्लिप भी चेंज कर दी गई है. वैसे तो अमर उजाला वाले खुद को भारत का तीसरे नंबर का अखबार बताते फिरते हैं लेकिन जब मजीठिया वेज बोर्ड देने की बारी आती है तो वो अपने को पांचवें ग्रेड का अखबार दिखाने लगते हैं. कहा जा रहा है कि आगे आने वाले दिनों में कई लोगों को नौकरी से निकाला भी जा सकता है.

अमर उजाला के एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

इसे भी पढ़ें…

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अमर उजाला मुरादाबाद में भारी चूक, एक खबर को दो बार अलग-अलग हेडिंग से लगाया गया

ऐसा लग रहा है कि अमर उजाला मुरादाबाद संस्करण को खबर की कमी हो रही है. तभी तो एक ही खबर को अलग अलग हेडिंग से और अलग फोटो के साथ प्रकशित किया गया है. 15 दिसम्बर के पेज नंबर दो पर अमर उजाला ने एक ही खबर को कॉपी कर के अलग अलग हेडिंग “पुलिस ने पकडे जुआरी, 3 को छुड़ा ले गए नेता जी” और “30-50 रूपये में आपका कूड़ा कूड़ा उठायगी हरी भरी” से लगा दिया है.

इस चूक की चर्चा पूरे शहर में हो रही है. लोगों का कहना है कि क्या अमर उजाला के पास खबरों का अकाल पड़ गया है या अमर उजाला की छवि धूमिल करने की कोई सोची समझी साजिश रची गई है. देखें अख़बार की कटिंग….

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कर्मचारियों के जले पर नमक छिड़क रहा है अमर उजाला!

नोएडा से एक साथी ने सूचना दी है कि अमर उजाला प्रबंधन अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी व बकाया तो दे नहीं रहा है ऊपर से जले पर नमक छिड़क रहा है। इस साथी ने सूचना दी है कि यहाँ अमर उजाला के नंबर वन होने का जश्न मनाया गया लेकिन अमर उजाला के नंबर 1 होने का जश्न सिर्फ बड़े लोगों ने ही जोर शोर से मनाया। संपादक, जनरल मैनेजर, मैनेजर जैसे खास लोग 10-12 दिन के विदेश टूर पर भेजे गए और वहां से मौज मस्ती करके लौट आए हैं।

बताया जा रहा है कि लेबर कमिश्नर और प्रमुख सचिव को पटाकर मनचाहा रिपोर्ट कोर्ट में सबमिट करा दिया गया है। इस साथी ने कहा कि यहां प्राइमरी पाठशाला जैसे हालात हैं। जिसने मजीठिया वेज बोर्ड की बात की उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जा रहा है। इस साथी ने मजीठिया वेज बोर्ड को अमल में लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर पूरा भरोसा जताया है और लिखा है कि प्लीज़ मेरा नाम व्यावहारिक कारणों से मत डालियेगा। इस साथी ने लिखा है कि लखनऊ में सभी प्रादेशिक डेस्क के साथी रात 12 बजे के बाद घर जाते हैं लेकिन 95 प्रतिशत लोगों को नाइट अलाउंस नहीं दिया जाता। यही हाल अन्य यूनिटों में भी है।

सिर्फ पिछले साल जून में एक साथ तीन महीने का रात्रि भत्ता रजिस्टर पर साइन कराकर दिया गया था। इसे सैलरी शीट पर रात्रि भत्ता एरियर के रूप में दर्शाया गया था। इसके बाद नहीं दिया गया। हम लोग साढ़े आठ घंटे से भी ज्यादा काम करते हैं। फिलहाल मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर इतना तो तय है अमर उजाला अपने कर्मचारियों को गुमराह कर रहा है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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अमर उजाला के संपादकों ने यूपी में नंबर एक अखबार बनने के बाद सोशल मीडिया पर शेयर किया विजय विज्ञापन

आज फेसबुक पर दिनेश जुयाल, विजय त्रिपठी समेत अमर उजाला के कई यूनिटों के संपादकों ने उपर दिए गए अमर उजाला के यूपी में नंबर वन हो जाने संबंधी विजय विज्ञापन को अपने-अपने एकाउंट से अपलोड कर शेयर किया है और इशारों इशारों में दैनिक जागरण को जता बता दिया है कि अब यूपी में आने वाले और आगे वाले दिन तो अमर उजाला के ही हैं.

अमर उजाला प्रबंधन की तरफ से जारी कराए गए इस विज्ञापन में अमर उजाला को यूपी का नंबर वन अखबार बताया गया है और विज्ञापन में ही यूपी की सारी यूनिटों के प्रसार के आंकड़े दिए गए हैं. सोर्स के बतौर ”एबीसी (एवरेज सरकुलेशन इन यूपी) फॉर अमर उजाला, जेडी 2015, इनक्लुडिंग वेरिएंट” का उल्लेख किया गया है. यानि एबीसी के ये ताजे आंकड़े पर आधारित है जो पिछले साल जुलाई से लेकर दिसंबर तक के बीच की गणना पर आधारित है. इस विज्ञापन में अमर उजाला यूपी की यूनिटों का जो एवरेज प्रसार दर्शाया गया है, वह इस प्रकार है…

आगरा- 219103
इलाहाबाद- 175438
अलीगढ़- 78153
बरेली- 176700
झांसी- 50790
कानपुर- 263369
मुरादाबाद- 144690
मेरठ- 220538
नई दिल्ली- 157975
वाराणसी-286868
गोरखपुर- 158030
लखनऊ- 282769

अमर उजाला शिमला यूनिट के संपादक दयाशंकर शुक्ल सागर इस विज्ञापन को फेसबुक पर अपलोड करते हुए लिखते हैं- ”अखबार की दुनिया में ABC के बहुत मायने हैं। ABC यानी आडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन्स के ताजा आंकड़े बताते हैं कि अमर उजाला उत्तर प्रदेश का नम्बर-1 अखबार हो गया। ये अखबारी कागज पर स्याही की ताकत है। और इस ताकत के पीछे टीम की मेहनत। ये अमर उजाला की विश्वसनीयता और पाठकों का प्यार है। शुक्रिया यूपी।”

इन्हें भी पढ़ें….

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यूपी और उत्तराखंड में खुद के नंबर वन होने के बारे में अमर उजाला ने किया ऐलान, पढ़ें पूरी खबर

अमर उजाला की वेबसाइट अमर उजाला डाट काम पर यूपी और उत्तराखंड में अमर उजाला अखबार के नंबर वन होने के बारे में खबर छापी गई है. ये खबर नई दिल्ली डेटलाइन से है और अमर उजाला ब्यूरो की है. इससे साफ है कि यूपी उत्तराखंड में नंबर वन अखबार अमर उजाला हो चुका है. अमर उजाला डाट काम पर इस बारे में प्रकाशित पूरी खबर पढ़िए…

यूपी और उत्तराखंड में अमर उजाला नंबर वन
amar ujala is number one in uttar pradesh and uttrakhand

ब्यूरो / अमर उजाला, नई दिल्ली

Updated 11:36 शनिवार, 7 मई 2016

अमर उजाला के पाठकों के प्रेम और विश्वास ने इसकी प्रसार संख्या को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई से दिसंबर, 2015 के दौरान आपके प्रिय अखबार की प्रसार संख्या बढ़ कर 29.35 लाख कॉपी तक जा पहुंची। जुलाई से दिसंबर, 2014 की तुलना में 29 फीसदी की यह जबरदस्त बढ़ोतरी अखबार में आपके भरोसे का ही नतीजा है। इस प्रसार संख्या में हाल में शुरू किए गए अमर उजाला ब्रॉडशीट की प्रतियां भी शामिल हैं। अमर उजाला के मौजूदा बाजार में नए पाठकों को जोड़ने और उनका दायरा बढ़ाने के लिए ही कम कीमत पर अमर उजाला ब्रॉडशीट को उतारा गया है।

सबसे जबरदस्त खबर तो यह है कि उत्तर प्रदेश में अमर उजाला ने दैनिक जागरण को 70,335 प्रतियों से पीछे छोड़ दिया है। उत्तराखंड में दैनिक जागरण अमर उजाला से 72,266 कॉपी कम बिकता है। एबीसी के मुताबिक यूपी के आठ संस्करणों, देहरादून और हल्द्वानी में अमर उजाला अपने प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे है।

अमर उजाला ने अपनी नायाब पहलकदमी के तहत पाठकों को कम कीमत पर क्वालिटी अखबार मुहैया कराना शुरू किया है। अमर उजाला का ब्रॉडशीट संस्करण ऐसे पाठकों के लिए है जो ज्यादा कीमत देकर अखबार नहीं खरीदना चाहते। प्रसार संख्या में इजाफे के लिए अमर उजाला ने दोहरी रणनीति अपनाई है। एक  तरफ इसने सोशल मीडिया के बेहतरीन इस्तेमाल से समृद्ध पाठकों की तादाद बढ़ाई है तो दूसरी ओर कम कीमत पर अखबार खरीदने वालों का दायरा भी बढ़ाया है। इससे अमर उजाला के पाठकों में भारी इजाफा हुआ है। पाठकों की तादाद में इस बढ़ोतरी ने अमर उजाला के विज्ञापनदाताओं के विज्ञापनों के असर को कई गुना बढ़ा दिया है।

अमर उजाला के डायरेक्टर प्रबाल घोषाल ने कहा कि हाई वैल्यू रीडर्स सेगमेंट में ग्रोथ पर पूरा ध्यान देने के लिए अमर उजाला ने सोशल मीडिया, सोशल इंजीनियरिंग और ब्रांड सक्रियता का इस्तेमाल किया है। यह सिर्फ सर्कुलेशन बढ़ाने की एक और कवायद भर नहीं है। यह अपने आप में अनोखी पहलकदमी है। विज्ञापनदाताओं को यह जानकार खुशी होगी सोशल मीडिया और कई तरह के नए तरीकों के इस्तेमाल से अमर उजाला ज्यादा समृद्ध पाठकों का दायरा बढ़ा रहा है।

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धन्यवाद अमर उजाला, आपने लखपत के दुनिया छोड़ देने के बाद उसे पत्रकार तो माना

रुदप्रयाग में अमर उजाला के युवा पत्रकार लखपत की 11 अप्रैल को हार्टअटैक से असमय मृत्यु हो गई। मौत की खबर में अमर उजाला ने लखपत को पत्रकार तो लिखा लेकिन अपना पत्रकार नहीं बताया। मौत के बाद पत्रकार से संस्थान के पल्ला झाड़ने और उनके परिवार की पीड़ा को श्रीनगर की वरिष्ठ पत्रकार श्रीमती गंगा असनोड़ा (Ganga Asnora) ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है। उनका पूरा लेख आप नीचे देख सकते हैं। उनकी फेसबुक वॉल से साभार।

धन्यवाद अमर उजाला, आपने लखपत के दुनिया छोड़ देने के बाद उसे पत्रकार तो माना

एक प्रतिष्ठित अखबार का सच क्या है, आज इसे हर व्यक्ति जान रहा है, जबकि पत्रकारिता की नैतिकता सरेआम बाजार में दांव लग रही हो। इसके बावजूद लिखने से खुद को नहीं रोक पा रही हूं। हमारे बीच से हमारा एक अजीज साथी लखपत ‘लक्की’ असमय विदा हो गया है। गमजद़ा साथियों को उसके चले जाने के दुख के साथ घर-परिवार के हालातों की भी चिंता है। लखपत की 22 वर्षीय पत्नी का क्या होगा। इकलौते पुत्र से आस लगाए माता-पिता का क्या होगा? इन सारी चिंताओं के बीच अमर उजाला का आभार कि संस्थान ने उसके चले जाने के बाद प्रकाशित खबर में लखपत को भले ही अमर उजाला से जुड़ा हुआ पत्रकार नहीं बताया, लेकिन कम से कम पत्रकार तो लिखा।

दरअसल नौ साल के पत्रकारिता जीवन में स्व. लखपत बीते छह वर्षों से अमर उजाला में कार्यरत थे। हालांकि अपने स्ट्रिंगर्स से पत्रकार न होने का जो प्रमाण संस्थान लेता रहा, वह इस पत्रकार से भी लिया गया जिसमें अनिच्छा के साथ यह स्वीकार करना होता था कि मैं शौकिया पत्रकार हूं। रोजी-रोटी से मेरी पत्रकारिता का कोई लेना-देना नहीं है। रोजी-रोटी के लिए तो मैं अन्य कार्य करता हूं। मजीठिया के दबाव में अपने कर्मियों को लाभों से वंचित रखना पड़े, इसके लिए संस्थान ने जो ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया, उसमें एक नया नायाब नुस्खा निकाला और करीब एक वर्ष पहले वे इन स्ट्रिंगरों को शौकिया पत्रकार की पद से भी मुक्त कर चुके हैं।

विज्ञापनों की भूख ने उन्हें इतना छोटा कर दिया कि वर्षों से काम कर रहे शौकिया पत्रकार ‘एजेंसी’ बन गए। मार्केटिंग के लिए काम करने वाली एजेंसी। लखपत को भी संस्थान ने यही औहदा दिया था। बेहद न्यून वेतन पर कई वर्षों तक काम करके जिस लखपत के दुनियां छोड़कर चले जाने के बाद अखबार मानता है कि उसने आपदा तथा कई अन्य मामलों में बेहतरीन रिपोर्टिंग की, उसे अपने संस्थान से जुड़ा पत्रकार नहीं बताता। लखपत के साथी उसके संस्थान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं कि क्या इस परिवार की मदद के लिए संस्थान कुछ करेगा? जो बेमानी है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने लखपत की मृत्यु पर शोक जताया है, क्या वे इस परिवार की मदद के लिए व्यक्तिगत रूप से आगे आएंगे। कई ऐसे परिवार रहे होंगे, जिन्हें लखपत की लेखनी ने आबाद किया होगा, क्या लखपत के चले जाने के बाद उसकी पत्नी की नौकरी लगे, इसके लिए ईमानदार कोशिशें होंगी? नेताओं या अखबार मालिकों की ओर देखने से काम नहीं चलेगा, लखपत तुम्हारी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता, लेकिन लखपत के परिवार को जिस तरह की मदद की जरूरत है, उसे हम सब लोग ही सामने आकर पूरा कर सकते हैं। इसलिए प्लीज आइये….।

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अमर उजाला में कई बड़ी यूनिटों के संपादक इधर-उधर, राजेश श्रीनेत की फिर हुई इंट्री

खबर है कि राजेश श्रीनेत फिर से अमर उजाला के हिस्से बन गए हैं और उन्हें अच्छी खासी जिम्मेदारी देते हुए गोरखपुर यूनिट का स्थानीय संपादक बना दिया गया है. राजेश श्रीनेत अमर उजाला के मालिक राजुल माहेश्वरी के करीबी माने जाते हैं. अभी तक राजेश श्रीनेत्र सतना से प्रकाशित मध्य प्रदेश जनसंदेश नामक अखबार के संपादक हुआ करते थे. राजेश श्रीनेत की अमर उजाला में वापसी को आश्चर्य की नजर से देखा जा रहा है. माना जा रहा है कि राजुल माहेश्वरी अपने पुराने भरोसेमंद लोगों पर दांव लगाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं.

अभी तक अमर उजाला गोरखपुर के स्थानीय संपादक के रूप में काम कर रहे प्रभात सिंह का तबादला कम महत्वपूर्ण यूनिट मुरादाबाद कर दिया गया है. सूत्रों के मुताबिक बरेली में प्रभात का घर और परिवार है, इसलिए वह मुरादाबाद आने चाहते थे. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि प्रबंधन ने रणनीतिक तौर पर उन्हें कम महत्वपूर्ण यूनिट का जिम्मा दिया है. मुरादाबाद के स्थानीय संपादक नीरजकांत राही को आगरा का संपादक बना दिया गया है. यह राही के लिए एक बड़ी छलांग है. आगरा के संपादक राजेंद्र त्रिपाठी को बनारस का संपादक बनाया गया है. बनारस के संपादक अजित वडरनेकर का तबादला झांसी यूनिट के संपादक पद के लिए कर दिया गया है. झांसी के संपादक हेमंत लवानिया रिटायर हो चुके है और एक्सटेंशन पर चल रहे थे, जिसकी अवधि पूरी हो गई.

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अमर उजाला वाले पत्रकार को न्यूज एजेंसी बना खूब कर रहे शोषण, सुनिए एक पीड़ित कर्मी की दास्तान

मीडिया संस्थान अमर उजाला में फुल टाइम कर्मचारियों को जबरन न्यूज़ एजेंसी का कर्मी बना कर उन्हें न्यूनतम वेतन लेने के दबाव बनाया जाता है. इसके लिए एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत समय-सीमा निर्धारित करके दबावपूर्वक लिखवाया जाता है कि वे (कर्मचारी) संस्थान के स्थाई कर्मचारी न होकर एक न्यूज़ एजेंसी कर्मी के तौर पर कार्य करेंगे. लेकिन असलियत ये है कि न्यूज़ एजेंसी संचालक से एक स्थाई कर्मचारी वाला काम लिया जा रहा है. उसे न्यूनतम वेतन पर सुबह 10 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक यानि 12 घंटे संस्थान के लिए कार्य करने को बाध्य किया जाता है.

अमर उजाला में जो फुल टाइम वर्कर हैं यानि पक्के कर्मचारी हैं, वे भी केवल 8 घंटे ही सेवाएं देते हैं. न्यूज़ एजेंसी संचालकों के लिए गाइडलाइन है कि वह किसी संस्थान के लिए बाध्य न होकर स्वतंत्र रूप से कार्य करेंगे. आज कई न्यूज एजेंसियों को अमर उजाला ब्यूरो ऑफिस में गुलामी की नौकरी करने को मजबूर किया जा रहा है. न तो उन्हें आईकार्ड दिया जाता है, न पूरी सैलरी दी जाती और न ही उनको समय पर अवकाश दिया जाता है. उन्हें एक बंधुआ मजदूर बना दिया गया है. यदि कोई कर्मचारी इसका विरोध करता है तो उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है. मीडिया संस्थान अमर उजाला के अधिकारियों और ब्यूरो प्रमुख द्वारा धमकी दी जाती है कि यदि किसी कर्मचारी ने इसके विरोध में आवाज़ उठाई तो उसे नौकरी से हटा दिया जाएगा. रोज़गार छिनने का भय दिखाकर अमर उजाला संस्थान लगातार कर्मचारियों का शोषण कर रहा है. इस कुव्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाने पर मुझे (अमर उजाला के कुरुक्षेत्र कार्यालय में सेवारत दीपक शर्मा) तानाशाहीपूर्ण रवैया दिखाते हुए ज़बरदस्ती नौकरी से हटाया जा रहा है.

मेरा अपराध ये रहा कि कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख मुकेश टंडन द्वारा कही गई मौखिक बात को लिखित में मांग लिया था. टंडन ने कहा था कि हेमंत राणा ज्योतिसर, विशेष नाथ गौड़, राकेश रोहिल्ला और दीपक शर्मा को न्यूज एजेंसी संचालक होने के बावजूद सुबह 10 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक काम करना होगा. इसी बात को मैंने लिखित में हेड आफिस से मांग लिया. इसके बाद ब्यूरो प्रमुख ने हेड ऑफिस रोहतक में किसी संपादक से बात करके मुझे सर्विस से हटाने की रणनीति बना ली. न्यूज एजेंसी के कॉन्ट्रैक्ट में साफ़-साफ़ लिखा है कि अमर उजाला ने दीपक शर्मा न्यूज एजेंसी से तीन वर्षों के लिए अनुबंध किया है, जबकि अमर उजाला के जिला कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख मुकेश टंडन और हेड ऑफिस रोहतक के अधिकारियों ने तानाशाही दिखाते हुए लगभग आठ माह के अंतराल में ही मेरी सेवाओं को समाप्त कर दिया.

ब्यूरो चीफ ने दूसरों की खबरें की अपने नाम से प्रकाशित

अमर उजाला के कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख मुकेश टंडन ने ऐसा भी किया कि न्यूज के लिए भागदौड़ तो की मैंने या किसी अन्य ने और न्यूज प्रकाशित कराई मुकेश टंडन ने अपने नाम से। उदाहरण के तौर पर…. ‘कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में बिना चेकिंग के एंट्री कर रहे वाहन’ शीर्षक के तहत खबर छपी थी जो कि मैंने बायलाइन भेजी थी, लेकिन ब्यूरो प्रमुख ने डेस्क पर बात करके इस पर से मेरा नाम हटवा दिया. दो दिन बाद जब इस खबर का इम्पेक्ट आया तो कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ मुकेश टंडन ने यह इम्पेक्ट अपने नाम से प्रकाशित करा दिया, जिसका शीर्षक कुछ ऐसा था कि… ‘अब स्टिकर लगे वाहनों की होगी यूनिवर्सिटी में एंट्री’. जब इस न्यूज को लेकर मैंने मुकेश टंडन से बात की तो वे ताव में आ गए और बोले कि टंडन ब्यूरो चीफ है कुरुक्षेत्र का, जो मर्जी आए करूंगा, जो मेरे अंडर काम करता है वो मुझसे कुछ पूछ नहीं सकता.

ब्यूरो चीफ ने कई बड़े मामले दबा दिए गए

मैंने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में नियमों को ताक पर रख आनन-फानन में एक असिस्टेंट प्रोफेसर को प्रोफेसर के पद पर प्रमोट करने का मामला कवर किया था. इस खबर को खंगालते वक़्त सामने आया था कि ये प्रमोशन की फ़ाइल कई बार रिजेक्ट हो चुकी थी. लेकिन अमर उजाला संस्थान के कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ मुकेश टंडन ने इस खबर को दबा दिया. इसके पीछे मुकेश टंडन की क्या मंशा थी या हेड ऑफिस रोहतक से किसी प्रकार के निर्देश आए थे, ये तो मुकेश टंडन और हेड ऑफिस रोहतक वाले ही बेहतर जानते होंगे. लेकिन, कुछ भी बात रही हो, मेहनत करने के बावजूद इतनी बड़ी खबर न छापना कुछ और ही इशारा कर रहा था.

मैंने जब खबर न छपने बारे कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ मुकेश टंडन से बात की तो वे बोले कि हेड ऑफिस वाले नहीं छाप रहे, उनकी मर्जी. इसके दो दिन बाद जब दोबारा यह न्यूज भेजने की रिक्वेस्ट की तो मुकेश टंडन बोले कि ऑनलाइन सॉफ्टवेयर पर खबर नहीं है. फिर जब कंप्यूटर के फोल्डर में सेव की गई यही न्यूज भेजनी चाही तो वहां से भी गायब थी. ये क्या ड्रामा चल रहा है, कुछ समझ नहीं आ रहा. मीडिया संस्थान अमर उजाला के कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ और हेड ऑफिस रोहतक के अधिकारी क्यों संस्थान को बट्टा लगवाने पर तुले हुए हैं? पर कभी तो आवाज उठेगी और मीडिया संस्थान अमर उजाला की असलियत सबके सामने आएगी.

सवाल उठने लगे हैं-

-क्या तानाशाही का विरोध करने की ये सजा हो सकती है कि एक कर्मचारी को नौकरी से हटा दिया जाए?
-क्या सुबह 10 से रात 10 बजे तक काम करवाकर बंधुआ मजदूर बनाना ही अमर उजाला संस्थान का उद्देश्य है?
-क्या एजेंसी संचालक द्वारा कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख से 10 am to 10 pm कुरुक्षेत्र ब्यूरो में काम करने को लेकर हेड ऑफिस से लिखित में आदेश  मंगवाने की गुज़ारिश करना भी किसी अपराध की श्रेणी में आता है?
-क्या मीडियापर्सन या एक कर्मचारी का शोषण करने के लिए ही अमर उजाला संस्थान ने न्यूज एजेंसी की पॉलिसी अपनाई हुई है?
-एक कर्मचारी को जबरन एजेंसी बनाकर उसे बेहद कम वेतन पर मजबूर करना, क्या यही नियम, कायदा और न्याय है अमर उजाला का?

कीजिए सच का सामना, दीजिए जवाब.

कहते हैं जब किसी जानवर को खून मुंह लग जाता है तो उसकी मजबूरी हो जाती है बार-बार खून पीना. ऐसी ही स्थिति यहां भी दिखाई दे रही है. न जाने कितने ही कर्मचारियों को इस कुव्यवस्था का शिकार बनाया होगा आपने अभी तक और न जाने कितनों को बनाओगे. कुछ भी हो, एक दिन पोल खुलती ज़रूर है. अब वक़्त आ गया है अमर उजाला संस्थान की पोल खोलने का. आखिर में दो लाइनें कहना चाहूंगा…

आपकी भी कुछ मजबूरी रही, अब मेरी भी कुछ मजबूरी है,
जल्दी अब तैयारी करो, कोर्ट की कितनी दूरी है।
अच्छा किया या बुरा किया, तुम खूब जानो अमर उजाला के नुमाइंदों,
न्याय नहीं है तुम्हारी शरण में, अब कोर्ट की शरण जरूरी है।।

जय हिन्द…. जय भारत….

एक पीड़ित प्रताड़ित कर्मचारी

दीपक शर्मा

रिपोर्टर

कुरुक्षेत्र, हरियाणा

संपर्क: फोन 098132 88085 मोबाइल sdeepaknews@gmail.com

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मजीठिया वेज बोर्ड : अमर उजाला के साथी इसे जरूर पढ़े (आखिरी पार्ट)

गतांक से आगे…

इससे पहले हम एक्‍स और वाई श्रेणी के शहरों में कार्यरत अमर उजाला के साथियों को अपने वेतन के तुलनात्‍मक अध्‍ययन के लिए जानकारी दे चुके हैं। अब हम उमर उजाला के जेड सिटी यानि धर्मशाला, जम्‍मू आदि में कार्यरत सभी साथियों को तुलनात्‍मक अध्‍ययन के लिए वेतनमान उपलब्‍ध करवा रहे हैं। यह वेतनमान (ग्रेड बी का) जुलाई 2015 से दिसंबर 2015 तक के बीच भर्ती नए साथियों पर लागू होते हैं। जिससे आसानी से जाना जा सकता है आप को बी ग्रेड के अनुसार वेतनमान मिल रहा हैं या नहीं है। (अपना शहर देखने के लिए देखें मजीठिया वेजबोर्ड की रिपोर्ट में पेज नंबर 37-38 या 55-56)

अनुसूची- I. क- बी ग्रेड समाचार पञ  (शहरों का वर्गीकरण- क्षेञ ‘जेड’)

(समाचार-पञ प्रतिष्‍ठानों में श्रमजीवी पञकारों का समूहन)

समूह-1: कार्यकारी संपादक, स्‍थानीय संपादक एवं अन्‍य…

Basic: 22,000

Gross Salary: 58,748

समूह-2: सहायक संपादक, समाचार संपादक एवं अन्‍य…

Basic: 20,000

Gross Salary: 53,744

समूह-3: मुख्‍य संवाददाता, मुख्‍य उप-संपादक,  सहायक समाचार संपादक, कार्टूनिस्‍ट, पेज डिजाईनर एवं अन्‍य…

Basic: 18,000

Gross Salary: 48,739

समूह-4: वरिष्‍ठ उप-संपादक, डिप्‍युटी पेज डिजाईनर एवं अन्‍य…

Basic: 16,000

Gross Salary: 43,735

समूह-5: उप-संपादक, रिपोर्टर, कलाकार, मुख्‍य प्रूफशोधक एवं अन्‍य…

Basic: 14,000

Gross Salary: 38,731

समूह-6: प्रूफशोधक एवं अन्‍य… समस्‍त श्रमजीवी पञकार…

Basic: 13,000

Gross Salary:  36,228

अनुसूची- II.  बी ग्रेड समाचार पञ (शहरों का वर्गीकरण- क्षेञ ‘जेड’)

(गैर पञकार समाचार-पञ कर्मचारी-प्रशासनिक स्‍टाफ का वर्गीकरण)

समूह-1: वरिष्‍ठ सहायक महाप्रबंधक, वेब प्रशासक, इलैक्‍ट्रोनिक अथवा सॉफ्टवेयर अभियंता, मुख्‍य लेखाकार एवं अन्‍य…

Basic: 16,000

Gross Salary: 43,735

समूह-2: अपर प्रबंधक, लेखा अधिकारी, कल्‍याण अधिकारी एवं अन्‍य…

Basic: 14,000

Gross Salary: 38,731

समूह-3: अधिकारी अथवा विभागीय मुखिया, हेड क्‍लर्क, डीटीपी इंचार्ज, प्रोग्रामर एवं अन्‍य…

Basic: 12,000

Gross Salary: 33,726

समूह-4: वरिष्‍ठ स्‍टेनो सचिव, सुरक्षा पर्यवेक्षक एवं अन्‍य…

Basic: 11,000

Gross Salary: 31,224

समूह-5: कनिष्‍ठ क्‍लर्क, टेलीफोन/फैक्‍स मशीन ऑपरेटर, ड्राइवर, कारपेंटर, प्‍लम्‍बर, राजमिस्‍ञी एवं अन्‍य…

Basic: 9,000

Gross Salary: 26,220

समूह-6: बिल कलैक्‍टर्स, पिओन (चपरासी) एवं अन्‍य…

Basic: 8,500

Gross Salary: 24,969

अनुसूची- III. बी ग्रेड समाचार पञ (शहरों का वर्गीकरण- क्षेञ ‘जेड’)

(गैर पञकार समाचार-पञ कर्मचारियों-फैक्‍ट्री स्‍टाफ का वर्गीकरण)

समूह-1: वरिष्‍ठ अभियंता, सहायक अभियंता एवं अन्‍य…

Basic: 12,500

Gross Salary: 34,877

समूह-2: वरिष्‍ठ पर्यवेक्षक, फोरमैन एवं अन्‍य…

Basic: 11,000

Gross Salary: 31,124

समूह-3: वरिष्‍ठ उत्‍पादन सहायक, कनिष्‍ठ वीडीटी संचालक, ऑफसेट मशीनमैन एवं अन्‍य…

Basic: 10,000

Gross Salary: 28,622

समूह-4: कन्‍वेयर स्‍ट्रीकेट मशीन-मैन, आर्ट विभाग में पेस्‍ट-अप मैन, प्‍लम्‍बर एवं अन्‍य…

Basic: 9,000

Gross Salary: 26,120

समूह-5: सहायक इलैक्‍ट्रीशियन, ट्रीडलमैन तथा डीएफ प्रेसमैन एवं अन्‍य…

Basic: 8,000

Gross Salary: 23,618

समूह-6: बालर मुकदम, रील लोडर तथा अनलोडर, ट्रोली मैन एवं अन्‍य…

Basic: 7,500

Gross Salary: 22,366

नोट- 1. उपरोक्‍त वेतन में पीएफ में 12 फीसदी कंपनी का योगदान भी जोड़ा गया है। इसके अलावा दिसंबर 2015 में रविवार को साप्‍ताहिक अवकाश का आधार मान कर 27 दिन का यानि 2700 रुपये रात्रि भत्‍ता भी जोड़ा गया है।
2. यदि आपको संस्‍थान ने नई कंपनी बनाकर उसमें स्‍थानांतरित कर दिया है तो भी आपको मजीठिया वेजबोर्ड के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
3. ईएसई के अंतर्गत आने वाले साथियों को चिकित्‍सीय भत्‍ता नहीं मिलेगा।
4. मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें ठेका आधार पर कार्यरत सभी साथियों और अंशकालिक संवाददाता व छायाकार पर भी लागू होंगी।

मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार यह वेतनमान उन सहयोगियों का है जिन्‍होंने जुलाई 2015 से दिसंबर 2015 के बीच उमर उजाला में या बी ग्रेड के किसी भी अन्‍य समाचार पञ  (शहरी वर्गीकरण ‘जेड’) को ज्‍वाइन किया होगा। आप जो वर्तमान वेतन प्राप्‍त कर हैं उससे आपका वेतन कहीं ज्‍यादा होगा यदि आपके संस्‍थान में मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें सही ढंग से लागू हो जाती हैं तो। इसको देखकर आप समझ सकते हैं कि केवल सामूहिक प्रयास ही हमें अपना हक दिलवा सकता है। इसलिए साथियों एकजुट हो जाइए, ताकि आप अपना और अपने परिवार का भविष्‍य सुरक्षित कर सकें।

इसके पहले वाले हिस्से पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

मजीठिया वेज बोर्ड : अमर उजाला के साथी इसे जरूर पढ़ें (पार्ट वन)

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अमर उजाला के साथी इसे जरूर पढ़े (पार्ट दो)

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अमर उजाला पर विज्ञापन न मिलने से डीजीपी के खिलाफ खबर छापने का आरोप

अमर उजाला को विज्ञापन न देने पर डीजीपी के खिलाफ 31 जनवरी और 1 फरवरी को प्रकाशित खबरों के मामले ने तूल पकड लिया है। पुलिस अधिकारियों ने अमर उजाला न पढ़ने की चेतावनी जारी कर दी है। साथ ही अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ नगर कोतवाली देहरादून में मुकदमा दर्ज कर लिया है। सूत्रों की मानें तो अब अमर उजाला के पदाधिकारी मुख्यमंत्री हरीश रावत से मिलकर मामले में समझौता कराने के प्रयास में लगे हैं।

पुलिस विभाग की तरफ से जारी यह पत्र चर्चा में है…

महिला दरोगा भर्ती से सम्बंधित विज्ञापन न मिलने से बौखलाए अमर उजाला अखबार ने डीजीपी उत्तराखंड महोदय के सम्बन्ध में पहले 31.1.16 को देहरादून में तथा 1.2.16 को हरिद्वार में, फिर उसका फॉलोअप छापा जो काफी भद्दा गैरजिम्मेदाराना तरीके से छापा है. इतने बड़े अखबार को ऐसी ओछी हरकत शोभा नहीं देती. एक ही खबर को ज्यों का त्यों दो दिन प्रदेश में अलग स्थानों में छापा गया। प्रदेश पुलिस के मुखिया के बारे में इस प्रकार की टिप्पणी करना पूरे पुलिस विभाग के लिए गंभीर चिंता और मनन का विषय है जो कि सीधे तौर पर उत्तराखण्ड पुलिस के मान सम्मान को ललकारते हुऐ पीत पत्रकारिता का जीता-जागता उदाहरण है।

पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर द्वारा किये गए विभागीय अच्छे कार्यों को तो कभी भी अमर उजाला ने तार्किक जगह नहीं दी। यदि कभी-कभार ऐसी ख़बरें छापी भी हैं, तो बाद के पन्नों में वो भी बेमन से, और बहुत कम शब्दों में। परंतु विज्ञापन न मिलने की खबर को अमर उजाला ने फ्रंट पेज की खबर बनाया है। सही में देखा जाये तो अमर उजाला का कुछ सालों में पैटर्न पूरी तरह से पुलिस विभाग के एंटी अखबार का है, और मात्र एक ही बदनाम पुलिस अधिकारी का व्यक्तिगत अखबार तक सीमित होकर रह गया है।

पुलिस विरोधी नकारात्मक खबरें इसमें बड़ी बड़ी और पुलिस विभाग के गुड वर्क की ख़बरें बहुत छोटी छोटी छापी जाती हैं। वर्तमान खबर तो मात्र सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन न मिलने के कारण छापी गयी है जबकि खबर में जमीन से जुड़े जिस केस को उछालकर जिक्र किया गया है, उस केस के करंट अपडेट को तो जानने की कोशिश तक नहीं की गयी और केस से जुड़े अधिकारीयों को सजा दिए जाने के बारे में लिखा है।

हकीकत में इस केस में धोखाधड़ी तो हमारे डीजीपी सर के साथ हुई है। अपने हक़ के लिये जमकर लड़ना कोई गलत बात नहीं। लेकिन अमर उजाला डीजीपी सर के विरोध में ख़बरें छाप कर उनकी छवि ख़राब कर पूरे पुलिस विभाग को छोटा करने की कोशिश कर रहा है। पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर ने पुलिस परिवार का मुखिया होने की जिम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभाई और अपने अधीनस्थों के भलाई के लिए स्वयं व्यक्तिगत रुचि लेते हुए शासन में लंबे समय से लटकी पड़ी तमाम फाइलों की पैरवी की गयी तथा सिपाहियों की वेतन विसंगति, प्रमोशन, स्थायीकरण, नये पदों और पुलिस विभाग के आधुनिकीकरण आदि मामलों का बहुत तेजी से निस्तारण करवाया।

वर्ष 2015 में वेतन विसंगति एवं एरियर को लेकर काली पट्टी बांधने एवं सोशल मीडिया पर मेसेज फॉरवर्ड करने के मामले में जब सिपाहियों पर कार्यवाही की बात कई पुलिस अधिकारी कर रहे थे, अकेले डीजीपी सर ही थे, जिन्होंने किसी भी निर्दोष सिपाही पर कार्यवाही नहीं होने दी। उन्होंने किसी निर्दोष के साथ नाइंसाफी नहीं होने दी, जबकि उस मामले में सैकड़ों सिपाहियों पर कार्यवाही की तलवार लटकी हुई थी। यहाँ तक कि डीजीपी सर ने सिपाहियों के हक़ के लिए वेतन विसंगति समय से ठीक न होने की स्थिति में अपना इस्तीफा तक देने की बात कही थी। यह डीजीपी सर के व्यक्तिगत प्रयासों का ही नतीजा है कि माननीय मुख्यमंत्री जी ने एरियर के भुगतान के लिए अलग से बजट स्वीकृत किये जाने की बात कही है और जल्द ही सभी सिपाहियों को एरियर मिल भी जायेगा।  

साथियों, हम अपने पैसों के लिए तो एकजुट होकर लड़ते हैं, तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं परंतु हमारी हक़ और इज़्ज़त की लड़ाई में हमारे साथ खड़े होने वाले डीजीपी सर जब दो महीने में रिटायर होने वाले हैं, तो ऐसे समय में एक अखबार की मनमानी के कारण क्या हम उनकी, अपने विभाग और वर्दी की छवि को धूमिल होते हुए हाथ पर हाथ रखकर यूँ ही देखते रहें? क्या हमें उनके साथ, उनके समर्थन में एकजुट होकर खड़े नहीं होना चाहिए?

यह समय एकजुट होकर पुलिस विभाग को चुनौती देने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने का है। यह समय डीजीपी सर के साथ उनके समर्थन में खड़े होने का समय है। ऐसा लगता है कि अमर उजाला के पत्रकार अपनी मर्जी के मालिक हैं, जो मन में आया छाप दिया। जब प्रदेश पुलिस के मुखिया को ही यह अखबार कुछ नहीं समझ रहा है, तो आने वाले दिनों में छोटे अधिकारियों और सिपाहियों का क्या हाल होगा, जरा सोचो। विचार करो। एकजुट होकर इस अखबार के विरोध में खड़े हो जाओ। दिखा दो इन्हें उत्तराखंड पुलिस की एकता और हमारी ताकत। इसलिए इस अखबार को सबक सिखाने के लिए यह जरूरी है कि इस अखबार का विरोध हर स्तर पर किया जाये।  

साथियों, आज से इस अखबार का विरोध शुरू कर दो और यह विरोध तब तक करते रहो, जब तक यह अखबार हमारे डीजीपी सर से इस खबर के बारे में माफ़ी न मांग ले। जिसके भी घर में, परिवार में, रिश्तेदारी में अमर उजाला अख़बार आता है, आज ही उसे बदलवाकर दूसरा अखबार लगवाओ और अपने हॉकर को तथा पत्रकारिता से जुड़े जिस भी शख्स को जानते हो, उसे भी बताओ कि तुमने यह अखबार क्यों बंद किया है? 

साथियों, यह पुलिस की एकजुटता दिखाने का समय है। मीडिया की दलाली को जवाब देने का समय है। हमारे सम्मान की लड़ाई लड़ने वाले डीजीपी के स्वाभिमान की लड़ाई में साथ खड़े होने का समय है। ये दिखाने का समय है कि हम एक हैं और कोई भी हमें हल्के में नहीं ले सकता। देखना है, कौन जीतता है। हमारी एकता या बिकाऊ मीडिया।

जय हिन्द
जय उत्तराखंड पुलिस।

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पुलिस ने निकालनी शुरू की खुन्नस

अब पुलिस ने खुन्नस में अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। आरोप है कि विज्ञापन वाला पीएचक्यू में घुसा। विज्ञानकर्मी पर 384, 385, 120 बी, 185, 186 की धारा लगायी गई है। देहरादून यूनिट में कार्यरत विज्ञापन के अभिषेक शर्मा के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा।

देहरादून से एक मीडियकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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अमर उजाला की डिजिटल टीम के पास मुद्दों का टोटा, देखिए क्या क्या छाप रहे हैं

Ayush Shukla : लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ. धन्य हो तुम्हारा हिंदी अखबार. धन्य हो इस अखबार की डिजिटल टीम के रिपोर्टर. धन्य हो डिजिटल के संपादक जी और धन्य हो इस ग्रुप के ओवरआल मालिक जी. आप लोग भी इसे देखिए और सोचिए कि अमर उजाला की टीम के पास क्या मुद्दों का टोटा पड़ गया है जो पैंट में पेशाब कर देने जैसी चीजों को खबर बनाने पर तुले हुए हैं.

 न्यू मीडिया के युवा पत्रकार आयुष शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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धन्य है अमर उजाला का ज्ञान : हाथापाई का अंग्रेजी अनुवाद ‘ब्लो जॉब’!

अमर उजाला ने इंग्लिश में लिखा- हिमाचल विधानसभा में ‘मुख मैथुन’. सोशल मीडिया पर उस वक्त हिंदी अखबार ‘अमर उजाला’ की जमकर फजीहत हुई, जब उसकी एक रिपोर्ट का इंग्लिश टाइटल अनर्थ करता दिखा। अंग्रेजी में टाइटल था- ‘Blow job in Himachal Vidhansabha’. लोग इस बात को लेकर मजे लेते नजर आए। गौरतलब है कि blow job का अर्थ ‘मुख मैथुन’ होता है। तो इस हिसाब से इस टाइटल का मतलब बना- हिमाचल विधानसभा में मुख मैथुन. shabdkosh.com पर blow job का अर्थ कोई भी देख सकता है।

जाहिर है, यह ऐसी गलती है, जो इंग्लिश के कम ज्ञान की वजह से हुई है। शायद अमर उजाला में काम करने वाले किसी सब एडिटर ने ”हिमाचल विधानसभा में हाथापाई’ का इंग्लिश टाइटल देना चाहा होगा। ऐसे में उसने गूगल ट्रांसलेट की मदद ली, जिसने हाथापाई की इंग्लिश blow job कर दी। गूगल ट्रांसलेट से आप इसका अर्थ देख सकते हैं।

गौरतलब है कि अभी गूगल का हिंदी ट्रांसलेट विकास के चरण में है और इस पर भरोसा नहीं किया जाता। पहले भी कई बार अजीब और आपत्तिजनक अनुवाद के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में यह मानवीय भूल की वजह से अमर उजाला को थोड़ी असहज स्थिति का सामना जरूर करना पड़ा है। ऐसी गलती किसी से भी हो सकती है; हमसे भी। मगर उम्मीद है कि इस घटना से सबक लेते हुए आगे ऑनलाइन मीडिया पोर्टल ही नहीं, अन्य लोग भी गूगल ट्रांसलेट इस्तेमाल करते वक्त सावधानी बरतेंगे।

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यूपी में जंगलराज : अमर उजाला के पत्रकार की मां से दारोगा बलात्कार नहीं कर पाया तो पेट्रोल डालकर जला दिया

लखनऊ। अभी शाहजहांपुर के पत्रकार जागेन्द्र को जलाकर मारने की घटना ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि बाराबंकी में अमर उजाला अखबार के पत्रकार संतोष त्रिवेदी की मां से थाने के भीतर बलात्कार की कोशिश की गई और कामयाबी नहीं मिली तो उहें पेट्रोल डालकर जला दिया गया। गंभीर हालत में लखनऊ में जिंदगी और मौत से जूझ रही हैं। वह थाने में अपने पति को छुड़ाने के लिए गयी थी जिन्हें पूछताछ के नाम पर पुलिस ने बेवजह बैठा रखा था। छोडऩे के एवज में पहले उनसे एक लाख रुपये मांगे गये और फिर थानाध्यक्ष के कमरे में ले जाकर उनसे बलात्कार की कोशिश की गयी।

बाराबंकी जनपद के कोठी थाने में रेप में नाकाम होने पर दारोगा और एसआई ने पीड़ित महिला के ऊपर पेट्रोल डालकर जला दिया, जिससे महिला गम्भीर रूप से झुलस गई। महिला को उपचार के लिये जिला अस्पताल बाराबंकी में भर्ती कराया गया लेकिन हालत गम्भीर होने पर चिकित्सकों ने महिला को ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया। जहां वह जिन्दगी और मौत से जंग लड़ रही है। इस मामले में एसपी बाराबंकी ने थानाध्यक्ष कोठी और एसआई को सस्पेंड कर दिया है।

बाराबंकी जनपद के कोठी थाने पर सोमवार की सुबह पीड़ित महिला नीतू शर्मा अपने पति को छुड़ाने के लिये गई थी। नीतू का आरोप है कि एसओ राय सिंह यादव और एसआई अखिलेश ने उसे कमरे में बुलाया और रेप करने की कोशिश की। विरोध करने पर उस पर पेट्रोल उड़ेल दिया और आग लगा दी, जिससे वह गम्भीर रूप से जल गई। एसओ का कहना है कि चार जुलाई को थाना क्षेत्र में गंगा प्रसाद को गोली मारी गई थी, जिसमें नीतू का भाई नन्दू भी नामजद है। इस मामले में नीतू के पति को पुलिस पूछताछ के लिये थाने लाई थी, जहां नीतू छोड़ने का दबाव बना रही थी। पूछताछ के बाद ही छोड़ने की बात कही गई तो उसने मिट्टी का तेल अपने ऊपर गिराकर स्वयं को आग लगा ली।

आईपी सिंह, प्रवक्ता भाजपा : एक पत्रकार की मां को जलाने की घटना सरकार के ताबूत में आखिरी कील होगी। कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि प्रदेश में कानून व्यवस्था का इतना बुरा हाल हो जायेगा कि पत्रकार की मां तक से बलात्कार की कोशिश की जायेगी और कामयाबी न मिलने पर उसे जिंदा जला दिया जायेगा।

अमिताभ ठाकुर, आईजी : यह बेहद शर्मनाक घटना है। तत्काल एफआईआर दर्ज करके दोषी पुलिसकर्मियों को जेल भेजा जाना चाहिए। हैरानी की बात है कि बेकसूर लोगों को बेवजह थाने लाया जा रहा है और उनसे अवैध वसूली की जा रही है। अगर एसएसपी भी कुछ नहीं कर पा रहे तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए

बड़े अफसरों को नहीं मतलब

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा था कि पत्रकारों के मामले बेहद संवदेनशील तरीके से देखें जाये। मगर पुलिस के बड़े अफसरों को इससे कोई मतलब नहीं है। बाराबंकी में अमर उजाला अखबार के पत्रकार की मां को खुलेआम जला दिया गया। जब डिटेल जानने के लिए डीजीपी, एडीजी कानून व्यवस्था के मोबाइल और लैंड लाइन नम्बरों पर कई बार कॉल की गई और बताया गया कि बाराबंकी में पत्रकार की मां जला दी गयी है, इस पर अपना पक्ष दीजिए। पुलिस का पक्ष जानने की बात कहने पर उधर से कहा गया कि अपना नम्बर दे दीजिये, साहब व्यस्त हैं। नम्बर देने के दो घंटे बाद भी किसी भी अफसर ने फोन करने की जहमत नहीं उठाई। बाराबंकी के एसपी अब्दुल हमीद अपने कारनामों से वैसे भी चर्चा में रहते हैं। बाराबंकी के दर्जनों मामले सामने आये हैं जहां अवैध हिरासत में लोगों को रखकर उनसे अवैध वसूली की गयी और शिकायत करने पर उन्हें गलत मुकदमों में जेल भेज दिया गया। बीते सप्ताह ही दारोगा यशवंत सिंह ने एक बेकसूर प्रभाकर शर्मा को जेल भेज दिया। सीओ ने कहा कि यशवंत सिंह यादव है हम कुछ नहीं कर सकते। एसपी अब्दुल हमीद को भी बताया गया मगर कुछ नहीं हुआ प्रभाकर का दोष था कि उसने पुलिस की अवैध वसूली की शिकायत मानव अधिकार आयोग से कर दी थी।

लखनऊ के सांध्य दैनिक ‘4पीएम’ में प्रकाशित खबर. ‘4पीएम’ अखबार के संपादक वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा हैं.

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विजय त्रिपाठी के वक्त में टेंशन के लिए तरसता रहा न्यूज रूम

Vivek Singh : देहरादून से विजय त्रिपाठी कानपुर चले गए और उनकी जगह कानपुर से हरीशचंद्र सिंह आ गए। विजय त्रिपाठी मेन स्ट्रीम मीडिया में मेरे पहले बॉस रहे पर मैं इंतजार ही करता रह गया कि कभी मुझसे बॉस की तरह पेश आएंगे। मुझसे क्या, वह किसी से भी कभी बॉस (जैसी बॉस की पारंपरिक छवि है) की तरह पेश आएं हों, याद नहीं आता। 

उनके साथ डेढ़ साल से ज्यादा काम किया पर न्यूज रूम के तनाव भरे माहौल में उनकी कभी ऊंची आवाज नहीं सुनाई दी। सच कहूं तो कभी-कभी मैं खुद सोचता था कि कभी तो थोड़ा न्यूज रूम में टेंशन हो, कुछ तो हलचल हो पर नहीं हुई। पहली बार देहरादून आया था तो इस शहर में सबसे पहले मिलने वाले सर ही थे। फिर रोज मिलता रहा, सीखता रहा। न्यूज रूम में कोई दिक्कत होती, सीधा उनके केबिन में घुस जाता, बिना फिक्र किए। सबसे नया होने के बावजूद। 

ऐसी बहुत सी बातें-यादें कहने को हैं पर नहीं कहूंगा। अलविदा भी नहीं कहूंगा क्योंकि ऐसा तो तब कहते हैं जब दूर जा रहे हों। आप नई जगह जा रहे हैं दूर नहीं तो अलविदा कैसा। ढेरों शुभकामनाएं सर लेकिन गुडबॉय नहीं। फिर-फिर मिलेंगे क्योंकि अभी आपके साथ काम करना और सीखना पूरा नहीं हो पाया। 

अमर उजाला देहरादून में कार्यरत युवा पत्रकार विवेक सिंह के एफबी वाल से

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अमर उजाला हल्द्वानी के संपादक सुनील शाह का दिल्ली में निधन

अमर उजाला हल्द्वानी (उत्तरांचल) के संपादक सुनील शाह अब इस दुनिया में नहीं रहे। वह 59 वर्ष के थे। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में बीती रात 3:10 बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा। डाक्टरों ने प्रयास कर उनकी धडकन वापस लाई। 3:45 बजे फिर दौरा पड़ा और धड़कन वापस नहीं आई। 3:50 बजे उनका निधन हो गया।

गौरतलब है कि पिछले दिनों वह कार एक्सिडेंट में घायल हो गए थे। दुर्घटना के समय वह अपनी धर्मपत्नी के साथ कहीं जा रहे थे। हादसे के दौरान कार उनकी धर्मपत्नी ही चला रही थीं। गंभीर हालत में उनको तुरंत स्थानीय अस्पताल ले जाया गया था लेकिन चिकित्सकों ने उन्हें दिल्ली के लिए रेफर कर दिया था। उनके निधन से अमर उजाला परिवार एवं उनके अन्य सुपरिचितों में शोक व्याप्त हो गया। आय्यारपाटा (नैनीताल) निवासी सुनील शाह अपने पीछे पत्नी और दो बेटों को छोड़ गए हैं। लंबे समय से अमर उजाला में कार्यरत सुनील शाह उसकी कई यूनिटों में संपादक रहे थे। 

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सुनील शाह और अमर उजाला : दोनों मेड फॉर ईच अदर थे…

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तुम्हें विदा करते हुए बहुत उदास हूँ सुनील…

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Newspapers readership IRS 2014 Download

Download Topline Newspapers Readership numbers… देश के बड़े अखबारों, मैग्जीनों आदि की लैटेस्ट या बीते वर्षों की प्रसार संख्या जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों या लिंक्स पर क्लिक करें…

IRS 2014 Topline Findings
https://bhadas4media.com/pdf/irs2014.pdf

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IRS 2013 Topline Findings
https://bhadas4media.com/pdf/irs2013.pdf

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IRS 2012 Q4 Topline Findings
https://bhadas4media.com/pdf/irs2014q4.pdf


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कई दिन चुप्पी साधे रहे जागरण और अमर उजाला का आज एक साथ आईआरएस रिपोर्ट पर अटैक, निशाने पर ‘हिंदुस्तान’

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रीडर सर्वे : जागरण, हिंदुस्तान, भास्कर की शीर्ष अग्रता बरकरार, पत्रिका चौथे, अमर उजाला पांचवें पायदान पर

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अमर उजाला ने लखनऊ में दैनिक जागरण को पटका, बना नंबर वन

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हिंदुस्‍तान ने लिखा – बड़े अखबारों का विरोध बेकार, इंडियन रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट सही

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दस-दस हजार रुपये लेकर अमर उजाला और दैनिक जागरण के रिपोर्टरों ने छपवाई झूठी खबर!

एटा (उ.प्र.) : जिले के मिरहची थाना क्षेत्र के गाँव जिन्हैरा में 70 वर्षीय एक व्यक्ति की बीमारी के चलते स्वाभाविक मौत हो गई, लेकिन अमर उजाला और दैनिक जागरण ने तो कमाल ही कर दिया। स्वाभाविक मौत को मौसम के पलटवार से फसल बर्बाद होने के सदमे से किसान की मौत होना दर्शा दिया। ऐसा करना उनकी कोई मजबूरी नहीं थी बल्कि इस तरह से खबर प्रकाशित करने के एवज में दस-दस हज़ार रुपये मिले थे। धिक्कार है, ऐसी पत्रकारिता पर! मीडिया पर कलंक हैं ऐसे पत्रकार!

जिन्हेरा निवासी श्रीकृष्ण की विगत दिवस स्वाभाविक मृत्यु हो गई। स्वाभाविक मौत समाचार नहीं होती लेकिन कुछ पत्रकार मौके की तलाश में रहते हैं कि कुछ ऐसा हो, जो उनकी कमाई का ज़रिया बने। यहाँ कुछ इसी तरह पत्रकारों की दाल रोटी चल रही है। मौसम के पलटवार से किसानों की फसलों को काफी नुकसान हुआ और सरकार ने पीड़ित किसानों को मुआवजे की घोषणा की। इसी मौके का फायदा मिरहची के अमर उजाला पत्रकार चौधरी नेत्रपाल सिंह और दैनिक जागरण के पत्रकार कुलदीप माहेश्वरी ने उठाया। किसान की स्वाभाविक मौत को फसल बर्बाद होने का सदमा बता दिया। 

दोनों अख़बारों में कुछ इस तरह खबर प्रकाशित हुई है- श्रीकृष्ण ने 30 बीघे जमीन पट्टे पर लेकर फसल बोई और बेमौसम बारिश ने पूरी फसल बर्बाद कर दी। फसल बोने के लिए श्रीकृष्ण ने साहूकारों से तकरीबन 5 लाख रुपये कर्जा लिया था। बारिश से फसल बर्बाद होने का सदमा किसान बर्दाश्त नहीं कर सका और हृदयाघात से किसान की मौत हो गई। 

दोनों पत्रकारों ने ये खबर जंगल में आग की तरह फैला दी और समाचार प्रकाशित कर पत्रकारों ने सरकार से मुआवजे की मांग को बुलंद किया। प्रशासनिक अधिकारियों को जब इसकी जानकारी हुई तो उपजिलाधिकारी अजीत कुमार ने जांच के आदेश दे दिए।

ऐसा नहीं है कि क्षेत्र में कोई घटना घटे और अन्य पत्रकारों को पता न चले। हिंदुस्तान अख़बार के पत्रकार सोमेन्द्र गुप्ता को भी सूचना मिली कि जिन्हेरा गांव में एक किसान की फसल बर्बाद होने के सदमे से मौत हो गई है। वह मौके पर पहुंचे लेकिन तब तक मृतक के शव का अंतिम संस्कार किया जा चुका था। मृतक के परिज़नों से बातचीत करने के बाद हिंदुस्तान रिपोर्टर ने ग्रामीणों से बातचीत की तो पता चला श्रीकृष्ण की तो स्वाभाविक मौत हुई है। मृतक के पास कोई ज़मीन है ही नहीं और न उसने कोई ज़मीन पट्टे पर ली है। इतना ही नहीं, उसने किसी से कर्जा भी नहीं लिया हैं। इससे ज़ाहिर है कि अमर उजाला और दैनिक जागरण के रिपोर्टरों के बीच खिचड़ी जरूर पकी होगी। तभी दोनों ने अपने अखबारों में एक जैसे समाचार प्रकाशित करा लिए।

मिली जानकारी के मुताबिक मृतक श्रीकृष्ण के छोटे भाई सुरेन्द्र ने झूठी खबर प्रकाशित कराने के एवज में दोनों पत्रकारों को दस-दस हज़ार रूपये दिए हैं क्योंकि बेमौसम बारिश से सुरेन्द्र की फसल बर्बाद हुई है और वो सरकार से मुआवजा चाहता था। इसलिए पत्रकारों ने श्रीकृष्ण की स्वाभाविक मौत को सदमे की मौत का समाचार बनाकर पाठकों को परोस दिया। इतना ही नहीं प्रशासनिक अधिकारियों को भी गुमराह किया। अगर इसी तरह अख़बारों में बेबुनियादी समाचार प्रकाशित होते रहे तो कौन पत्रकारिता पर भरोसा करेगा। पाठकों की नज़र में पत्रकारिता की क्या छवि होगी। क्या झूठे समाचारों से संस्थान की छवि धूमिल नहीं हो रही है। तथाकथित पत्रकार चंद रुपये के लालच में पत्रकारिता पर कलंक लगा रहे हैं। ऐसे पत्रकारों का बहिष्कार होना चाहिए।

लेखक अमन पठान जिला एटा के निवासी हैं. उनसे संपर्क 09456925100 के जरिए किया जा सकता है.

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अमर उजाला के पीटीएस विभाग पर वज्रपात, दूर तबादला करके मशीन विभाग में काम करने को मजबूर किया

अमर उजाला के पीटीएस विभाग के कर्मचारियों की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं लेती। अगर एक खत्म हो तो दूसरी मुश्किल सामने ही खड़ी होती है। कुछ महीने पहले ही अमर उजाला में पीटीएस विभाग खत्म करने का निर्देश जारी किया गया था। उसके बाद से ही अमर उजाला के हर यूनिट से पीटीएस में कांट्रैक्ट पर रखे सभी कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कुछ पीटीएस कर्मचारियों को बिना कारण नोएडा ऑफिस बुलाकर इस्तीफा मांग लिया गया। जब किसी कर्मी ने इस्तीफा नहीं दिया तो उन सभी कर्मचारियों का ट्रांसफर कर दिया गया। बात यहीं खत्म नहीं होती। कुछ पीटीएस कर्मचारियों का ट्रांसफर बरेली से रोहतक यूनिट के मशीन में कर दिया गया।

अब सोचने वाली बात यह है कि जिन लोगों ने साक्षात्कार (इंटरव्यू) पेज व ऐड बनाने का दिया था वो मशीन में कैसे काम कर सकते हैं। पर इससे मालिक लोगों का कोई लेना-देना नहीं। उन्हें तो सिर्फ पीटीएस विभाग के कर्मियों को परेशान कर संस्‍थान से बाहर निकालना है। मजीठिया वेतनमान लागू करने का दिखावा करने वाले अमर उजाला ने मजीठिया वेतनमान से पीटीएस विभाग के कर्मियों को कोसों दूर रखा। मजीठिया वेतनमान देने के नाम पर संस्‍थान ने पीटीएस के किसी भी कर्मी को 250 रुपये से लेकर 1200 रुपये से ज्यादा का लाभ नहीं दिया।

इस विभाग में कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अमर उजाला के एमडी रहे स्व. श्री अतुल महेश्‍वरी जी के सा‌थ काम किया है। पीटीएस विभाग में वो लोग भी शामिल हैं जिन्होंने संस्‍थान में अपने जीवन का मूल्यवान समय झोंक दिया और आज उन्हें ही ओछी नजरों से देखा जा रहा है। आज उनका ही स्‍थानांतरण कर मशीन में काम करने को कहा जा रहा है। 10 मार्च को चंडीगढ़ यूनिट से पीटीएस विभाग के इंचार्ज प्रेम प्रकाश शर्मा का स्‍थानतरण यूपी के गोरखपुर अमर उजाला के मशीन में कर दिया गया। संस्‍थान पीटीएस विभाग समाप्त करने के मकसद से अब सभी पीटीएस कर्मचारियों को यूनिट के संपादकों के अधीन कर दिया है। पहले यह प्रोडेक्शन मैनेज़र के अधीन काम करते थे। पीटीएस विभाग का शोषण अमर उजाला में हमेशा होता रहता है। कभी मालिक के लोगों द्वारा तो कभी उच्च पद पर बैठे अधिकारियों द्वारा। यहां तक कि संपादकीय विभाग में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो पीटीएस विभाग के कर्मचारियों को नीचा दिखाने और उनकी शिकायत अधिकारियों से करने से परहेज नहीं करते।

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महिला अफसर के यौन शोषण का प्रयास, आरोपी अधिकारी का तरफदार बना अमर उजाला

बुलंदशहर (उ.प्र.) : ‘अमर उजाला’ एक ओर जहां बेटियों को बचाने की आवाज उठा रहा है, वहीं बुलंदशहर में उसने यौन उत्पीड़न की शिकार एक महिला को दोषी ठहराते हुए अफसर को क्लीन चिट दे दी है. इस वाकये से अखबार की पूरे जिले में खूब किरकिरी हो रही है.

घटनाक्रम इस प्रकार है – नॉएडा की एक महिला जिला पंचायती राज विभाग में बड़े पद पर तैनात थीं. उन्होंने एक अधिकारी पर यौन शोषण के प्रयास के आरोप लगाए. साक्ष्य जुटाने के लिए महिला ने डीपीआरओ दफ्तर में ख़ुफ़िया कैमरा लगवा लिया. इसके बाद तो तमाम आरोप जड़ते हुए उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. मामले की जाँच खुद सीडीओ कर रहे हैं. हिंदुस्तान और दैनिक जागरण ने जहां पीड़िता की खबर को लगातार दो दिनों तक प्रमुखता से छापा. वहीं अमर उजाला ने पहले दिन आरोपी अफसर के खिलाफ एक शब्द तक नहीं लिखा और दूसरे दिन उसी अधिकारी का महिमा मंडन करते हुए पीड़िता को ही उल्टे दोषी ठहरा दिया। 

खबर प्रकाशित करने से पूर्व अमर उजाला ने पीड़िता का पक्ष जानना भी उचित नहीं समझा. बताया जा रहा है की खबर की एवज में उस अधिकारी ने पत्रकार को लाभान्वित किया है। ये रिपोर्टर पहले भी शौचालय घोटाले में आरोपी अफसर पर काफी रहम खा चुका है. पंद्रह दिन तक लगातार जागरण, हिंदुस्तान ने तब भी उसके घोटालों का खुलासा किया था लेकिन अमर उजाला ने मामले का चटपट पटाक्षेप कर दिया था. 

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अमर उजाला को चाहिए ब्राह्मण पत्रकार

उत्तर प्रदेश : सुलतानपुर में अमर उजाला लांच होने पर रमाकांत तिवारी को ब्यूरो चीफ बनाया गया था। इनके कार्यकाल के दौरान से रिपोर्टर व कैमरामैन पदों पर ब्राह्मण बिरादरी के लोग तलाशे जा रहे हैं। इधर बीच कानाफूसी कर ब्यूरो चीफ ने होनहार कैमरामैन पंकज गुप्ता की छुट्टी करवा दी। इसके बाद चर्चाओं का बाजार गर्म है। अमर उजाला लांच के समय यानि सात साल पहले पंकज गुप्ता को सुलतानपुर में कैमरामैन पद पर नियुक्त किया गया था। अपने अच्छे काम के चलते पंकज ने चंद दिनों में ही अमर उजाला को एक नया मुकाम दिला दिया, लेकिन यहां के ब्यूरो चीफ शायद ब्राह्मण को ही ज्यादा पसंद करते हैं।

अमर उजाला आफिस में 11 लोगों की नियुक्ति है, जिसमें सभी रिपोर्टर ब्राह्मण हैं। शेष दो विनय सिंह और अमर बहादुर हैं जिनमें एक प्रसार देखते हैं और दूसरे विज्ञापन। एक हफ्ता पहले जब ब्यूरो चीफ को ब्राह्मण कैमरामैन मिल गया तो पंकज गुप्ता के खिलाफ झूठी शिकायत कर उन्हें हटवा दिया गया। सूत्रों का कहना है कि ब्यूरो चीफ अपने बिरादरी के हर रिपोर्टर का गलत सही कामों में सहयोग करते हैं। लोेकसभा चुनाव के दौरान तो इन पर कई आरोप लगे थे। ऐसे ही एक मामले में पूर्व मंत्री अमिता सिंह ने दफ्तर पहुंचकर इन्हें खरी-खोटी सुनाई थी। पंकज गुप्ता को हटाए जाने के बाद अब रमाकांत तिवारी ने विजय तिवारी को अपना कैमरामैन नियुक्त करवा लिया है।

 

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मजीठिया वेज बोर्ड संघर्ष : अमर उजाला को जवाब दायर करने का अब आखिरी मौका, भारत सरकार भी पार्टी

अमर उजाला हिमाचल से खबर है कि यहां से मजीठिया वेज बोर्ड के लिए लड़ाई लड़ रहे प्रदेश के एकमात्र पत्रकार को सब्र का फल मिलता दिख रहा है। अमर उजाला के पत्रकार रविंद्र अग्रवाल की अगस्त 2014 की याचिका पर सात माह से जवाब के लिए समय मांग रहे अमर उजाला प्रबंधन को इस बार 25 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आखिरी बार दस दिन में जवाब देने का समय दिया है। अबकी बार कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि अगर इस बार जवाब न मिला तो अमर उजाला प्रबंधन जवाब दायर करने का हक खो देगा और कोर्ट एकतरफा कार्रवाई करेगा।

ज्ञात रहे कि इस मामले में प्रथम पार्टी भारत सरकार को बनाया गया है। केंद्रीय श्रम मंत्रालय की ओर से कोर्ट में जवाब दायर किया जा चुका है। मामले की दूसरी पार्टी अमर उजाला के प्रबंध निदेशक हैं। उनकी ओर से सात माह में जवाब दायर नहीं किया जा सका है। हर बार कोर्ट से समय लिया जाता रहा है। इस बीच रविंद्र की ओर से अमर उजाला प्रबंधन द्वारा चार्जशीट करके वेतन बंद किए जाने की शिकायत भी कोर्ट में कर दी गई थी। इस संबंध में जनवरी माह में अर्जी दाखिल हुई थी।

इस पर भी कोर्ट ने प्रबंधन से 11 मार्च से पहले जवाब-तलब किया है। इस मामले की तीसरी पार्टी श्रम विभाग हिमाचल प्रदेश को बनाया गया है, जिस पर वेज बोर्ड लागू करवाने का जि मा है। विभाग की ओर से सबसे पहले कोर्ट में गोलमोल जवाब दायर किया गया था। इसके बाद से विभाग हरकत में आ गया और सभी समाचार पत्रों के प्रबंधकों से वेज बोर्ड को लेकर जानकारी मांगी जाने लगी है। हालांकि फिलहाल सब कार्रवाई खानापूर्ति ही मानी जा रही है। हिमाचल प्रदेश में किसी भी अखबार ने मजीठिया वेज बोर्ड नहीं दिया है। इसके इतर अमर उजाला व जागरण प्रबंधन ने श्रम विभाग को दी जानकारी में तो दावा किया है कि वे वेज बोर्ड दे रहे हैं।

ज्ञात रहे कि अमर उजाला प्रबंधन के खिलाफ रविंद्र अग्रवाल ने लेबर आफिसर से भी अगस्त माह में ही शिकायत कर रखी है। पहले तो लेबर विभाग कार्रवाई की खानापूर्ति करता रहा। अब कोर्ट की सख्ती के डर से कार्रवाई में कुछ तेजी लाई है, मगर यह तेजी भी जानकारी के आभाव में प्रभावी नहीं साबित हो पा रही है। पिछले दिनों 20 फरवरी को लेबर आफिसर के यहां वेज बोर्ड के तहत एरियर व रोके गए वेतन की रिकवरी की तारीख रखी गई थी। इसके लिए नोएडा से खासतौर पर लीगल एक्सर्ट को भेजा गया था। लेबर आफिसर को मुहैया करवाए गए दस्तावेजों के जरिये अमर उजाला ने दावा किया है कि अखबार तो वेज बोर्ड दे रहा है। जब पूछा गया कि किस आधार पर तो बताया गया कि यूनिटें अलग करके।

इसके पीछे अमर उजाला इंडियन एक्सप्रेस बनाम भारत सरकार के 1995 में आए एक निर्णय व वेज बोर्ड की नोटिफिकेशन की सेक्शन दो के पैरा 3 में समाचार पत्रों की क्लासीफिकेशन के क्लास ए में विभिन्न विभागों ब्रांचों व सेंटरों को क्लब करने को लेकर दिए गए फार्मूले को आधार बताया गया। वहीं माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फरवरी 2014 के निर्णय की अनदेखी गई गई। माननीय न्यायालय की जजमेंट के पैरा 54 से लेकर पैरा 59 तक एक समाचार पत्र की सभी यूनिटों की आय को ही वेज बोर्ड लागू करने का आधार माना गया है। इनमें साफ लिया गया है कि एक समाचार पत्र की सकल आय को वेज बोर्ड लागू करने का आधार बनाना कानूनसंगत है। इसमें उस इंडियनएक्सप्रेस मामले का भी जीक्र किया गया है, जिसमें यूनिटों को अलग करने को लेकर व्यवस्था दी गई थी, मगर इस निर्णय में यह भी कहा गया था कि आल इंडिया आधार पर समाचार पत्र की आय को वेज बोर्ड का आधार बनाना किसी संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है। साथ ही इसे नोट बैड इन ला कहा गया था। हालांकि यह फैसला तब के वेज बोर्ड को लेकर था और मौजूदा वेज बोर्ड को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय का नया फैसला आ चुका है, मगर अखबार प्रबंधन कर्मचारियों को उनका हक देने से बचने के लिए कई तरह के कानूनी हथकंडे आजमाने की जुगत भिड़ा रहे हैं।

इसके अलावा अमर उजाला ने वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट में न्यूजपेपर एस्टेबलिशमेंट की परिभाषा व इसकी सेक्शन 2डी से जुड़े शेड्यूल को भी ताक पर रखा है। अमर उजाला अपने प्रकाशन केंद्रों को अलग-अलग यूनिटें बनाकर वेज बोर्ड के भार से बचना चाह रहा है। जबकि यही प्रबंधन अपने कर्मचारियों को एक यूनिट से दूसरी यूनिट में ट्रांस्फर कर रहा है। अब सवाल यह उठता है कि अगर अमर उजाला प्रबंधन दूध से धुला है तो वह हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में अपना जवाब दायर करने से क्यों बचता आ रहा है। अब अमर उजाला को कौन समझाए कि अगर मजीठिया वेज बोर्ड से इसी तरह बचा जा सकता तो दैनिक जागरण, भास्कर, हिंदोस्तान व अन्य अखबार भी ऐसा ही कर सकते थे।

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