राकेश मिश्र ‘सरयूपारीण’-
आजकल एक आदमी को सोशल मीडिया पर बहुत गाली पड़ रही है, वह है अजीत भारती। वैसे तो मेरा अजीत भारती से कुछ भी लेना देना नहीं है और उनकी भाषा के कारण मैंने न तो उन्हें कभी पसंद किया, न तो कोई वीडियो देखी।
लेकर अभी कुछ दिन पहले तक यही अजीत भारती राष्ट्रवादी खेमे के हीयर डियर थे। अब शत्रु हैं। ऐसे ही दिलीप मंडल है जो कभी हिंदू देवताओं को रोज गाली देता था लेकिन अब वह राष्ट्रवाद का परचम लहरा रहा है!

कैसी विडंबना है? भाजपा के शासन काल में देखते ही देखते राष्ट्रवाद का मंडलीकरण हो गया और वामपंथ का भारतीकरण हो गया।
अब एक तथ्य पर गौर करिये। भाजपा बदली या अजीत भारती?
मेरे हिसाब से अजीत भारती आज भी वहीं खड़े हैं लेकिन भाजपा का चरित्र और उसकी प्राथमिकता अवश्य बदली है।
अजीत भारती की आवाज इतनी छोटी नहीं कि सरकार के कान में न पहुँचे, लेकिन अजीत भारती इतने बड़े भी नहीं कि सरकार उन्हे चाहे तो नेस्तनाबूद न कर दे।
लोग कह रहे हैं कि भाजपा की सरकार ने उन्हें कर्नाटक पुलिस से बचाया था, इसलिए उनका भाजपा विरोध कृतघ्नता है।
लेकिन लोग यह नहीं सोचना चाहते कि उनका विरोध क्यों है और किस मुद्दे पर है? वे ugc में भेदभाव को लेकर सरकार के विरुद्ध मुखर हैं। उन्होंने सरकार द्वारा दिये गए संरक्षण को लात मारा है तो किसके लिए मारा है?
मुझे इसमें उस आदमी का कोई व्यक्तिगत लाभ तो दिखाई नहीं दे रहा है, उल्टे कानूनी पचड़ों में फंसने और सरकार के निशाने पर आने का खतरा अवश्य है।
फिर अगर उन्होंने खतरा मोल लेते हुए सवर्णों की आवाज उठाई, उनके पक्ष में लगातार बोला तो उनकी प्रशंसा होनी चाहिए, लेकिन हम इतने कृतघ्न लोग हैं कि कोई व्यक्ति अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर हमारे लिए लगातार लड़ रहा है और हम अपना विवेक तक सरकार के चरणों में रखकर उसे गालियाँ दे रहे हैं।
आप उनसे असहमत हो सकते हैं लेकिन अगर आप सवर्ण हैं और उनके स्टैंड को लेकर आप उन्हें गाली दे रहे हैं तो अपने समाज के सबसे बड़े शत्रु आप खुद हैं।
अगर हमारा वर्ग ऐसे ही आत्महंता बना रहेगा तो फिर हमारी आवाज उठाने के लिए कोई सामने नहीं आयेगा।
कृष्णकांत झा–
कल तक अजीत भारती को बाप बनाया था क्योंकि इनके बाप के खिलाफ उठने वाले आवाज का खंडन करता था। लेकिन जिस तरह से अब इनके स्वर्गीय माता जी को गाली दिया जा रहा वो दुर्भाग्य हैं। 11 वर्षों में ही इसका एजेंडा देश समझ गया वो तो अच्छा हुआ कि 70 साल इसके हाथ सत्ता नहीं लगा नहीं तो आज देश किसी और देश का गुलाम रहता। यूजीसी कानून पर मुंह में लड्डू लिए ना कार्यकर्ता बोला ना ही इसके आला कमान अजीत भारती ने आवाज उठाया तो it सेल द्वारा गाली दिया जा रहा हैं। कांग्रेस कितना भी बुरा हो लेकिन ऐसा चुतियाप कभी नहीं किया।

ये व्यक्ति पूरे भाजपाई गुलामों और उनके नेताओं की बखिया उधेड़ रखी है! बहुत कम पत्रकार हैं जो सिर्फ सत्य का साथ देते हैं ना कि नेताओं के जुते चाटते हैं अजीत भारती उस में से एक हैं !
ये व्यक्ति महिलाओं से कभी नही उलझता और ना तू तड़ाक करता है, हाँ हिंदू धर्म विरोधी सूर्पनखाओ की अच्छे से नाक काटता है !
यूजीसी कानून के बाद सबसे अधिक कोई सवर्णों के लिए आवाज़ उठाया है तो वो यहीं व्यक्ति है!
बिल्कुल neutral
भाजपाई गुंडे ऐसे व्यक्ति के लिए उस पर personal attack कर रहे हैं, यहीं वो व्यक्ति है जो भाजपाई के लिए विपक्ष के एजेंडे को चंद second में उखाड़ फेंकता था अब भाजपाई और उसके गुलामों की ऐसी स्थिति बन गई हैं कि मुह छुपाते फिर रहे हैं या सामने पड़ने जाने पर गालियां बकने पर उतारू हो जाते है पागल कुत्ते की तरह!
तर्को से कोसों दूर भाजपाई गुलामों की स्थिति वैसी ही हो गई है कि ये ना घर के रहें है ना घाट के,, कोई इज़्ज़त नही, इज़्ज़त का फलुदा बन गया है इन भाजपाई गुलामों का !
आज भाजपाई गुंडे पागल कुत्ते की तरह अजीत भारती पर personal attack कर रहे हैं जबकि इन गुंडों को समझने की आवश्कता है कि ये व्यक्ति तुम्हारे समाज के लिए लड़ रहा हैं ना कि तुम्हारे जैसे नेताओं के पैर चाटने के लिए!
तुम इस व्यक्ति का अपमान नह कर रहे हों बल्कि अपनी मूर्खता में उस आवाज को दबाने की कोशिश किए जा रहे हो जो हिन्दू समाज की लिए लड़ रहा हैं !
घिन आती हैं तुम नेताओं के गुलामों पर
क्या बकवास कर रहे हो कि बीजेपी ने अजीत भारती को पुलिस से बचाया …?
अबे जाहिल
अजीत भारती को पुलिस से बचाने का नौबत क्यों आई …?
किसके लिए लड़ रहा था अजित भारती ..?
11 सालो से तुम्हारे नेता से ना judiciary सिस्टम ठीक हो पाया और ना ही भ्रष्ट सिस्टम !
भ्रष्टाचार में लिप्त जज साहब के आलोचना करने पर उसे पुलिस गिरफ्तार करने आई थी ना कि तुम्हारे जैसे नेताओं के पैर चाटने, गुलामी करने से प्राप्त हुए पैसे रखने पर!
मनीष श्रीवास्तव-
अजीत भारती बनाम भाजपा/संघ
जिस दिन यह मुद्दा अजीत भाई ने उठाना शुरू किया, उस दिन सरकार और उनके प्रशंसकों को शायद यह अंदाज़ा नहीं था कि यह विषय सोशल मीडिया से उठकर राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन जाएगा।

कुछ दिनों बाद सरकार को इसकी गंभीरता का एहसास हुआ, तब तक अजीत जी आक्रामक रुख अपना चुके थे, क्योंकि शुरुआती दौर में सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी थी। मेरे विचार से इस विवाद ने अलग मोड़ तब लिया जब अजीत भाई ने इसमें संघ का संदर्भ जोड़ते हुए मोहन भागवत जी के भाषण का उल्लेख किया।
इसी दौरान अजीत जी की माता जी का दुखद निधन हुआ, और उस संवेदनशील समय में संघ तथा भाजपा के कुछ समर्थकों ने ऐसी सीमाएँ पार कर दीं, जिन्हें किसी भी परिस्थिति में नहीं लांघा जाना चाहिए था।
वहीं से यह सवर्ण बनाम ओबीसी का मुद्दा अजीत भारती बनाम संघ की दिशा में मुड़ता दिखाई दिया। अजीत भाई ने एक-एक कर उन बयानों और संदर्भों को गिनाया, जिनमें हिंदुत्व के नाम पर भाजपा और संघ द्वारा दिए गए वक्तव्यों की ओर उन्होंने ध्यान दिलाया।
मेरा प्रश्न उन लोगों से है जो आज अजीत भाई के साथ नहीं खड़े हैं। यदि यही सवर्ण-ओबीसी वाला विवाद कांग्रेस ने खड़ा किया होता और अजीत भाई उसी तीखे अंदाज़ में कांग्रेस की आलोचना कर रहे होते, तो क्या तब भी आप उनकी माँ की चिता की राख ठंडी होने का इंतज़ार नहीं करते?
ऐसे समय में आप अजीत भारती का खुलकर समर्थन करते। इसलिए आज जो लोग उनके विरोध में हैं, उनकी नाराज़गी सवर्ण-ओबीसी मुद्दे से अधिक वैचारिक नहीं, बल्कि व्यक्ति या पार्टी-आधारित प्रतीत होती है।
और जहाँ तक उन स्क्रीनशॉट्स की बात है जिन्हें अजीत जी के कट्टर विरोधी बार-बार उछालते रहते हैं कि वे कभी वामपंथी विचार रखते थे, तो स्वयं अजीत कई बार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके हैं कि उनके विचार पहले अलग थे।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि समय, अध्ययन और अनुभव के साथ मनुष्य के विचार और विश्वास बदलते हैं, और यह परिवर्तन किसी अपराध का प्रमाण नहीं बल्कि बौद्धिक विकास का संकेत है। जो व्यक्ति अपने पुराने मतों को स्वीकार कर सकता है और यह कह सकता है कि वह बदला है, वह कम से कम ईमानदार तो है।
विडंबना यह है कि यही लोग उन नेताओं के अतीत पर सहजता से पर्दा डाल देते हैं, जो भाजपा में शामिल होने से पहले मोदी जी के खिलाफ बेहद अपमानजनक भाषा का उपयोग करते थे, संघ को राष्ट्र-विरोधी कहते थे और सावरकर जी को “माफी वीर” कहकर उपहास उड़ाते थे। ऐसे नेताओं का आज उसी पार्टी में सम्मानपूर्वक स्वागत किया जाता है, और तब किसी को वैचारिक शुचिता की याद नहीं आती।
यदि अतीत का हिसाब ही कसौटी है, तो वह कसौटी सब पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। और यदि परिवर्तन को स्वीकार किया जा सकता है, तो वह भी सबके लिए समान रूप से मान्य होना चाहिए। चयनात्मक नैतिकता ही दोगलापन कहलाती है, और यही इस पूरे विमर्श की सबसे बड़ी समस्या है।
इसी कारण मैं अजीत भाई के समर्थन में हूँ। वे संघ, भाजपा या मोदी जी के विरोध में नहीं, बल्कि उनके कुछ वैचारिक रुख और दृष्टिकोण की दरिद्रता के विरोध में खड़े हैं।
और रही बात उन लोगों की, जो मेरे डीएम में आकर “ज्ञान” के नाम पर धमकी दे रहे हैं कि आप भी लपेटे में आ जाओगे, तो उन्हें मैं सार्वजनिक रूप से यही कहना चाहता हूँ कि मैं बहुत पहले ही लपेटे में आ चुका हूँ।
अगर सच बोलना, सवाल उठाना और सुविधा से परे जाकर खड़ा होना “लपेटे में आना” कहलाता है, तो वह जोखिम मैं स्वीकार कर चुका हूँ।
जहाँ तक उन नए उत्साही सदस्यों की समझ का प्रश्न है, जो मेरी एक व्यंग्यात्मक ट्वीट को संदर्भ से काटकर मुझे वामपंथी, मुल्ला, कांग्रेसी या जो भी उपाधि हाथ लगे उससे नवाज़ देते हैं, उनसे विनम्र निवेदन है कि पहले मुझे पढ़िए, समझिए और फिर प्रतिक्रिया दीजिए।
व्यंग्य को शाब्दिक घोषणा मान लेना और प्रोफ़ाइल देखे बिना लेबल चिपका देना बौद्धिक असुरक्षा का लक्षण है, विचारशीलता का नहीं। अगर असहमति है तो तर्क रखिए, प्रश्न उठाइए, संवाद कीजिए। लेबल लगाना सबसे आसान काम है, पर वही सबसे कमज़ोर प्रतिक्रिया भी है।


