समीर शाही-
विनम्र श्रद्धांजलि — अभिषेक मालवीय को भावभीनी यादें!
भगवान, ये क्या हो गया… काश ये खबर झूठी होती।
लेकिन सच ने आज दिल तोड़ दिया। हमारे प्रिय मित्र, पड़ोसी और स्नेही भाई अभिषेक मालवीय अब हमारे बीच नहीं रहे।
दो दशक पहले की वो यादें आज भी आँखों में तैर रही हैं, जब हम पत्रकारिता के शुरुआती सफर में थे और अभिषेक अध्ययन में जुटे रहते थे। सुबह-शाम मुलाकात होती तो वही मुस्कान, वही अपनापन—“भैया, आज क्या लिखेंगे?” कहकर ढेरों बातें करना। पत्रकारिता में रुचि की बात पर उनका हँसना आज भी कानों में गूंजता है।
मुलाकातें भले कम रहीं, लेकिन हर मुलाकात दिल को सुकून दे जाती थी। कौन जानता था कि इतनी जल्दी आप हमसे विदा ले लेंगे। अमेठी, सुल्तानपुर और अंबेडकर नगर में दैनिक जागरण के इंचार्ज रहे अभिषेक वर्तमान में अयोध्या में कार्यरत थे। बीमारी से संघर्ष करते हुए उन्होंने लखनऊ के मेदांता अस्पताल में अंतिम सांस ली।

ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोकसंतप्त परिवार को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें। आप हमेशा हमारी यादों में जीवित रहेंगे, मित्र।
भावभीनी श्रद्धांजलि।
समीर शाही
अनूप श्रीवास्तव-
हे भगवान ये क्या हो गया। काश ये खबर झूठी हो…
नहीं रहे अभिषेक मालवीय…
मुलाकात तो कम ही होती थी मित्र आपसे। लेकिन जब भी मिलते तो दिल खुश हो जाता था। पुरानी यादें ताजा हो जाती थी। लेकिन क्या पता था इतनी जल्दी चले जाओगे भाई। फिलहाल क्या लिखूं, ईश्वर आपको अपने चरणों में स्थान दें और परिवार को इस कठिन समय से उबरने का साहस प्रदान करें।
अमेठी, सुल्तानपुर,अम्बेडकर नगर में दैनिक जागरण के इंचार्ज रह चुके अभिषेक मालवीय वर्तमान में अपने गृह जनपद अयोध्या में दैनिक जागरण में कार्यरत थे। बताया जा रहा है कि उन्होंने अंबेडकर नगर में हर्निया का ऑपरेशन करवाया था, जिसके बाद उनके शरीर में इन्फेक्शन फैल गया। कल शाम उन्हें लखनऊ मेदांता हॉस्पिटल में वेंटिलेटर पर रखा गया था, आज शाम उन्होंने हम सबको अलविदा कह दिया। विनम्र श्रद्धांजलि मित्र
रसिक द्विवेदी-
अभिषेक क्या लिखूं… शब्द कहां से लाऊं। बेचैन मन को कैसे समझाऊं। कैसे कहूं कि तुमने सबको छोड़ दिया। काल क्रूर होता है, नियति निष्ठुर…यही मान कर न जाने कितने लोग जो तुम्हें जानते-मानते हैं वह दुख का बोझ सह लेंगे। लेकिन, तुम्हारा परिवार कैसे सदमा बर्दाश्त कर सकेगा…यह सोच कर सिहरन होती है।

पत्रकारिता की इस छोटी सी दुनिया में तुम बहुतों के दिलों में स्थान रखते थे। किसी भी सीनियर के फोन पर जी सर, के सिवा दूसरा कोई शब्द तो मैंने सुना ही नहीं। चिरंजीवी मुस्कुराहट से सबका सान्निध्य पाने की तुम्हारी अदा लोग कैसे भूल पाएंगे।
मन व्यथित है, शब्द नेपथ्य में चले से गए हैं। बस तुम्हारा चेहरा आंखों में सामने आ जाता है। हे, ईश्वर अगर यही आपकी रचना है तो हम सब बेबस हैं उसके आगे। अभिषेक भाई…आपको ईश्वर सद्गति दें, अपने चरणों में स्थान दें यही प्रार्थना है। विनम्र श्रद्धांजलि


