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सुख-दुख

90 के अच्युता जी ऐसे संपादक रहे जो न अड़े, न लड़े, पर झुके भी नहीं!

गोविंद सिंह-

नवभारत टाइम्स के दिनों के अग्रज अच्युता जी कल अर्थात दो दिसंबर को नब्बे वर्ष के हो गए। इस अवसर पर डॉ मनीष शुक्ल के संपादन में ‘अच्युतानंद मिश्र: समावेशी शब्दसाधक’ नाम से एक पुस्तक का लोकार्पण इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में हुआ। बड़ी संख्या में नए पुराने लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी जुटे।

अध्यक्षता कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने की। भोपाल से हिंदी व्रती कैलाश चंद्र पंत, विजय दत्त श्रीधर, वाराणसी से चंद्रकला त्रिपाठी, वर्धा से कृपाशंकर चौबे तथा कला केंद्र के सचिव सच्चिदानंद जोशी मंच पर थे।

अच्युता जी ने अमर उजाला, नव भारत टाइम्स और जनसत्ता में पत्रकारिता की। साथ ही माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति भी रहे। वे सचमुच सबको साथ लेकर चलने वाले संपादक रहे। लोग उन्हें एक अत्यधिक मददगार अग्रज के रूप में जानते हैं।

कोविड के दौर में उन्हें बहुत नुकसान झेलना पड़ा। जीवन के इस पड़ाव में अच्युता जी को बहुत बहुत शुभकामनाएं। जीवेम शरद शतम!


हेमंत शर्मा-

हम सबके प्रिय वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र कल नब्बे साल के हो गए। कल ही इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में उन पर एक किताब भी लोकार्पित हुई। किताब में मेरा लेख।

नब्बे के अच्युता जी।

अच्युता जी अजातशत्रु हैं. आप उनसे किसी के प्रति कटुता का आभास भी नहीं पा सकते. वे सबके मित्र हैं. सब उनके मित्र हैं. निष्पक्ष और बेबाक. पत्रकारिता के लिए यह स्वभाव, सहज और उपयोगी नहीं होता. पर संपादक के तौर पर उनकी यही पूंजी रही जिसे उन्होंने जीवनभर जीया, निभाया. संपादक का स्वाभिमान, सहयोगियों को स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की आजादी के जो अधिकार प्रभाष जी ने जनसत्ता कुटुंब को दिए थे, अच्युता जी उसके संशोधित संवाहक थे. जिंदादिल, जागरूक और तेज नजर वाले संपादक. समस्याओं के प्रति उनका दृष्टिकोण हमेशा सकारात्मक रहा.

इतनी सकारात्मक और ‘मित्र वत्सलता’ कभी-कभी पत्रकारीय धर्म में रुकावट बनती है. इस कारण प्रश्न पूछने और सवाल खड़े करने की ताकत कम होती है. कुरुक्षेत्र की तरह, जहां अर्जुन को चारों तरफ अपना कुटुंब ही नजर आता है. किस पर हमला करें? सब अपने हैं. मित्र वत्सलता से यह समस्या पत्रकारिता में भी आती है. पत्रकारिता अपने जन्म से ही प्रश्नाकुल लोक का स्वभाव है. शक्ति, सत्ता और समर्थ से प्रश्न करना इसका मूल चरित्र है. यही मानवीय चेतना का मूल धर्म भी है. यह धर्म वैदिक मंत्रों से लेकर पौराणिक आख्यानों, साहित्य और पत्रकारिता तक विस्तारित है. लोकतंत्र के औपचारिक जन्म से सदियों पहले सत्ता और व्यवस्था को उसकी सीमाएं और धर्म बताने के संस्कार प्रश्नाकुल लोक के रहे हैं. चाहे वह भारत के ऋषि हों या ग्रीक दार्शनिक या कि ब्रिटेन और अमेरिका का प्रबुद्ध समाज, सचेतक वर्ग. सवाल पूछना आदिम संस्कार थे. और यही हमारी पत्रकारिता का मूल उत्स है.

जनसत्ता का प्रकाशन हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक परिघटना थी. इसे शुरू करते वक्त प्रभाष जोशी ने हमें सवाल करना सिखाया. हम जनसत्ता के लोग इसी मंत्र और संस्कार में पगे और बढ़े. अच्युता जी सत्ता, समाज में अपने मित्र वत्सलता के बावजूद इस मंत्र से संतुलन साधते रहे. संपादक न तो आंदोलनकारी हो सकता है और न साहित्यकार जैसा कल्पनालोक का जीव. उसे यथार्थ का एक पवित्र युगानुबोध साधना होता है. जो बेहद कठिन है. अच्युता जी ने इसे विभिन्न भूमिकाओं में कुशलता से साधा. जो सीखने लायक है. मैंने इस मुद्दे पर बड़े-बड़े संपादकों को संतुलन गंवाते हुए देखा है.

पत्रकारिता और साहित्य दो अलग-अलग विधाएँ हैं. पर ‘जनसत्ता’ अखबार इन दोनों का ‘फ्यूजन’ था. प्रभाष जी इसके वास्तुकार थे. साहित्य, कला, संस्कृति के साथ खोज खबर/खास खबर और तीखी राजनीतिक टिप्पणियां सब एक जगह होती थी. अखबार में ऐसा पहली बार हुआ. मेरी समझ में पत्रकार और साहित्यकार में कोई खास अंतर होता नहीं है. दोनों मानव संबंधों की तलाश करते हैं. एक क्षणिक साहित्य रच रहा होता है. दूसरा चिरंतन साहित्य. बेहतर पत्रकार अपने क्षणिक साहित्य से ही कालजयी हो जाता है और कमज़ोर साहित्यकार कच्चा लिखकर चिरंतन के प्रयास को क्षणभंगुर कर देता है. पत्रकार अपने तर्क और क्रमागत तथ्यों से आपको विश्वस्त करता है. जबकि साहित्यकार उन्हीं तथ्यों का गतानुगत क्रम उलट-पलटकर उन्हें नए सिरे से क्रमबद्ध करता है. वह एक नए सत्य की सृष्टि करता है. पत्रकार के लिए यथार्थ वही है जो संभव हो चुका है. और साहित्यकार के लिए वह है जो संभव हो सकता है.

आप सोच रहे होंगे मैं अच्युता जी पर बात करने की बजाय इस बहस में क्यों उलझ गया. दरअसल साहित्यकार बनाम पत्रकार की बहस में एक तीसरा पात्र भी होता है जिसे हम ‘संपादक’ कहते हैं. जो एक तरफ तो पत्रकार को यथार्थ लिखने की ताकत देता है और दूसरी तरफ समाज में जो संभव हो सकता है उसे अपनी कलम का समर्थन देता है. इसलिए अखबारों में खबर के पन्ने बीते कल की और संपादकीय पेज आने वाले कल की बात करते हैं. अच्युता जी साहित्यकार और पत्रकार, समाचार और विचार में सामंजस्य बिठाने वाले संपादक थे.

हलांकि अब पत्रकारिता में खांटी संपादक नाम का प्राणी दुर्लभ हो चुका है. अज्ञेय , रघुवीर सहाय, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर, सुरेंद्र प्रताप सिंह जैसे संपादकों के बाद अब इस संस्था का क्षरण हो चुका है. अच्युता जी के वक्त तो यह संस्था समाप्ति की ओर थी . अखबारों में अब संपादक नहीं, समाचार प्रबंधक होते हैं. अच्युता जी संपादक, साहित्यकार और शिक्षक तीनों का समन्वय करते हैं. इसलिए वह ऐसे संपादक थे जिन्होंने पत्रकारिता के साथ-साथ नए पत्रकार भी बनाए. एक पीढ़ी गढ़ी. यह दूसरी बात है इसमें से कई कसौटी पर खरे नहीं उतरे. पर इसमें अच्युता जी क्या कर सकते हैं? मैंने अच्युता जी को रिपोर्टर और संपादक दोनों रूप में देखा है. उनका संपादकीय व्यक्तित्व बेहद सजग था. कई मयानों में साहित्यकार से ज्यादा वे युगीन यथार्थ को बटोरने, सहेजने और बांटने के सबसे जोखिम भरे उपक्रम का नेतृत्व करते हैं. मैंने अच्युता जी को अलग-अलग संस्थानों में संपादक की भूमिका में देखा है. उनकी सजगता अनुपम थी.

इस सजगता से मेरा आशय उस कीमिया से है जो एक संपादक साधता है. उसे समाज के मूल्य, संस्थान के मूल्य, पेशे के मूल्य और व्यक्तिगत जीवन के मूल्यों के बीच एक बेहद नाजुक संतुलन बनाना होता है. अच्युता जी उसमें सफल रहे हैं.

हालांकि जनसत्ता में अच्युता जी के लिए यह मुश्किल काम था. क्योंकि प्रभाष जोशी जैसे वटवृक्ष संपादक के बाद उन्होंने काम संभाला. जिसने हिन्दी पत्रकारिता, भाषा और अभिव्यक्ति की आजादी के नए प्रतिमान गढ़े थे. अच्युता जी के लिए यह बड़ा चुनौती भरा काम था. कोई भी इसमें सौ फीसद सफल नहीं हो सकता था. अच्युता जी भी नहीं हुए. पर अखबार को बचा लिया. और उन परंपराओं को बहुत हद तक चलाया भी जिसे संपादक प्रवर प्रभाष जोशी ने शुरू किया था.

आलोचक नामवर सिंह की तरह अच्युता जी भी पत्रकारिता में ‘वाचिक परम्परा’ के संपादक रहे हैं. उन्होंने लिखा कम, कहा ज्यादा है. इसलिए उनके लिखे पर विमर्श नहीं हो सकता. उन्हें आप ‘अध्यक्ष संपादक’ कह सकते हैं. गोष्ठियों की अध्यक्षता और पत्रकार संगठनों के समारोहों के वे आमरण अध्यक्ष हैं. गोष्ठी कोई हो अच्युता जी ही अध्यक्ष दिखते हैं. यह उनकी लोकप्रियता की एक मिसाल है.

अच्युता जी जिस दौर में संपादक रहे वह अखबारों में उलटफेर और संक्रमण का दौर था. अखबार को उत्पाद बताने की साजिश का दौर था. संपादक और प्रबंधन में कौन श्रेष्ठ, इस संघर्ष का दौर था. मीडिया में संपादक संस्था पर सीआईओ के अतिक्रमण का दौर था. अच्युता जी इस संक्रमण काल के संपादक थे. उन्हें इन मुद्दों से जूझना ही पड़ा होगा. इस कालखंड में मीडिया ने बदलाव के कई आयाम देखे. इसी वक्त ‘परफेक्ट लीडरशिप’ का सिद्धांत ग्लोबल कंपनियों में मैनेजमेंट की महत्ता के साथ उभरा. प्रबंधन और मशहूर लोगों की जीवन शिक्षाओं को बताने वाले प्रसिद्ध लेखक रॉबर्ट केली ने 1992 में एक किताब लिखी थी. नाम था “द पावर ऑफ फॉलोअरशिप”. इस किताब ने कंपनियों में प्रबंधको और सीईओ के काम करने का तरीका बदल दिया. इसी के बाद ‘एवरीवन इस लीडर’, ‘नेक्स्ट लाइन का लीडरशिप’ जैसे सिद्धांत सक्रिय हुए. इस सिद्धांत ने ऐसे लीडरशिप की कल्पना की है जिसमें सबसे आगे खड़ा व्यक्ति दरअसल नेपथ्य में जाकर सबकी योजनाओं को आगे करता है. उसे सफल बनाता है और स्वयं को उन सफलताओं के श्रेय से बाहर कर लेता है.

विश्वास कीजिए, संपादक होते हुए यह सबसे कठिन काम है. स्वयं को ‘अनसंग हीरो’ बना देना. परंतु अच्युता जी मेरे देखे ऐसे बिरले संपादक हैं जिन्होंने संस्थाओं को संवार-निखार कर बड़ा कर दिया. पत्रकारों की पीढ़ियों को संपादक बना दिया. परंतु स्वयं सदैव नेपथ्य में रहे. संपादक अक्सर अपने तेवर-तुर्शी के लिए विख्यात रहे हैं. हो भी क्यों न…आखिर वर्तमान के सही-गलत का पहला निर्णय तो उन्हीं को करना होता है. परंतु अच्युता जी ने यह उदाहरण नहीं बनाया. वह ऐसे संपादक है जो न अड़े, न लड़े, पर झुके भी नहीं. किसी स्थितिप्रज्ञ की तरह अपना योगदान करते हुए अपने मूल्यांकन का समय छोड़ते गए. प्रसिद्ध कवि नरेश मेहता और उनके कृतित्व से अच्युता जी का गहरा अनुराग रहा है. उनकी यह पंक्तियां अच्युता जी पर सटीक बैठती हैं- “पुत्र मेरे – देहजीवी हम नहीं दृष्टिजीवी हैं, हमारा भूगोल काटेगा नहीं इतिहास, हम तो यज्ञ हैं, यज्ञगाथा हैं, हमारी पुस्तक खुले खेतों-सी खुली है, रक्त हस्ताक्षर तुम्हारा चाहिए- तुम्हारा चाहिए”.

अच्युता जी के साथ काम करने का मुझे कोई ज्यादा अनुभव नहीं रहा है. वैसे मैं अच्युता जी के मठ का भी नहीं था. लखनऊ में पत्रकारिता में उन दिनों दो मठ थे. दोनों मठ मजबूत थे. एक एनयूजे दूसरा आईएफडब्ल्यूजे. अच्युता जी एनयूजे का नेतृत्व करते थे. मैं दोनों मठों में नहीं था. मुझे कुजात की श्रेणी में आप रख सकते हैं. डॉ. लोहिया गांधीवादियों के लिए यह शब्द प्रयोग करते थे. सरकारी, मठी और कुजात गांधीवादी. एक, वो गांधीवादी जो सरकार में चले गए. दूसरे मठी, जो गांधी संस्थाओं में काबिज रहे. तीसरे कुजात, जो दोनों में नहीं थे. कुजात होने के बावजूद मैं उनका स्नेह भाजन बना रहा. इसकी वजह शायद मेरे पिताजी थे. जिन्होंने बनारस में उन्हें पढ़ाया था.

हम प्रकृति में दो प्रकार के तत्वों से घिरे हैं. एक बहुमूल्य, दूसरा अमूल्य. बहुमूल्य शब्द अर्थशास्त्र से आता है. वह वस्तुएं जो कम है उनकी कीमत अधिक है. यह आवश्यक नहीं है कि वह वस्तुएं सबके लिए जरूरी हो. ऐसा भी नहीं कि इनके बिना काम नहीं चल सकता. लेकिन जो बहुमूल्य है वह कम है इसलिए उसकी गुणवत्ता पर हजार पारखी नजरें होती हैं. अमूल्य वह है जो सबको चाहिए और जिसका कोई विकल्प नहीं है. प्रकृति में नियमत: ऐसे सभी तत्व बहुततायत हैं. लेकिन उनका विकल्प नहीं है, जैसे हवा, पानी, आकाश आदि. इनका कोई मूल्य नहीं. अमूल्य है क्योंकि इनके बिना जीवन नहीं हो सकता. मैं पत्रकारिता को ऐसे ही अमूल्य वर्ग का तत्व मानता हूँ. बिल्कुल प्राण वायु जैसा. यह जरूरी नहीं कि जो वायु है उसका तापमान कैसा है? उसका परिवेश कैसा है? इसके आधार पर वायु की गुणवत्ता तय होती हो.

पत्रकारों की दुविधा होती है कि वह अक्सर यह तय नहीं कर पाते कि उन्हें सामान्य रूप से सूचना देनी चाहिए अर्थात केवल वायु का सामान्य धर्म निभाना चाहिए. या पत्रकारिता को वायु की गुणवत्ता मापक यंत्र की भूमिका भी निभानी चाहिए. इस बहस में आप किसी भी तरफ जा सकते हैं या दोनों भूमिकाएं अपना सकते हैं. क्योंकि ऐसा नहीं है कि समाज को एक ही तरह से हमेशा जीना है. जल के सैंकड़ों प्रयोग हैं. वायु के असंख्य उपयोग हैं.

बेहद गहरे संदर्भों में प्रकृति की सभी अमूल्य शक्तियां या तत्व सोद्देश्य ही होते हैं. मनुष्य अपने विकास क्रम में इन शक्तियों के उद्देश्य समझता गया और आधुनिक होता गया. जैसे जल के असंख्य उपयोग, पेयजल से लेकर बिजली तक या कि वायु प्राण से लेकर आकाश में उड़ान तक. समय ही किसी समाज के लिए आदर्श और उद्देश्य बदलता है. और इनकी प्राप्ति के लिए पत्रकारिता आवश्यक है. समाज अक्सर पत्रकारिता को पक्ष और निष्पक्ष, विचारपरक और निरपेक्ष, सकारात्मक और नकारात्मक, आक्रामक और समन्वयक में बांटता है. और खूबी देखिए यह वायु या जल की तरह उन आकारों में बैठती नजर भी आती है. लेकिन इससे इसकी मूल ऊर्जा नहीं बदलती.

पत्रकारिता अपने चिरंतन मूल्यों में बुद्धिमान समाज की सबसे उद्देश्यपरक शक्ति है. अच्युता जी इसे पहचानते थे. भारत में पत्रकारिता कभी अंग्रेजों की शक्ति के विरुद्ध लड़ती थी तो कभी उसने आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष किया. कभी वह शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के स्वर गुंजाती है. कभी वह किसी विचार का प्रसार करती है तो कभी किसी विचार का निषेध भी. यही तो उन्नत होते लोकतांत्रिक समाज का प्राण है. बस यह प्राणवायु रुकनी नहीं चाहिए.

पत्रकारिता कला विलास का या मनोरंजन नहीं है. ध्यान रखें कि पत्रकारिता में अपने परिवेश की गंध या दुर्गंध होगी ही. लेकिन वायु की दुर्गंध को हटाने के लिए भी हमें इसी प्राण वायु की आवश्यकता है. आदर्श, व्यवस्था और प्रेरणा की धूपबत्तियां इसी वायु की पीठ पर सवार होकर परिवेश को पवित्र और गंधमय कर पाएंगी. अच्युता जी के जीवन को समझने के लिए हमें इस पर गौर करना होगा. किसी व्यक्ति की सफलता है या असफलता काल तय करता है. पर जीवन की सार्थकता व्यक्ति खुद तय करता है. अच्युता जी ने एक सार्थक जीवन जीया. अब वे सक्रिय नहीं है. पर वे हमारा मार्गदर्शन करते रहें, ऐसी ईश्वर से कामना है.

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