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जब सरकार कह रही है नीट-यूजी रद्द करने की आवश्यकता नहीं है!

मामला विचारधारा और उसे थोपने का है फिर भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर लगभग वही मांग की गई है। ऐसे में जनमत या जनहित की कोई हैसियत नहीं है और राजा जो करे वही ठीक है जैसा माहौल बन गया है। संसद में इसपर चर्चा की जरूरत नहीं महसूस की गई। और अब सुप्रीम कोर्ट में सरकार का यह पक्ष याद दिलाता है कि आसान रास्ता हमेशा सर्वश्रेष्ठ नहीं होता है। सरकार भी गलतियां करती है और चाहे तो पूरे इंतजाम से इसलिए उसपर नजर रखना जरूरी है…

संजय कुमार सिंह-

ज के अखबारों के लिए सबसे बड़ी खबर थी, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार और एनटीए का यह कहना कि नीट-यूजी रद्द करना तर्कसंगत नहीं है। यह खबर मेरे सात अखबारों में से तीन में लीड है, इंडियन एक्सप्रेस, नवोदय टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सेकेंड लीड है। मुझे लगता है कि यह परीक्षा रद्द होनी ही चाहिये और इसके कई कारण हैं। इसपर मैंने पहले भी लिखा है। अभी तक की स्थितियों से यह भी साफ है कि सरकार नहीं चाहती है कि परीक्षा रद्द करनी पड़े और इसके लिये तमाम उपाय किये जा रहे हैं। फिर भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है कि इसे रद्द नहीं किया जाये। अब जब सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने यही कहा है तो जाहिर है सरकार का विरोध कौन करेगा। सुप्रीम कोर्ट में याचिका अगर यह होती कि नीट को इन कारणों से रद्द किया जाये तो सरकार अपना बचाव करती। रद्द नहीं करने के कारण बताती। उसे चुनौती दी जाती। पर अब यह सब नहीं होने वाला है। ऐसे में संभव है सुप्रीम कोर्ट से भी इजाजत मिल जाये कि परीक्षा रद्द करने जरूरत नहीं है। ऐसी कोई मांग ही नहीं है। सरकार को खुद रद्द करना था या उसपर चर्चा होनी चाहिये थी। अखबारों में, टेलीविजन पर लेकिन वह सब भी नहीं के बराबर है।

इस बार की परीक्षा में घपले घोटाले की आशंका कम नहीं है फिर भी सरकार शुरू से इसे कम करके बताती रही है और अभी भी सुप्रीम कोर्ट में यह कहना कि लीक मामूली है, तर्क संगत नहीं है। टॉप करने वाले परीक्षार्थियों की संख्या, दोबारा परीक्षा देने वालों की संख्या, कृपांक मांगने और देने की जरूरत तथा फिर उसके बिना भी नतीजे स्वीकार कर लिया और उसकी मजबूरी भिन्न छात्रों के लिए अलग स्थितियां हैं और यह बड़े पैमाने पर अराजकता व अव्यवस्था के कारण है। परीक्षा परिणाम समय से पहले आना और आम चुनाव के नतीजों के दिन घोषित किया जाना भी जबरदस्त घपले की शंका पैदा करता है। जब प्रश्नपत्र लीक हुए हैं तो आज के समय में यह मानना बेहद अनुचित है कि वह देश भर में फैल नहीं गया होगा। खासकर तब जब सफल परीक्षार्थियों का एक वर्ग यह मांग कर रहा है कि परीक्षा रद्द न हो। इस मामले में अधिकारियों के निर्णय का इंतजार और उसपर भरोसा नहीं होने का कारण क्या हो सकता है। दूसरी ओर, जैसा मैंने कल लिखा था जांच देश भर में हो रही है। बिहार पुलिस ने एनटीए पर जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया था।

वैसे भी, जब यह दिख रहा है कि सरकार ही परीक्षा रद्द करने के पक्ष में नहीं है। सरकार ने ही एनटीए की व्यवस्था लागू की है। उसी ने उसमें काम करने वाले चुनकर रखे हैं। ऐसे में सरकार से मजबूत और शक्तिशाली कौन है जो परीक्षा रद्द करा देगा। फिर भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका किसलिए, किन लोगों ने दायर की है। वह भी तब जब परीक्षा आयोजित करने वाले को इसकी आवश्यता समझनी चाहिये, आयोजित करने वाली संस्था का गठन करने वाले (यानी सरकार को) इसके बारे में पता होना चाहिये और इस आधार पर, जाहिर है, जो भी होगा, सही होगा। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट से यह मांग करना की परीक्षा रद्द न हो उसके पक्ष में दलील देना सरकार को समर्थन है। खबरों से सरकार को ताकत मिलेगी। मीडिया में सरकार के पक्ष में दलील छपेगी जबकि उसके खिलाफ खबरें नहीं छप रही हैं। लोकसभा में चर्चा की मांग ठुकराई जा चुकी है। अब सुप्रीम कोर्ट के जरिये सरकार को अपनी बात सार्वजनिक करने का मौका मिलेगा। रद्द करने की जरूरत समझने वाले अपनी बात सुप्रीम कोर्ट में रख ही नहीं पायेंगे। आखिर परीक्षा रद्द करने के पक्ष में तर्क रखेगा कौन और उसे कौन सुनेगा? यह काम अखबारों और मीडिया का था तो उनकी हालत सबको पता है।

जब सभी संबंधित पक्ष परीक्षा रद्द करने के पक्ष में नहीं हैं तो डर किसका है जिससे बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। मुझे लगता है यह यह तथ्यों और तर्कों के सार्वजनिक होने और उनकी मजबूती के कारण पैदा हो सकने वाले डर से बचने के लिए है। मेरी राय में यह परीक्षा बिना हीला-हवाली के शुरू में ही रद्द कर दी जानी चाहिये थी और रद्द नहीं की गई तो न सिर्फ परीक्षा की पवित्रता भंग होगी बल्कि जितनी देर होगी उतनी मुश्किल होगी। इसे लेकर शंका बनी रहेगी और प्रश्नपत्र लीक से पैसे कमाने वालों का धंधा चलता रहेगा। इसमें योग्य छात्रों की उपेक्षा होगी और अयोग्य छात्र डॉक्टर बन जायेंगे। संभव है, इसमें ऐसे लोग भी हों जो डॉक्टरी पढ़ना और करना नहीं चाहते हों। ऐसे में वे डॉक्टर बन भी गये तो देश-समाज को उनकी सेवा नहीं मिलेगी और संसाधनों की बर्बादी होगी। मुझे लगता है कि पूरी व्यवस्था ऐसी ही बनाई गई है या बन गई है और इसे सुधारने की जरूरत ही नहीं समझी जा रही है। इसमें पहली और सीधी सी बात यह है कि परीक्षा रद्द करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अगली बार ऐसा करने वाले सोचेंगे। मतलब प्रश्नपत्र बेचने और खरीदने वाले – दोनों को डर होगा कि परीक्षा रद्द हो गई तो सारे प्रयास और खर्च बेकार जायेंगे।

अभी सरकार परीक्षा रद्द नहीं करने के प्रयास करके साबित कर रही है कि उसे इसकी पवित्रतता से मतलब नहीं है और आगे की चिन्ता भी नहीं है जबकि खबरों और नतीजों से लगता है कि इस परीक्षा से संबंधित गड़बड़ियां लगातार हो रही हैं। कभी मामला सार्वजनिक हो जाता है और कभी नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जब चर्चा नहीं हुई तब सब कुछ ठीक था। हाल में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर छपी थी कि नीट यूजी की परीक्षा में बहुत नीचे के रैंक पाने वाले कुछ परीक्षार्थी अगले साल की परीक्षा में बहुत बेहतर करते हैं और उनका चुनाव हो जाता है। ऐसा होना सामान्य हो सकता है और संभव है कि किसी परीक्षार्थी की मेहनत रंग लाये पर खबर में बताया गया था कि इन परीक्षार्थियों के परीक्षा केंद्र बदल गये थे और किसी दूरदराज के देहात और गांव से परीक्षा देने पर उनका चयन हुआ। निश्चित रूप से यह पर्याप्त गंभीर मामला है और इस साल की परीक्षा रद्द हो या नहीं, इस खबर पर जांच जरूर बैठाई जानी चाहिये थी। जाहिर है यह काम एनटीए को करना था और एनटीए बिना मांग, जांच क्यों करायेगा अगर सरकार उसके किये-धरे के समर्थन में रहेगी। जाहिर है इसमें गांव-देहात के परीक्षा केंद्र से चोरी कराना शामिल नहीं होगा पर शक तो है। जांच क्यों नहीं? और यही सवाल संसद में उसपर चर्चा नहीं कराने से खड़ा होता है।

संसद में चर्चा होती तो तमाम मुद्दे सार्वजनिक होते, सबका विचार सामने आता और तब निर्णय लिया जाता तो लोकतांत्रिक और सोचा-समझा होता। सरकार बहुमत में है और उसे लगता है कि उसका फैसला सही है तो वह अपने समर्थकों से पक्षप्रचार करवाकर भी ऐसा कर सकती थी लेकिन इसकी जरूरत नहीं समझी गई या सरकार को इसका भरोसा नहीं होगा। यह भी संभव है कि सरकार को अपने तर्को पर भरोसा न हो। एक तर्क तो ऐसा है कि सुप्रीम कोर्ट में रखते ही लीड बन गई। आप जानते हैं कि कांग्रेस मुक्त भारत का लक्ष्य और लड़कर हराने की कोशिश करने में अंतर है। यह वैसे ही है जैसे पत्नी से नहीं बने तो अलग हो जाना आसान है और समझौता करके परिवार चलाना मुश्किल। हर बार आसान रास्ता सर्वश्रेष्ठ नही नहीं होता है। ना शादी के बाद पत्नी को छोड़ना (भरण पोषण भत्ता देकर भी) और ना बगैर विवाह किये रह जाना। विपक्ष के बिना सरकार चलाना आसान है पर वह सही नहीं है। हमलोग ‘चलता है’ में यकीन करते हैं। इसीलिए एक के बाद एक पुल गिरते जा रहे हैं या छत ढहती गई। मुद्दा कोई बनाता है, कोई नहीं। कभी बनता है कभी नहीं। लेकिन सच्चाई यही है कि जो नहीं होना चाहिये वह फिर नहीं हो उसकी व्यवस्था नहीं करते।

हम मानते हैं कि शादियां होंगी तो तलाक भी होंगे। हमने इसकी कोशिश ही नहीं की कि शादियां वही हों जो टूटे नहीं। शादी हो तो पति-पत्नी साथ रहें, बच्चे हों परिवार बने और चले। आग लग गई, दुर्घटना हो गई, आतंकवादी हमला हो गया, दंगा हुआ तो हम तात्कालिक उपाय करते हैं, स्थायी उपाय नहीं करते। हाल में मैंने लिखा था, टाटा के एक समारोह में आग लग गई तो वैसा समारोह फिर नहीं हुआ, दोबारा आग नहीं लगी। सुरक्षा के नियम बनाये गये उनका पालन होता है और यह वैसे ही है जैसे हर विमान यात्रा से पहले सुरक्षा निर्देश दिये जाते हैं। या किसी भी दशा में विमान यात्रियों की संख्या सीट से ज्यादा नहीं होती है। अमेरिका में एक बार ट्विन टावर की घटना हुई, ऐसे नियम बनाये गये, उनका ऐसा पालन होता है फिर वैसी घटना नहीं हुई भले दुनिया भर के लोगों को अमेरिका का वीजा मिलना मुश्किल हो गया हो या पर्यटकों की संख्या कम हो गई हो। हम बेरोजगारी से परेशान हैं लेकिन हमारे पर्यटक विदेश जाते हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे यहां पर्यटन के लायक कुछ नहीं है। विदेशी पर्यटक यहां आते ही हैं। असल में हम कुछ भी ठीक से नहीं करते हैं और उसकी जरूरत भी नहीं समझते हैं। हमारी मानसिकता ऐसी ही है।

राहुल गांधी का हाथरस दौरा
आज की दूसरी महत्वपूर्ण खबर राहुल गांधी के हाथरस दौरे और फरार मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी की है। अमर उजाला में राहुल पीड़ितों से मिले शीर्षक खबर दो कॉलम की चार लाइनों में है जबकि मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी लीड है। नीट की खबर आधे पहले पन्ने पर नहीं है। दूसरे पहले पन्ने की लीड है। इसके साथ चार और खबरें हैं। इनमें सबसे छोटी राहुल गांधी के दौरे की है। हाथरस पुलिस ने कहा – राह चलते गिरफ्तार किया शीर्षक एक कॉलम तीन लाइन में लाल रिवर्स में है। यह खबर छह लाइनों में हैं। इस हिसाब से खबर राहुल गांधी वाली से छोटी है लेकिन शीर्षक समेत कुल जगह इसी को ज्यादा मिली है। 132 गवाहों के बयान सिंगल कॉलम में 13 लाइन की है। इसी तरह वरिष्ठ अधिवक्ता एपी सिंह का दावा, …. ताकि कोई ईनाम का दावा न करें दो कॉलम की पांच लाइनों में है। नवोदय टाइम्स में दो खबरें, हाथरस भगदड़ का मुख्य आरोपी मधुकर हिरासत में दो कॉलम में और प्रशासन से हुई चूक : राहुल दो कॉलम में एक साथ है। इसमें राहुल की फोटो भी है इसलिए खबर कम है। हालांकि, जैसा कहा जाता है, एक फोटो हजार शब्दों के बराबर होती है।

हिन्दुस्तान टाइम्स में राहुल गांधी की दो कॉलम की फोटो के साथ यह खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक भी तीन कॉलम में है और दोनों खबरों का शीर्षक एक ही है, राहुल ने हाथरस पीड़ितों के रिश्तेदारों से मुलाकात की। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सेकेंड लीड है और लीड के बराबर में टॉप पर है। यहां सिंगल कॉलम में एएनआई की वैसी ही फोटो है जैसी नवोदय टाइम्स में है। दो कॉलम की इस खबर का मुख्य शीर्षक है, हाथरस पर एसआईटी प्रमुख : सबूतों से आयोजकों के अपराध का संकेत मिलता है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर सरकार और राजनीति के खबरों के पन्ने पर तीन कॉलम में फोटो के साथ है जो दो कॉलम में है। शीर्षक है, राहुल ने हाथरस पीड़ितों के रिश्तेदारों से मुलाकात की और प्रशासन की चूक को रेखांकित किया। इस पन्ने की बड़ी खबर पूर्व वित्त और गृहमंत्री पी चिदंबरम का एक्सप्रेस इंटरव्यू है। इसका शीर्षक है, नये कानून अंशकालिकों ने लिखे हैं …. कब कोई प्रमुख कानून विधि आयोग के संदर्भ बिना पास हुआ है? द हिन्दू में दोनों खबरें अंदर होने की सूचना पहले पन्ने पर है। द टेलीग्राफ में यह खबर दो कॉलम में है। इसमें भी राहुल गांधी की वैसी ही फोटो है जो एएनआई के हवाले से छपी है। यहां इसे पीटीआई की बताया गया है। शीर्षक के अनुसार राहुल गांधी पड़ितों से मिले बाबा पर चुप रहे।

खबर के अनुसार, हादसे में मरने वाले 126 हो चुके हैं और राहुल गांधी ने संसद में यह मामला उठाने तथा पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा देने की मांग करने का वादा किया है। यहां यह उल्लेखनीय है नरेन्द्र मोदी की हिन्दुओं की रक्षक सरकार सत्तारूढ़ होने के बाद से देश में हादसों में मुआवजा देने घोषणा और इसका रिवाज बहुत कम हो गया है। अव्वल तो ऐसी घोषणा होती ही नहीं है और कोविड पीड़ितों को लगभग कोई मुआवजा नहीं मिला। इसी तरह हादसों में मरने वालों को नहीं के बराबर मुआवजे की घोषणा हुई है। इसलिए इसकी खबरें कम छपती हैं और राशि भी इतनी कम होती होती है कि वह खबर नहीं रह जाती है। और तो और 2014 में सरकार बनने के बाद जनधन खाते खुलवाये गये थे उसमें बीमा का प्रावधान भी था और उसके पास कब किसे मिले बताया नहीं जाता है जबकि बताया जाता तो लगता है सरकार की इस योजना का किसे कैसा लाभ मिला है। ऐसा ही रेल दुर्घटना में मरने वालों के साथ है। अगर मृत्यु की दशा में मुआवजा मिलता है उसका प्रचार होता है तो लोग बीमा कराएंगे। आप जानते हैं कि अग्निवीर नाम के नए श्रेणी के सैनिकों की मृत्यु पर भी कायदे से मुआवजा देने का रिवाज नहीं है। ना तो कोई घोषणा होती है ना यह बताने का रिवाज रहा कि सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान के बदले देश और सरकार ने उसके परिवार को क्या दिया।

इसीलिये राहुल गांधी ने संसद में ऐसा आरोप लगाया तो रक्षा मंत्री ने उसका खंडन किया, गृहमंत्री ने यह वा किया कि संसद को गुमराह किया जा रहा है जबकि राहुल गांधी जो बोल रहे थे वह सही ही था। असल में अब बीमे की निश्चित राशि को ही मुआवजा मान लिया जाता है और सरकार व सेना भी ऐसा ही दावा कर रही है। आम लोग और मीडिया की ओर से बताया जा रहा है कि मृतक अग्निवीर को दो कुल करीब दो करोड़ रुपये मिलते हैं (और इसे पर्याप्त माना जाना चाहिये)। ऐसे में हाथरस पीड़ितों के लिए पर्याप्त क्षतिपूर्ति की मांग करने का राहुल गांधी का वादा महत्वपूर्ण है, भले शीर्षक में नहीं है। दूसरी ओर, फरार अभियुक्त के पकड़े जाने की खबर प्रमुखता से छापकर यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि अभियुक्त पकड़े जा रहे हैं और बख्शे नहीं जायेंगे का वादा पूरा हो रहा है जबकि यह सामान्य जरूरत है और इसकी मांग, घोषणा या पूर्ति के प्रचार की जरूरत नहीं है। हादसे में मौत पर मुआवजा जरूर महत्वपूर्ण है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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