प्रवीण झा-
आज नॉर्वे में अखबार का संपादकीय भारत पर आधारित है। एक पत्रकार AI सम्मेलन से लौटे हैं, और उन्होंने अपने अनुभव कुछ यूँ साझा किए हैं। जाहिर है, उनकी सोच एक नॉर्वे-वासी की दृष्टि से है, लेकिन पढ़ा जाए
चींटी के ढेर पर पैर रखना
क्या होगा जब लाखों भारतीय जो तीन-पहिया टेम्पू से यात्रियों को ढोकर जीविका चलाते हैं, उन्हें एयर-कंडीशन कारों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़े?
पिछले सप्ताह मैंने एक बिल्कुल अलग दुनिया का दौरा किया। मैं काम के सिलसिले में नई दिल्ली में था। हमेशा की तरह, शहर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाना था, तो टैक्सी से जाना स्वाभाविक था। एक वातानुकूलित टैक्सी। यह एक गरम देश है। वातानुकूलित कार एक शीशों में बंद, छोटी-सी दुनिया की तरह महसूस होती है। बाहर चाहे जैसा भी मौसम हो, अंदर ठंडा और आरामदायक। दिल्ली में काम के लिए आने वाले अधिकांश मेरे जैसे लोग यही चुनते हैं।
लेकिन सड़कों पर उस दिन सामान्य से भी अधिक भीड़ थी। सम्मेलन आयोजक ने कुछ हद तक खुद को दोषी ठहराया। पुलिस ने सड़कों पर गाड़ियों को घटाने के लिए कुछ रास्ते बंद कर दिए। मैंने सोचा कि इससे बेहतर टहल ही लिया जाए।
नई दिल्ली में सुबह की भीड़ के बीच चलना एक रोचक अनुभव है। जीवन तेज है, गंध और शोर-शराबा भरपूर हैं। ख़ास कर उनके लिए जो ढीले-ढाले छोटे से नॉर्वेजियन शहर के जीवन के आदी हैं।
सम्मेलन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बारे में था। मैं उसके बारे में आगे लिखूँगा। जब हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बात करते हैं तो हम अक्सर भविष्य की कल्पना करते हैं। लेकिन यहाँ खड़े होकर लगा कि भविष्य तो पहले ही आ चुका है।
देश पहले ही बदल चुका है। 22 वर्ष पहले भारत एक बिल्कुल अलग देश था।
आइए सड़कों से शुरू करें। हर दिशा में ठसाठस भरा हुआ है, और वाहनों का घनत्व लगातार बदल रहा है। लगभग हर चीज़ का अपना प्रवाह है। मेरा मानना है कि अब बसें बिजली से चलनी चाहिए। निजी कारें भी बैटरी पर चल सकती हैं। अच्छी वायु-गुणवत्ता पर ध्यान देने की ज़रूरत है।
संस्कृति बदल चुकी है। 22 वर्ष पहले मैंने भारत के अंग्रेज़ी अख़बार में “PDA” शब्द के बारे में पढ़ा था। मुझे लगा कि Personal digital assistant होगा, लेकिन भारत में इसका अर्थ “Public Display of Affection” था। इसका मतलब था कि युवक-युवती हाथ में हाथ डाले चलें, गले मिलें या चूमें। ऐसी बहसें अब भारत में देखने को नहीं मिलती। अब यह यहाँ स्वाभाविक है। युवा उन्मुक्त हैं, उनके हाथों में स्मार्टफ़ोन हैं।
पहले युवतियाँ पारंपरिक कपड़े पहनती थी (या पूरी तरह ढकी हुई होती थी)। बड़े, झूलते, चमकीले सोने के कानों के झुमके, हर इंच ढका हुआ। यह एक समय का संकेत था जब सुपारी और तंबाकू चबाना सामान्य था। जैसे ओस्लो के उपनगरों में धूम्रपान से पहले और बाद जैसा अंतर।
यह क्रांति केवल एक किस्सा नहीं है। यह यहाँ के लोगों के जीवन का हिस्सा है। संस्कृति बदलना आसान नहीं है, लेकिन यहाँ यह हुआ है।
आईटी उद्योग दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में से एक है। सैकड़ों-हज़ारों लोगों को अपनी पहली स्थायी नौकरी इसी उद्योग से मिली है। एक मध्यवर्ग विकसित हुआ है, जो उपभोग कर सकता है। यह एक विशाल छलांग है। अब लोग स्मार्टफ़ोन से भुगतान करते हैं। परंपराओं को चुनौती दी जा रही हैं। महत्वाकांक्षाएँ विशाल हैं।
यह स्पष्ट है कि भारत तरक्की कर रहा है। अब केवल सरल आईटी सेवाएँ नहीं, बल्कि उन्नत तकनीकी सेवाएँ, यहाँ तक कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी भारत में आ गयी हैं। जो प्रगतिशील विचार पहले से घूम रहे थे, उन्होंने नई दिशा ली है। जिन लोगों से मैं मिला, उनमें से हज़ारों की नौकरियाँ बदल गई हैं। सड़क पर भारी दबाव है। बसें। यातायात। अव्यवस्था। कारें। मोटरसाइकिलें। साइकिलें। रिक्शे। अलग-अलग रंग। लोग सामान ढोते हुए। काम पर जाते हुए।
लेकिन इन लोगों का क्या होगा यदि तकनीक वास्तव में वह कर दे जो संभावना के रूप में बताया जा रहा है?
यदि आज लाखों भारतीय जो तीन-पहिया टेम्पू से यात्रियों को ढोते हैं, उन्हें एयर-कंडीशन वाली ड्राइवर-रहित कारों से मूल्य पर प्रतिस्पर्धा करनी पड़े? यदि मोटरसाइकिल या साइकिल द्वारा पहुँचाया जाने वाला सामान ड्रोन द्वारा पहुँचाया जाए? यदि दुकानों के कर्मचारी रोबोटों से बदल दिए जाएँ, जो आदमी से बेहतर और सस्ते हों?
दुनिया भर में लोग यह सोच रहे हैं कि श्रम बाज़ार में क्या होने वाला है। यह ज्ञात है कि नई तकनीक परिवर्तन लाती है। लेकिन नॉर्वे में हम अभी भी संरक्षित क्षेत्रों में हैं। हमारे आय स्तर और संसाधन हमें सुरक्षा देते हैं। जबकि अन्य देशों में श्रम एक उलझा हुआ क्षेत्र है।
यदि किसी देश को अचानक बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी मिलती है, तो वह स्थिर नहीं रहेगा। विरोध होंगे। और वे हिंसक भी हो सकते हैं।
हम कहते हैं कि हमें जीवन भर सीखते रहना चाहिए। यह सही है। लेकिन हर कोई आईटी विशेषज्ञ नहीं बन सकता। इसे निराशावाद के रूप में न समझें। कोई भी हमसे हमारी नौकरियाँ नहीं छीन रहा है। हम कल भी काम पर जाएँगे। लेकिन इस पर सोचना आवश्यक है।
नॉर्वे में हमें परिश्रम का फल मिलता है। लेकिन दुनिया में अरबों लोग अत्यंत कठोर श्रम करते हैं, जो गायब भी हो सकता है। पिछली औद्योगिक क्रांति के दौरान भी कई लोग पीछे छूट गए। हालाँकि उसी समय नई नौकरियाँ भी बनीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्रांति में एकाधिकार जैसी प्रवृत्तियाँ पैदा हो सकती हैं, जिसका शायद कुछ ही लोगों को लाभ मिले।
संभल कर चलना होगा। एक ग़लती हुई और हमारे पैर चींटियों के ढेर पर होंगे।
[नॉर्वे के अखबार Dagsavisen में स्तंभकार Kjetil Staalesen]



yash chauhan
February 24, 2026 at 9:31 am
He has captured the spirit and soul of Bharat. Warned a caution and rightly so we must step in the path of AI cautiously.
Sandhya Verma
February 24, 2026 at 10:59 am
Well said
Bankim
February 24, 2026 at 12:13 pm
Does it make sense to predict about country which is on growth trajectory by person coming from country like Norway with no plausibility of growth. They prefer to ride bicycle and expecting everybody to follow their preference. Wish author to adopt holistic view rather confined view.