नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार और यूट्यूबर अभिसार शर्मा को असम पुलिस की FIR से तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया है। हालांकि कोर्ट ने उन्हें चार हफ्तों की अंतरिम सुरक्षा दी है ताकि इस अवधि में वे गुवाहाटी हाईकोर्ट में अपनी अर्जी दाखिल कर सकें।
शर्मा के खिलाफ असम पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152, 196 और 197 के तहत मामला दर्ज किया है। आरोप है कि उनके वीडियो से सांप्रदायिक तनाव भड़क सकता है और राज्य सरकार पर अविश्वास बढ़ा है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि शर्मा को पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा। हालांकि कोर्ट ने उनके इस तर्क पर नोटिस जारी किया है कि BNS की धारा 152 असंवैधानिक है, और इस मामले को समान याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है।
अदालती कार्रवाई कवर करने वाली वेबसाइट लाइव लॉ के अनुसार, सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने शर्मा की ओर से दलील दी कि इस धारा का इस्तेमाल मनमाने तरीके से पत्रकारों और आलोचकों के खिलाफ किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में द वायर के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और करण थापर को इसी तरह के मामले में गिरफ्तारी से राहत दी थी, इसलिए शर्मा को भी समान सुरक्षा मिलनी चाहिए।
विवाद की पृष्ठभूमि
शर्मा ने अपने वीडियो में असम सरकार पर आरोप लगाया था कि उसने दीमा हसाओ क्षेत्र में महाबल सीमेंट्स को 3000 बीघा भूमि और अडानी समूह को 9000 बीघा भूमि आवंटित की। उन्होंने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर भी “सांप्रदायिक राजनीति” और उद्योगपतियों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया था।
इन बयानों को लेकर शिकायतकर्ता आलोक बरुआ ने FIR दर्ज कराई। उनका कहना है कि शर्मा की टिप्पणी से सांप्रदायिक भावना भड़क सकती है और सरकारी अधिकारियों की छवि खराब होती है।
आगे की राह
अब शर्मा को अपनी याचिका लेकर गुवाहाटी हाईकोर्ट जाना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि FIR को चुनौती देने की प्राथमिक जिम्मेदारी हाईकोर्ट की है, जबकि BNS की धारा 152 की संवैधानिकता पर सुनवाई पहले से सुप्रीम कोर्ट में जारी रहेगी।
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Tc Tyyy
August 29, 2025 at 8:14 pm
Good news bahut jayada udraha tha