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साहित्य

किसानों की आत्‍महत्‍या पर केंद्रित पंकज सुबीर के नये उपन्‍यास ‘अकाल में उत्‍सव’ की समीक्षा

पंकज सुबीर हमारे समय के उन विशिष्ट उपन्यासकारों में है जिनके पास ‘कन्टेन्ट’ तो है ही उसे अभिव्यक्त करने की असीम सामर्थ्य भी है। किस्सा गोई की अद्भुत ताकत उनके पास है। ‘अकाल में उत्सव’ पंकज सुबीर का हाल में प्रकाशित उपन्यास है, जिसकी चर्चा हम यहां कर रहे हैं। पंकज सुबीर ने अपने पहले ही उपन्यास ‘ये वो सहर नहीं’ (वर्ष 2009) से जो उम्मीदें बोई थीं वे ‘अकाल में उत्सव’ तक आते-आते फलीभूत होती दिख रही हैं। नौजवान लेखक पंकज सुबीर इन अर्थों में विशिष्ट उपन्यासकार है कि वे अपने लेखन में किसी विषय विशेष को पकड़ते हैं और उस विषय को धुरी में रखकर अपने पात्रों के माध्यम से कथ्य का और विचारों का जितना बड़ा घेरा खींच सकते हैं, खींचने की कोशिश करते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे विषयवस्तु, पात्रों और भाषा का चयन बड़ी संजीदगी से करते हैं और उसमें इतिहास और मनोविज्ञान का तड़का बड़ी खूबसूरती से लगाते हैं।

पंकज सुबीर हमारे समय के उन विशिष्ट उपन्यासकारों में है जिनके पास ‘कन्टेन्ट’ तो है ही उसे अभिव्यक्त करने की असीम सामर्थ्य भी है। किस्सा गोई की अद्भुत ताकत उनके पास है। ‘अकाल में उत्सव’ पंकज सुबीर का हाल में प्रकाशित उपन्यास है, जिसकी चर्चा हम यहां कर रहे हैं। पंकज सुबीर ने अपने पहले ही उपन्यास ‘ये वो सहर नहीं’ (वर्ष 2009) से जो उम्मीदें बोई थीं वे ‘अकाल में उत्सव’ तक आते-आते फलीभूत होती दिख रही हैं। नौजवान लेखक पंकज सुबीर इन अर्थों में विशिष्ट उपन्यासकार है कि वे अपने लेखन में किसी विषय विशेष को पकड़ते हैं और उस विषय को धुरी में रखकर अपने पात्रों के माध्यम से कथ्य का और विचारों का जितना बड़ा घेरा खींच सकते हैं, खींचने की कोशिश करते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे विषयवस्तु, पात्रों और भाषा का चयन बड़ी संजीदगी से करते हैं और उसमें इतिहास और मनोविज्ञान का तड़का बड़ी खूबसूरती से लगाते हैं।

वे अपने कथ्य को भाषा के हथियार से और भी मारक बना देते हैं। संभवतः इसीलिए उनके पात्र लोक भाषा का प्रयोग करते हैं, आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेजी भी बोल लेते हैं और वो अंग्रेजी जो आज की आम फहम जुबान है। तभी तो ‘अकाल में उत्सव’ के ग्रामीण पात्र जहां इन्दौर-भोपाल-सिहोर जनपदों के आस-पास के क्षेत्र में बोले जाने वाली अपभ्रंश ‘मालवी’ भाषा में बातचीत करते हैं, वहीं कलेक्टर और ए.डी.एम. जैसे इलीट क्लास केरेक्टर हिन्दी मिश्रित अंग्रेजी में बोलते नजर आते हैं। ‘अकाल में उत्सव’ में भाषा के इस बेहतरीन प्रयोग के साथ-साथ पंकज सुबीर ने किसानों और शहरी पात्रों की मानसिक दशा और उनके मन में चल रहे द्वन्दों-भावों को अभिव्यक्ति देने में जो चमत्कार उत्पन्न किया है वह सराहनीय है।

बात आगे बढ़ाते हैं और चर्चा करते हैं उपन्यास ‘अकाल में उत्सव’ की विषय वस्तु की। उपन्यास ग्रामीण परिवेश और शहरी जीवन की झांकी को एक साथ पेश करते हुए आगे बढ़ता है। अर्थात एक ही समय में दो कहानियों का मंचन एक साथ इस उपन्यास में होता दिखता है। एक ओर मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र के एक गांव ‘सूखा पानी’ का एक आम किसान ‘रामप्रसाद’ इस उपन्यास का प्रमुख पात्र है जिसकी आंखों में आने वाली फसल की उम्मीदें जवान हैं तो दूसरी तरफ सरकारी अमले का मुखिया श्रीराम परिहार आई.ए.एस. नाम का एक पात्र है जो शहर का कलेक्टर है, जिसके इर्द-गिर्द कुछ अधिकारी-समाजसेवी -नेता-पत्रकार टाइप लोग हैं जो इसी दौरान शहर में ‘नगर उत्सव’ के आयोजन को लेकर सक्रिय हैं। जहां रामप्रसाद की उम्मीदें परिपक्व होने से पहले ही बेमौसम बरसात की वजह से उजाड़ हो जाती हैं वहीं दूसरी ओर ‘नगर उत्सव’ का आयोजन पूरी ठसक के साथ किया जाता है। रामप्रसाद के पारिवारिक जीवन में उसकी पत्नी, बच्चे, भाई, बहिनें, बहनोई इत्यादि हैं, जिनकी परिधि में वह केन्द्रीय पात्र के रूप में उभरता है। दूसरी ओर, जैसा कि अवगत हैं कि श्रीराम परिहार और उसके इर्द-गिर्द कुछ अधिकारी-समाजसेवी -नेता-पत्रकार टाइप लोग हैं जो ‘नगर उत्सव’ के आयोजन को लेकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं। इस दुनिया की अपनी ही सोच-भाषा-दर्शन-जीवन शैली है, जिसमें वे जीते हैं। फरवरी-मार्च का महीना चल रहा है।

बजट लेप्स न हो जाए इसलिए सरकारी व्यय पर ‘नगर उत्सव’ का मनाया जाना और इसी दौरान ओलावृष्टि से किसान रामप्रसाद की न केवल फसल बल्कि जीवन का करूणांत इस उपन्यास का सार है। यद्यपि पाठक को शुरूआती कुछ पृष्ठों को पढ़ने के बाद ही पूरी कथा और कमोबेश कथा के अंत का अनुमान लग जाता है किन्तु पात्रों की भाषा-संवाद और उनकी मनोदशा पाठकों को इस उपन्यास से अंत तक जुड़े रखने के लिए बाध्य करती है। किसी उपन्यासकार के लिए भला इससे बड़ी सफलता और क्या हो सकती है? दिलचस्प बात ये है कि नितान्त अलग सी लगने वाली इन दोनों दुनियाओं का एक सम्मिलन स्थल भी है जहां इन दो दुनियाओं के मुख्य पात्र अनायास रूप से मिलते हैं। अर्थात उपन्यास में दो-तीन बार ऐसे अवसर आते हैं जब किसान रामप्रसाद, कलेक्टर श्रीराम परिहार से अनायास मिलता है। तीनों बार इन दोनों पात्रों के बीच कोई खास वार्तालाप तो नहीं होता लेकिन तीनों बार ही ये मुलाकातें उपन्यास की कथा वस्तु को बहुत ही दिलचस्प तरीके से विस्तार प्रदान करती हैं।

उपन्यास में ग्रामीण जीवन विशेषतया किसानों की जिन्दगी पर बहुत करीने से रोशनी डाली गयी है। किसान की सारी आर्थिक गतिविधियां कैसे उसकी छोटी जोत की फसल के चारों ओर केन्द्रित रहती हैं और किन-किन उम्मीदों के सहारे वो अपने आपको जीवित रखता है, यह इस उपन्यास का कथानक है। पंकज सुबीर ने इस उपन्यास में पकती फसल से लगी उम्मीदों के सहारे सुनहरे भविष्य की कल्पना में खोए किसान ‘रामप्रसाद’ के मार्फत आम भारतीय किसान का हाल उकेरा है। ‘रामप्रसाद’ के माध्यम से पंकज सुबीर बताते हैं कि आम किसान आज भी मौसम की मेहरबानी पर किस हद तक निर्भर है। मौसम के उतार-चढ़ाव के साथ ही किसानों की उम्मीदों का ग्राफ भी ऊपर नीचे होता रहता है। मौसम का परिवर्तन इस तेजी के साथ होता है कि किसान को संभलने का मौका भी नहीं मिलता। सेंसेक्स एक बार डूबे तो संभलने की उम्मीदें लगायी जा सकती हैं मगर किसान की फसल पर अगर पानी-पाला पड़ गया तो संभलने के सारे विकल्प समाप्त हो जाते हैं। मौसम की आंख मिचौलियों के बीच किसान न केवल तहसील-बिजली-बैंक-को’आपरेटिव जैसे विभागों के बकाये को चुकाता है बल्कि तमाम सामाजिक रस्मों को भी पूरा करता है। गांवों में आज भी विवाह और मृत्यु दोनों ही, परिवार को समान रूप से क़र्ज़ें में डुबा कर चले जाते हैं। विवाह में भी वही होता है, मेहमान जुटते हैं, पूरे गांव को और आस-पास के रिश्तेदारों को खाना दिया जाता है और मृत्यु होने पर भी वही होता है। अंतर सिर्फ़ इतना होता है कि विवाह के अवसर पर एक उल्लास होता है मन में और मृत्यु के अवसर पर दुःख होता है। किसान इन आयोजनों में आने वाले खर्चों को भी वहन करता है भले ही ये किसान की पत्नी के शरीर पर बचे एक मात्र गहने चांदी से बनी ‘तोड़ी’ से पूरे होते हों। किसान की जद्दो जहद ये भी है कि वह ‘तोड़ी’ को बेचे या गिरवी रखे . . . अर्थात यहां किसान के पास उपलब्ध विकल्प कितने तंग हैं, ये बस महसूस ही किये जा सकते हैं। इन गहनों को खरीदने-बेचने वाला एक ही समुदाय है जो ‘साहूकार’ के नाम से जाना जाता है।

किसान और साहूकार का आपसी रिश्ता पीढ़ियों पुराना होता है और पूरी तरह विश्वास पर आधारित होता है। साहूकारों ने तो अपना ही गणित और पहाड़े बना रखे हैं। किसान जब आता, तो वह अपना जोड़-भाग किसान को बताने लगता है ”देख भाई तीन महीने का हो गया ब्याज, तो ढाई सौ के हिसाब से ढाई सौ तीया पन्द्रह सौ और उसमें जोड़े चार सौ पिछले तो पन्द्रह सौ और चार सौ जुड़ के हो गए छब्बीस सौ। उसमें से तूने बीच में जमा किए तीन सौ, तो तीन सौ घटे छब्बीस सौ में से तो बाक़ी के बचे अट्ठाइस सौ, ले माँड दे अँगूठा अट्ठाइस सौ पे। समझ में आ गया ना हिसाब? कि फिर से समझाऊँ?’ किसान को क्या समझ में आना। वह चुपचाप से अपना अँगूठा लगा कर उठ के आ जाता है। रकम बढ़ती जाती, ब्याज बढ़ता जाता है और ज़ेवर धीरे-धीरे उस ब्याज के दल-दल में डूबता जाता, डूबता जाता है। किसान के जीवन में बढ़ते दुख उसकी पत्नी के शरीर पर घटते ज़ेवरों से आकलित किए जा सकते हैं। नई बहू जब आती है तो नए घाघरे, लुघड़े, पोलके के साथ तोड़ी, बजट्टी, ठुस्सी, झालर, लच्छे, बैंदा, करधनी में झमकती है। फिर धीरे-धीरे उम्र बढ़ने के साथ खेती-किसानी की सुरसा अपना मुँह फाड़ती है और महिलाओं के शरीर पर से एक-एक ज़ेवर कम होता जाता है। ज़ेवर जो शरीर से उतर कर किसी साहूकार की तिजौरी में गिरवी हो जाते हैं। और किसान के घर की चीज़ एक बार गिरवी रखा जाए तो छूटती कब है? पहले सोने के ज़ेवर जाते है, फिर उनके पीछे चाँदी के ज़ेवर। हर ज़ेवर जब गिरवी के लिए जाता है, तो इस पक्के मन के साथ जाता है कि दो महीने बाद जब फ़सल आएगी, तो सबसे पहला काम इस ज़ेवर को छुड़वाना ही है। लेकिन अगर यह पहला काम ही अगर सच में पहला हो जाता, तो इस देश में साहूकारों की तिजोरियाँ और उनकी तोंदें इतनी कैसे फूल पातीं।

लेखक ने बड़ी कुशलता से बल्कि सच कहूँ तो एक कृषि अर्थशास्त्री और सांख्यिकी विशेषज्ञ की हैसियत से किसान की उपज के मूल्य को आज के उपभोक्ता सूचकांको के सापेक्ष विश्लेषण की कसौटी पर जांचा है। लेखक बहुराष्ट्रीय कम्पनी के उत्पादों को कच्चे उत्पादों के बीच का गणित बहुत ही सरल अन्दाज से समझाता है ”पन्द्रह सौ रूपये क्विंटल के समर्थन मूल्य पर बिकने वाली मक्का का मुर्गी छाप कार्न फ्लैक्स 150 रूपये में 500 ग्राम की दर से बिकता है। मतलब यह कि 300 रूपये किलो या तीस हज़ार रूपये क्विंटल की दर से। पन्द्रह सौ और तीस हज़ार के बीच बीस गुना का फ़र्क़ है। क्या यह बीस गुना आज तक किसी वित्त या कृषि मंत्री को दिखाई नहीं दिया। क्या एक सीधा-सा लॉजिक किसी को नहीं दिखाता कि जो किसान धूप, बरसात, ठंड में, खेतों में अपनी ज़िंदगी को झोंकते हुए पाँच महीने में जो फ़सल पैदा करता है, उसे केवल 1500 रूपये क्विंटल मिल रहा है और जो वातानुकूलित चैम्बर में बैठ कर मशीन से उस मक्का को केवल पाँच मिनट में चपटा कर कॉर्न फ्लैक्स बना रहा है, उसे बीस गुना, तीस हजार रूपये? समर्थन मूल्य तो है मगर वह किसको समर्थन देने के लिए बनाया गया है, यह बेचारा किसान कहाँ जानता है। किसान की जिन्दगी में सचमुच परेशानियों का कोई अन्त नहीं होता। एक जाती है तो दूसरी आती है, मानो पहली वाली के टलने का रास्ता ही देख रही थी। जवाहर लाल नेहरू ने एक बार कहा था कि अगर देश को विकास की तरफ़ बढ़ते देखना है तो ग़रीबों को किसानों को ही सेक्रिफाइज़ करना पड़ेगा। आज़ादी को आज सत्तर साल होने को हैं लेकिन सेक्रिफाइज़ किसान ही कर रहा है। बाक़ी किसी को भी सेक्रिफाइज़ नहीं करना पड़ा। सबकी तनख़्वाहें बढ़ी, सब चीजों के भाव बढ़े लेकिन, उस हिसाब से किसान को जो न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है उसमें बढ़ोतरी नहीं हुई। 1975 में सोना 540 रूपये का दस ग्राम था जो अब 2015 में 30 हज़ार के आस-पास झूल रहा है, कुछ कम ज़्यादा होता रहता है। 1975 में किसान को गेहूँ का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार की आरे से तय था लगभग सौ रूपये आज 2015 मिल रहा है लगभग 1500। यदि सोने को ही मुद्रा मानें, तो 1975 में किसान पाँच क्विंटल गेहूँ बेच कर दस ग्राम सोना ख़रीद सकता था। आज उसे दस ग्राम सोना ख़रीदने के लिए लगभग 20 क्विंटल गेहूँ बेचना पड़ेगा। सोना तो किसान क्या खरीदेगा, उसके काम की तो चाँदी होती है, चाँदी 1975 में लगभग 1200 रूपये किलो थी और आज 38 हजार रूपये प्रति किलो है। 1990 में डीज़ल का भाव था साढ़े तीन रूपये प्रति लीटर और गेहूँ का 225 रूपये प्रति क्विंटल। मतलब किसान को खेती के लिए यदि डीज़ल खरीदना है तो एक क्विंटल गेहूँ बेच कर वह लगभग पैंसठ लीटर डीज़ल ख़रीद लेता था। आज डीजल लगभग साठ रूपये है और गेहूँ 1500 रूपये, मतलब एक क्विंटल गेहूँ के बदले केवल 25 लीटर डीज़ल आयेगा।

1975 में एक सरकारी अधिकारी का जो वेतन 400 रूपये था, वह जाने कितने वेतन आयोगों की अनुशंसाओं के चलते अब लगभग चालीस हज़ार है, सौ गुना की वृद्धि उसमें हो चुकी है। और ख़बर है कि सातवें वेतन आयोग का भी गठन हो गया है। भारत के एक सांसद को सब मिलाकर लगभग तीन लाख रूपये प्रति माह मिलता है, जिसमें सब प्रकार की सुविधाएँ शामिल हैं, लेकिन हम आज तक कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाए कि हमारे लिए अन्न उपजाने वाले किसान को तीन हज़ार रूपये प्रति माह, उसके परिवार को चलाने का दिया जाए। एक सांसद साल भर में चार लाख की बिजली मुफ़्त फूँकने का अधिकारी है लेकिन, किसान के लिए चार हज़ार की भी नहीं है। और उसके बाद भी सबके लिए सब्सिडी दे रहा है किसान। कोई नहीं सोचता कि बाज़ार में अनाज का दाम बढ़े कि नहीं, इसके लिए किसान की जेब से सब्सिडी ली जा रही है। और उस पर भी यह तुर्रा कि हम एक कृषि प्रधान देश में रहते हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था है, जिसमें हर कोई किसान के पैसों पर अय्याशी कर रहा है। सरकार कहती है कि सब्सिडी वह बाँट रही है जबकि हक़ीक़त यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के आँकड़े में उलझा किसान तो अपनी जेब से बाँट रहा है सबको सब्सिडी। यदि चालीस साल में सोना चालीस गुना बढ़ गया तो गेहूँ भी आज चार हज़ार के समर्थन मूल्य पर होना था, जो आज है पन्द्रह सौ। मतलब यह कि हर एक क्विंटल पर ढाई हजार रूपये किसान की जेब से सब्सिडी जा रही है।”

किसान की मजबूरियों का चिट्ठा आगे बढ़ाते हुए लेखक रहस्योद्घाटन करता है कि ”एक एकड़ में खरपतवार नाशक, कीट नाशक और खाद का ख़र्च होता है, लगभग पाँच हज़ार रूपये। पलेवा और सिंचाई पर बिजली या डीज़ल का ख़र्च क़रीब तीन हज़ार रूपये प्रति एकड़ होता है। इसके बाद गेहूँ की कटाई तथा थ्रेशर से निकालना भी, लगभग दो हज़ार रूपये प्रति एकड़ पड़ता है। और लगभग सात आठ सौ रूपये प्रति एकड़ मंडी तक की ढुलाई। एक हज़ार रूपये अन्य सभी प्रकार का ख़र्च होगा। इस प्रकार मोटा-मोटा हिसाब लगाया जाए तो प्रति एकड़ क़रीब पन्द्रह हज़ार रूपये का ख़र्च तो तय ही है। एक एकड़ में यदि सब कुछ बिल्कुल ठीक-ठाक रहा, तो लगभग सोलह से बीस क्विंटल के बीच गेहूँ का उत्पादन होता है। यदि हम अठारह क्विंटल के आँकड़े को ही औसत मान कर चलें, तो एक एकड़ का किसान अपने परिवार के साल भर खाने के लिए कम से कम सात आठ क्विंटल तो बचाएगा। बाक़ी बचा दस क्विंटल जिसको सरकारी समर्थन मूल्य पन्द्रह सौ रूपये प्रति क्विंटल के हिसाब से बेचने पर मिलगा पन्द्रह हज़ार रूपये, और लागत ? वही पन्द्रह हज़ार रूपये। यदि किसान का समर्थन मूल्य भी पिछले पच्चीस सालों में बढ़े सोने के हिसाब से बढ़ता, तो उसे आज पन्द्रह नहीं साठ हज़ार मिलते। और अगर अधिकारियों-कर्मचारियों, सांसदों-विधायकों के पैशाचिक वेतन आयोगों के हिसाब से सौ गुना बढ़ता, तो उनको आज दस क्विंटल के एक लाख मिलते। मगर नहीं, उसे मिलता है केवल वह आठ क्विंटल प्रति एकड़ गेहूँ, जो उसका परिवार साल भर खाएगा। उसके पास इतना भी नहीं बचा है कि अगर उसने खेत ठेके पर लिया है किसी खेत मालिक से, तो उसका ख़र्च अलग से होना है। सामान्य रूप से दज हज़ार रूपये प्रति एकड़ में उपजता है अठारह क्विंटल सा सत्ताइस हज़ार का गेहूँ और लागत पन्द्रह हज़ार, साथ में दस हज़ार ठेके का मिला कर पच्चीस हज़ार रूपये। मतलब बचत दो हज़ार रूपये इसीलिए छोटे किसान का पूरा परिवार ख़ेतों में मज़दूर की तरह लगा रहता है। ताकि मजदूरी वाले पैसे को ही बचा सके। इसके बाद भी अगर बीच में आसमानी-सुलतानी हो गई, मौसम की मार पड़ गई, और उपज घट गई, तो उन हालात में किसान का क्या होगा, यह आप ऊपर के आँकड़ों से अनुमान लगा सकते हैं। छोटा और सीमांत किसान जीवन भर क़र्ज़ं में रहता है, अपनी उपज मे से सारे देश को राक्षसी सब्सिडी बाँटता है और ख़ुद क़र्ज़ं में रहता है।”

किसान की दुर्दशा पर तब्सिरा करते वक्त लेखक ने ‘रामप्रसाद’ के उन निजी लम्हों पर भी रोशनी डालने का प्रयास किया है, जो प्रायः अंधेरे का शिकार होकर रह जाते हैं। तमाम लेखकों की लफ़्जों की रोशनी इस अंधेरे को चीरने में नाकामयाब रहती है लेकिन पंकज सुबीर ने यहां भी अपनी उपस्थिति दर्ज की है। किसान का जेहन यूँ तो हमेशा आर.आर.सी. (रिकवरी रिवन्यू सर्टीफिकेट), बरसात, धूप, खाद, पानी, सूद वगैरह में में ही घूमता रहता है परन्तु कभी-कभी वो अपने लिए भी जीता है। इन्हीं कुछ निजी लम्हों में किसान रामप्रसाद अपनी पत्नी कमला के बारे में सोचता है। लेखक के शब्दों में ”शीरीं-फरहाद, सोहनी-महिवाल, जैसे नामों के साथ आपको कमला-रामप्रसाद की ध्वनि बिल्कुल अच्छी नहीं लगेगी। लेकिन, यह दृश्य उन नामों के प्रणय दृश्यों से किसी भी तरह फीका नहीं है। इसमें भले ही चटख़ रंग नहीं है लेकिन, धूसर रंग तथा उन रंगों के बीच से अँखुआता प्रेम का उदास सा मटमैले रंग का अंकुर, उन चटख़ रंगों पर कई गुना भारी है। उतरती हुई फागुन की रात में, देहरी के बाहर बैठा प्रेमी और देहरी के अन्दर बैठी प्रेमिका। दोनों के अंदर एक गहरा दुःख है, एक जमी हुई उदासी है, कुछ ठहरे हुए से आँसू हैं। दुःख जीवन का और उदासी जीने की। उस दुःख और उदासी के धुँधलके में, दरवाज़े के बाहर बैठे प्रेमी के पास कुछ अलब्ध है, अप्राप्य है, अभीसिप्त है, जो वह अपनी प्रेमिका के लिए लाया है। झूठ बोलकर लाया है, बेशरम होकर लाया है, माँग कर लाया है, इस बात से प्रेम के होने पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। कैसे बनाई जाएगी इस प्रेम दृश्य की पेंटिंग? क्या किसी चित्रकार के पास है वह दृष्टि? जो इस निश्छल प्रेम के दृश्य को ठीक-ठाक तरीके से अपने कैनवास पर उतार दे। इस दृश्य में गुलमोहर नहीं है, गुलाब नहीं है, मोरपंख नहीं है, बाँसुरी नहीं है, कुछ भी तो नहीं है जो प्रेम की पारंपरिक शब्दावलि में होता है। तो फिर कैसे बनाया जा सकेगा इस चित्र को। इस धूसर रंग के प्रेम को अच्छी तरह से समझने के लिए और भी तो जाने क्या-क्या समझना होगा चित्रकार को। रामप्रसाद और कमला, इनका चित्र शायद कोई भी चित्रकार बनाना न चाहे, बना न सके। आगत और विगत को कुछ समय के लिए पूरी तरह से विस्मृत करके यह दोनों इस समय केवल वर्तमान में हैं। केवल और केवल वर्तमान में।”  मुझे याद आता है कि इतिहास का वह पृष्ठ जिसमें एक महान इतिहासकार ने भारत के स्वर्णकाल कहे जाने वाले ‘गुप्तकाल’ की समीक्षा करते हुए लिखा था कि ये काल स्वर्णकाल था लेकिन उनके लिए जो राजाओं की प्रशस्ति ग्रंथ लिखते थे, गीत-संगीत में डूबे रहते थे, व्यापार करते थे, शहरों में रहते थे . . . यह काल उनके लिए ‘स्वर्णकाल’ नहीं था जो गांवो में रहते थे और कृषि करते थे, श्रम करते थे। लेखक इसी बात को सिद्ध करते हुए कहता है कि वास्तव में तो श्रम को कभी भी, कोई भी नहीं देखता है। श्रम हमेशा ही टेकेन फार ग्रान्टेड होता है।  (पृष्ठ-111)

लेखक ने लोक जीवन की झांकी को बिल्कुल जीवंत अंदाज में प्रस्तुत किया है। उदाहरण के तौर पर जब रामप्रकाश के बहनोई की माँ की मृत्यु हो जाती है तो मातम का दृश्य लेखक ने बड़ी ही कुशलता के साथ जिया है। सूखा पानी और आस-पास के ग्रामीण अंचलों में महिलाओं द्वारा मातम के अवसर पर रोने का अभी भी एक दिलचस्प तरीका है। मौत और दिलचस्प? हाँ यही सच है। यहाँ पर महिलाएँ रोती कम हैं, गाती ज़्यादा हैं। उस व्यक्ति का नाम ले-लेकर कोई भजन सा गाती हैं और अंत में रोने की ध्वनि उत्पन्न करती हैं। जो गाती हैं, उसमें मरने वाले के गुण, उसकी अच्छाईं एक-एक कर बताती हैं और रोती जाती हैं। उससे जुड़ी घटनाएँ उसके साथ के अपने व्यक्तिगत अनुभव, या वह मरने से पहले क्या कर रहा था, मतलब सब कुछ बाक़ायदा गा-गाकर बोलती हैं और हर पंक्ति के अंत में फिर रोती हैं, ज़ोर से। यह रोना दिखाव का नहीं होता है बल्कि सचमुच का होता है, वह सचमुच ही दुखी होती हैं। लेकिन पारंपरिक रूप से उनको अपना दुख गा-गाकर ही व्यक्त करना होता है। पुरूष इस बीच केवल तैयारियों में लगे होते हैं, वह बैठकर कोई मातम नहीं करते। वह ही ऊँचे स्वर में उसको गा दे और बाद में जब वह रे की ध्वनि उत्पन्न कर रोए तो रोने में सब की सब महिलाएँ स्वर में स्वर मिला दें। कुछ इस प्रकार –
‘अरी तुम तो भोत अच्छी थी, काँ चली गी रे ऽऽऽऽ’
‘अरे अभी तो मिली थी मोय बड़नगर वाली बइ की शादी में रे ऽऽऽऽ’
‘अच्छी खासी तो ले के गया था, डाग्दर होन ने मार डाली रे ऽऽऽऽ’
‘सुबह-सुबह रोज दिख जाती थी रे ऽऽऽऽ’
‘अरे म्हारा राम जी यो तमने कँइ कर दियो रे ऽऽऽऽ’
‘म्हारे से कहती थी कि सुमन तू म्हारे सबसे अच्छी लगे है रेऽऽऽऽ’

कर्जे और आर.आर.सी. की धनराशि चुकाने के समय किसान की मनोदशा का एक और उदाहरण मन में कहीं संताप, गहरी सी कुंठा छोड़ जाता है। ”कमला की तोड़ी बिक गई। बिकनी ही थी। छोटी जोत के किसान की पत्नी के शरीर पर के ज़ेवर क्रमशः घटने के लिए होते हैं। और हर घटाव का एक भौतिक अंत शून्य होता है, घटाव की प्रक्रिया शून्य होने तक जारी रहती है। चूँकि भौतिक अवस्था में गणित की तरह ऋणात्मक संख्या नहीं होती, इसलिए कह सकते हैं कि भौतिक रूप से घटाव की हर प्रक्रिया शून्य के उपजने तक होगी। इस प्रक्रिया की गति भले ही कम ज़्यादा हो सकती है लेकिन अंत लगभग तय होता है। राप्रसाद ने कमला की तोड़ी को सुनार की दुकान पर तौल होने के बाद एक बार अपने माथे पर लगाया, कमला ने जैसे लगाया था वैसे ही। महिला पुरखिनों की आख़िरी निशानी। हर किसान को विरास में उसके महिला पुरखे और पुरूष पुरखे दोनों ही कुछ न कुछ देकर जाते हैं। पुरूष पुरखे, खेत, ज़मीन और उन पर लदा हुआ क़र्ज़ छोड़ कर जाते हैं, तो महिला पुरखिनों की ओर से ज़ेवर मिलते हैं। कुछ धातुएँ। रामप्रसाद ने अपनी महिला पुरखिनों को उस दौरान याद भी किया और उनसे क्षमा भी माँग ली। क्षमा इसलिए माँग ली कि अब आगे परंपरा में कोई भी ज़ेवर, कमला अपनी बहू को नहीं दे पाएगी। वह परंपरा यहाँ पर, कमला पर आकर समाप्त हो रही है। जब परिवार की महिला के पास इन धातुओं का अंत हो जाता है, तब तय हो जाता है कि किसानी करने वाली बस यह अंतिम पीढ़ी है, इसके बाद अब जो होंगे, वह मज़दूर होंगे। यह धातुएँ बिक-बिक कर किसान को मज़दूर बनने से रोकती हैं।”’

उपन्यास का यू.एस.पी. इसकी भाषा है, और भाषा में भी मुहावरों और लोक कहावतों का प्रयोग है। ‘अकाल में उत्सव’ का एक प्रमुख पात्र मोहन राठी है जो प्रशासन का चाटुकार है, बेहतरीन मनोवैज्ञानिक है, अवसरवादी है और बेहतरीन वक्ता भी है। उसकी खासियत यह है कि वह अपनी बात मुहावरों से ही शुरू करता है। सच तो यह है कि कहावतें और मुहावरे तो भाषा का असली रस हैं। यदि उनको निकाल दिया जाए, तो भाषा नीरस हो जाएगी, उसमें कुछ भी आनंद नहीं बचेगा। मुर्दा है वह भाषा, जिसमें कहावतें और मुहावरे नहीं है। इनके प्रयोग से बात का वजन बढ़ जाता है और सुनने वाले पर अच्छा प्रभाव भी पड़ता है। लेखक ने इस पात्र के जरिये तमाम मुहावरों को उदृत किया है। उदाहरण के तौर पर –

‘कोरी का जमाई बड़ा जानपाड़ा, चाहे जो करवा लो…….!’
‘रांडया रोती रेवेगी और पावणा जीमता रेवेगा।’
‘बड़े-बड़े साँप-सँपोले आए, हम कहाँ आईं बिच्छन देह …….?’
‘उठ राँड, घर माँड, फिर राँड की राँड…….!’

मोहन राठी एक ऐसा पात्र है जो भाषा में नए प्रतिमान तो गढ़ता ही है एक मनोवैज्ञानिक की हैसियत से भी प्रकट होता है। लेखक इस पात्र के माध्यम से कहता है कि ”प्रशंसा, या विरोधी की निंदा सुनना है तो शारीरिक सुख जैसा ही आनंद लेकिन, उसमें और इसमें एक बड़ा अन्तर यह होता है कि यहाँ पर कोई चरम संतुष्टि का बिन्दु नहीं आता, यहाँ पर कोई स्खलन जैसा नहीं होता है। हर आनंद किसी बिन्दु पर जाकर समाप्त होता है लेकिन, यह किसी भी बिन्दु पर समाप्त नहीं हो सकता। यह तो एक सतत् प्रक्रिया है। यह त्वचा राग को नाखून से खुजाने जैसा आनंद है, आप जब तक खुजाते रहेंगे, तक तक आपको आनंद आता रहेगा, बल्कि बढ़ता रहेगा आनंद। आप खुजाना बंद करेंगे, तो आनंद आना बंद हो जाएगा, उसके स्थान पर फिर से खुजालने की उत्कंठा बढ़ जाएगी।”  इस तरह के मनोवैज्ञानिक कथन उपन्यास की गति को तो आगे बढ़ाते ही हैं प्रस्तुति में गजब का आकर्षण पैदा करते हैं। लेखक ने इस मर्म को पूरे उपन्यास में पकड़े रखा है। लेखक ने कलेक्टर श्रीराम परिहार, ए.डी.एम. राकेश पाण्डे तथा उनके दल के अन्य सरकारी गैर सरकारी साथियों के हवाले से शहरी परिवेश का वह हाल प्रस्तुत किया है कि जिसमें आये हुए अवसर को ‘आप्टिमम लेवल’ तक यूज करना है और अपना काम निकालना है। यहां हर पात्र स्वार्थसिद्धि तक ही सीमित है।

बहरहाल ‘अकाल में उत्सव’ हमारे समय का वह महत्वपूर्ण उपन्यास है जो यह दिखाता है कि हम समानान्तर रूप से एक ही देशकाल परिस्थिति में दो अलग-अलग जिन्दगियां जी रहे हैं। एक ओर दबा कुचला हिन्दुस्तान है और हिन्दुस्तान का किसान है जिसकी दुनिया अभी भी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही टिकी हुई है और दूसरी तरफ चमकता दमकता इण्डिया है जहां तकनीकी प्रगति है, धन है, अवसर है।

लेखक पंकज सुबीर ने ‘अकाल में उत्सव’ के माध्यम से एक ऐसी कृति दी है जो हमारे देश को समझने के लिए महत्वपूर्ण औजार साबित हो सकती है। उन्होने अपनी कृति के माध्यम से ऐसी चीखों को हम तक पहुँचाने का काम किया है जो कमोबेश अनसुनी ही दबी रह जाती हैं। प्रमुख पात्र रामप्रसाद के करूणान्त पर यही आह निकलकर रह जाती है कि ‘आख़िरी शब दीद के क़ाबिल थी बिस्मिल की तड़प, सुब्ह दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या………।’

किताब : ‘अकाल में उत्सव’

प्रकाशक – शिवना प्रकाशन, सम्राट कॉम्‍प्‍लैक्‍स बेसमेंट, सीहोर, मप्र 466001, दूरभाष 07562405545

मूल्‍य 150 रुपये, पृष्‍ठ 224, वर्ष 2016

समीक्षक पवन कुमार भा. प्र. से. के वरिष्ठ अधिकारी हैं तथा वर्तमान में सहारनपुर में डीएम के रूप में पदस्‍थ हैं.

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2 Comments

2 Comments

  1. vibha rani Shrivastava

    November 2, 2018 at 7:18 pm

    आपकी लिखी रचना “पांच लिंकों का आनन्द में” शनिवार 03 नवम्बर 2018 को लिंक की जाएगी ….http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा … धन्यवाद!

  2. Dr. Raj Kumar

    November 1, 2020 at 12:34 pm

    सुंदर

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